चेतना का विकास संवेदना के स्तर पर निर्भर

March 1990

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चेतना का क्रमिक विकास हलचल, इच्छा एवं भावना के रूप में होता है। जीवन की स्वल्प मात्रा तो जड़ कहे जाने वाले पदार्थों में भी होती है। प्रकृति के दबाव से कुछ-न-कुछ हलचल तो वे भी करते रहते हैं। उत्पादन, अभिवर्ध्दन और विघटन की दिशा में उनके क्रियाकलाप भी चलते रहे हैं। इतने पर भी उन्हें जड़ तथा पिछड़ी स्थिति का कहा— समझा जाता है। यह जीव-चेतना की प्रारंभिक अथवा अनगढ़ स्थिति है।

इससे आगे इच्छाशक्ति उभरती है। वह अधिक विकसित होने, अधिक सुविधाजनक स्थिति में पहुँचने की ललक से प्रेरित होती है। इसी आधार पर जीवधारियों का क्रमिक विकास भी बन पड़ा है। कृमि-कीटकों की गई-गुजरी स्थिति से आगे बढ़ते-बढ़ते जीवन पशुस्तर का बन पड़ा है और डार्विन के कथनानुसार मनुष्य बंदर का ही विकसित रूप है। इसी उपक्रम को मनुष्य की स्थिति के साथ जोड़ा जाए तो उसे भी नर-कीटक, नर-पशु कह सकते हैं, जिसे भूख, वासना, ऋतु-प्रभाव जैसे दबावों से प्रेरित होने पर ही कुछ अतिरिक्त करना और अतिरिक्त सोचना पड़ता है। आकांक्षाओं की पूर्ति ही उसे कुछ सोचने करने के लिए बाधित करती है, किंतु सीमित उतनी ही परिधि में रहती है; जिसमें कि संकीर्ण स्वार्थपरता का साधन जुटता रहे।

अनगढ़ों को शैशव स्तर का कहा जा सकता है, जो अधिकांश समय सोते, उनींदे पड़े रहने में ही बिताते हैं। आलसी-प्रमादी प्रायः इसी स्थिति में रहते हैं। चिंतन का विकास न होने के कारण वे मात्र उसका अनुकरण भर कर पाते हैं, जो सामने दृष्टिगोचर होती हैं। उचित-अनुचित का भेद और मर्यादा-वर्जना का अंतर भी वे नहीं कर पाते, इसलिए उनके सामने प्रचलन ही प्रमुख होता है। विवेक की अविकसित स्थिति में उन्हें चतुर लोग आसानी से बहकाने, फुसलाने और दबाने-दबोचने में भी सफल होते रहते हैं। वे अपने को नियति के बंधनों से जकड़े हुए ही मानते हैं। यथास्थिति बनाए रहने में ही उन्हें संतोष करना पड़ता है। अंधी भेड़ें एक के पीछे, एक चलती ही जाती हैं। भले ही आगे चलकर उन्हें किसी खाई-खंदक में ही क्यों न गिरना पड़े।

बचपन के बाद किशोरावस्था आती है। बच्चे अबोध रहते और शरीरगत आवश्यकताओं के लिए ही हाथ-पैर पीटते हैं। किशोरावस्था की स्थिति इससे भिन्न है। उसमें जोश तो बहुत रहता है, पर होश की कमी ही पाई जाती है। इस स्तर की मानसिकता वाले व्यक्ति महत्वाकांक्षाएँ तो संजोए रहते हैं, पर यह नहीं समझ पाते कि उनकी पूर्ति का सही मार्ग क्या हो सकता है? आवेग कई बार उन्हें भटका भी देता है, कुमार्ग तक अपनाने तक के लिए भड़का देता है। यही कारण है कि बच्चों के पालन-पोषण की अपेक्षा किशोरों को नियंत्रित करना और सुसंस्कृत बनाना काफी कठिन पड़ता है।

इसके आगे की स्थिति तरुणाई है, जिसमें प्रौढ़ता, परिपक्वता का समावेश होता चलता है, साथ ही समझदारी का इतना अभिवर्ध्दन भी होता है कि भले-बुरे का अंतर होता रह सके। अनुभव के आधार पर यह अनुमान लग सके। अनुभव के आधार पर यह अनुमान लग सके कि किए जा रहे कृत्यों का भावी-परिणाम क्या हो सकता है। उसी आधार पर वे अपना नियमन भी करते है। और ऐसे कदम भी उठाते हैं, जो आरंभ में भे ही कष्ट साध्य लगें, पर भविष्य में सुखद-संभावनाएँ विनिर्मित कर सकें। किसान, विद्यार्थी, व्यवसायी, कलाकार जैसे समुन्नत बनने वाले लोग इसी रीति-नीति को अपनाते हैं। वे विश्वास करते हैं कि बोने-सींचने के उपरान्त ही वैभव काटा-बटोरा जा सकता है।

नासमझी से लेकर समझदार बनने तक की प्रगति में प्रायः यही मंजिलें पार करनी पड़ती हैं। शिशु स्तर के वे हैं, जिन्हें शरीर पर पड़ने वाली प्रकृति एवं परिस्थितियों के दबाव ही कुछ करने के लिए उकसाते हैं, अन्यथा उन्हें अपनी मर्जी से किसी प्रकार समय गुजारने के अतिरिक्त और कुछ सोचते-करते बन ही नहीं पड़ता। इसे आदिम परंपरा भी कह सकते हैं, जिसे इस सभ्यताभिमानी युग में भी असंख्यों पर छाया हुआ देखा जा सकता है।

आज का किशोर समुदाय वह है, जिसे सुख-सुविधाओं को हस्तगत करने की ललक असाधारण रूप से आकुल-व्याकुल करती है। वे यह तो सोच नहीं पाते कि उसके लिए योग्यता, क्षमता, पात्रता और पुरुषार्थपरायणता अपनाते हुए क्रमिक विकास का क्रम धैर्यपूर्वक अपनाना चाहिए। उद्यान लगाकर माली की तरह धैर्य रखते हुए समयानुसार सुस्थिर प्रगति का प्रतिफल उपलब्ध करना चाहिए; किंतु बहुधा वे दूरदर्शिता और प्रगति-परंपरा के अनुशासन को तोड़-फोड़ करके, ऊँची छलांगें लगाते हैं। तात्कालिक लाभ के लिए इतने अधीर हो जाते हैं कि उन्हें अनाचार अपनाने में भी कोई हिचक-झिझक नहीं लगती।

परिपक्वता का लक्षण है— -भाव-संवेदनाओं का उभाव। आत्मसंयम और दूसरों को अनुदान प्रस्तुत करने का संतजनों जैसा अभीष्ट उत्साह। पेड़ पर फल जब पक जाते हैं। तो वे नीचे अनायास ही टपक पड़ते हैं, ताकि बालक और दुर्बल भी उनका लाभ सरलतापूर्वक उठा सकें। बादलों के पास जब प्रचुर जल-संपदा जुट जाती है तो वे उसकी सार्थकता इसी में समझते हैं कि बरस कर प्यास बुझाने और हरीतिमा उगाने की रीति-नीति अपनाई जाए। मोर अपने लंबे पंखों को समय-समय पर झाड़ते रहते हैं, ताकि उनसे शोभा-सज्जा के कई प्रयोजन पूरे किए जा सकें। मनुष्य समुदाय में भी साधु,ब्राह्मण, वानप्रस्थ, परिव्राजक अपनी क्षमता का अधिकांश भाग लोक-मंगल के लिए समर्पित करने में ही अपने को कृतकृत्य हुआ अनुभव करते हैं। उनके कार्यक्रमों में बाल विकास और किशोरों के प्रशिक्षण की प्रक्रिया की प्रमुखता रहती है। इसी के लिए वे गुरुकुल चलाते और तीर्थयात्रा जैसे धर्म-प्रचार के परिभ्रमण पर निकलते हैं।

विकासक्रम, हलचलें समझदारी की मंजिलें पार करते हुए भाव-संवेदना के उच्च शिखर पर पहुँचाता है। यही चेतना के परिष्कार का स्वाभाविकक्रम और सराहनीय सदुपयोग है। संवेदनशीलों को ही महामानव कहते हैं। क्योंकि विकसित करुणा का उपयोग गिरों को उठाने और उठों को शालीनता अपनाने के लिए बाधित करने पर ही संभव होता है।


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