नकल करके पास होने की अपेक्षा, अपनी बुद्धि से अनुत्तीर्ण होना अच्छा (Kahani)

March 2002

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एक बार स्कूल इंस्पेक्टर मुआयने के लिए आए। गाँधी जी की कक्षा की परीक्षा हो रहा था। उसमें पाँच शब्दों की स्पेलिंग लिखने को दी गई। गाँधी जी ने उसमें से एक गलत लिख दी। कक्षा अध्यापक ने इशारा किया, आगे वाले विद्यार्थी की नकल कर लो, पर गाँधी जी ने नकल नहीं की।

परीक्षा में सब उत्तीर्ण हुए, केवल गाँधी जी अनुत्तीर्ण रहे। इंस्पेक्टर चला गया, तो मास्टर ने गाँधी जी को डाँट लगाई। गाँधी जी ने उत्तर दिया, “मास्टर साहब! दूसरे की नकल करके पास होने की अपेक्षा, अपनी बुद्धि से अनुत्तीर्ण होना अच्छा। झूठी सफलता के लिए अपनी आत्मा की सचाई को बेचकर आत्महीनता का दुःख उठाना मेरे लिए संभव नहीं।” गाँधी जी के इस कथन पर अध्यापक उनकी अल्पायु में नैतिकता की अडिग आस्था के लिए आश्चर्यचकित रह गए।


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