विश्वमाता (Kavita)

April 2002

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विश्व प्राण गायत्री माता, प्राणों का संचार करें। ओजस्-तेजस्-वर्चस् से त्रयतापों का उपचार करें॥

सविता मध्यस्थिता माता, सविता की आभा अनुपम। वह प्रकाश की पुँज अनूठी, शेष नहीं रह पाता तम। प्राण पीयुष पिला शिशुओं को, प्राणामृत की धार घरें। विश्व प्राण गायत्री माता, प्राणों का संचार करें॥

पथ प्रशस्त करती शिशुओं का, सद्पथ सदा दिखाती है। जब तक बालक सँभल न पाए, उँगली पकड़ चलाती है। ज्ञान प्रकाश सदा विखराकर, वह अज्ञान-अंधकार हरें। ओजस्-तेजस्-वर्चस् से त्रयतापों का उपचार करें॥

दुख से मुक्त करातीं मन को, सुख-स्वरूप का ज्ञान करा। और निरोग बनाती तन को, भोगवाद से त्राण करा। सुख-समृद्धि बढ़ाने वाली जीवन विधि आधार करें। विश्व प्राण गायत्री माता, प्राणों का संचार करें॥

वे सुषुप्त-देवत्व जगातीं, पाप पतन से बचने को। जगती के उज्ज्वल भविष्य का स्वर्ग धरा पर रचने को। वसुधा-कुटुँब बनाने वाला संवेदन विस्तार करें। ओजस्-तेजस्-वर्चस् से त्रयतापों का उपचार करें॥

गायत्री सद्बुद्धि विश्व की आओ ! उसको वरण करें। सद्भावी का स्वर्ग धरा पर, सब मिलकर अवतरण करें। सद्बुद्धि ही विभीषिकाओं, विपदाओं से पार करें। दुश्चिंतन दुर्भावग्रसित जनमानस का उद्धार करें॥

- मंगलविजय विजयवर्गीय

*समाप्त*


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