सच्ची बात सहन नहीं होती (Kahani)

November 1990

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मन्दिरों में शंख और घड़ियाल गिरजाघरों में घण्टियाँ, मसजिदों में अजान के स्वर गूँजे। सभी धर्मावलम्बी अपने-अपने पूजा स्थलों की ओर चल पड़े।

मस्जिद की मीनार, गुरुद्वारे का निशान साहिब, मन्दिर की गुम्बद और गिरजाघर का क्रास भक्तों की भीड़ को आता देख आपस में विस्मय की मुद्रा में मुस्कराये।

मस्जिद की मीनार ने निशान साहिब, गुम्बद और क्रास से कहा - “भाई साहब ये इंसान भी क्या खूब हैं? यह सारी भीड़ अभी अपने अपने पूजाघरों में जाकर भगवान के सामने बड़ी भोली बनकर स्तोत्र, आयत, कविताएँ गाएगी, परवरदिगार से दुआ करेगी कि हमसे कोई नासमझी न बन पड़े। गलत काम न हो जाय। हमारी नीयत साफ रहे, नेक इंसान बनें, फिर न जाने इसे पूजाघर के बाहर क्या हो जाता है। तब इंसान का दूसरा मुखौटा होता है। भोला बनने वाला वही इंसान शोषक बन जाता है और सजातीय मनुष्यों का गला काटने से भी नहीं चूकता।”

मंदिर के गुम्बद ने कहा -”चुप रह बहिन! धीरे बोल। यदि इन मनुष्यों ने सुन लिया तो तेरी-मेरी और इन सब पूजाघरों की खैर नहीं। यह इंसान बड़ा जिद्दी है। यह अपने को छोड़कर सब को मूर्ख समझता है। इससे सच्ची बात सहन नहीं होती। यही इसकी आज की दुर्गति का कारण है।

की दिशा में आगे बढ़ता है। उस अनौचित्य के परित्याग और औचित्य के अवधारण का परिणाम आत्मिक प्रगति के रूप में सामने आता है। उस महान प्रयोजन की पूर्ति में खेचरी मुद्रा जितनी सहायता करती है उतनी और कोई प्रक्रिया नहीं।


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