अपनों से अपनी बात- इस सुयोग से कोई विवेकशील वंचित न रहे

July 1985

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तैराकी तालाब में घुसकर सीखी जाती है और पहलवानी अखाड़े में। पढ़ना पाठशाला में होता है और व्यवसाय हाट बाजार में। इस धरती पर सबसे अधिक समर्थ माना जाने वाला आत्मबल जुटाना और बढ़ाना हो तो सेवा मार्ग अपनाने का और कोई उपाय नहीं। संयम साधना के बिना—उदारता और सज्जनता विकसित करना आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जप तप इसी पृष्ठभूमि पर उगते और फलते−फूलते हैं। मात्र कर्मकाण्डों के सहारे दिशा निर्धारण और स्वाध्याय सत्संग से उपयुक्त मार्ग−दर्शन होता है। जिस कल्प वृक्ष पर गौरव और वर्चस्व के फूल खिलते और फल लगते हैं वह आत्मशोधन के खाद और परमार्थ परायण का पानी पाकर ही ऊँचा उठता और किसी को छाया में बिठा कर अभीष्ट अनुदानों से निहाल करता है।

इस तथ्य को प्रजा परिजनों को समय−समय पर अवगत कराया जाता रहा है। जो सीखा और सिखाया गया है उसकी परीक्षा प्रतियोगिता का इन्हीं दिनों विशेष आयोजन किया गया है—हीरक जयन्ती का। किसकी जयन्ती इसे जानने को किसी को भ्रमित नहीं होना चाहिए। पच्चीस वर्ष में रजत जयन्ती, पचास में स्वर्ण जयन्ती, पचहत्तर में हीरक जयन्ती और सौ वर्ष में शताब्दी मनाई जाती है। यह काल गणना गुरुदेव से यत्किंचित् ही संबंध रखती है। उनका शरीर भले ही पचहत्तर वर्ष का हुआ हो उनका तप साधना भले ही साठ वर्ष पूरे कर चुका हो, पर वस्तुतः वे इस प्रकार के गणित से बहुत ऊपर हैं। आत्माएँ न जन्मती हैं, न बढ़ती हैं और न मरती हैं। जो अजर अमर है उसकी किस पैमाने से नाप−तौल की जाय। वे भगवान बुद्ध के शब्दों में अनेक बार दुहराते रहे हैं कि जब तक एक भी प्राणी बँधन में बँधा है तब तक हमें स्वर्ग या मुक्ति में नहीं जाना। जब सभी पार हो चुके, मल्लाह के डाँड़ तभी रुकेंगे। जिन्हें निरन्तर जन्म लेने हैं और विश्व परिवार के साथ जीना मरना है, उनके लिए हर दिन नया जन्म और हर रात नई मौत बन कर रहती है। ऐसी दशा में किस काल गणना के हिसाब से उनकी हीरक या कोई जयन्ती मनाई जाय?

अब अवसर विशेषतया एक महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए किया गया है जिसमें स्वर्ण सदृश परिजनों को तपा हुआ कुन्दन बनाया जाय। जिसमें कोयले की खदान को उलट−पलट कर उसमें से हीरों का ढेर लगाया जाय। इतना ही नहीं साथ ही वह भी किया जाता है कि उन्हें खरादा, चमकाया एवं जौहरी के बाजारों में ऊँचा मूल्याँकन हो सकने योग्य बनाया जाय। यह अवसर एक प्रतिस्पर्धा समारोह है जिसमें सभी प्राणवानों को अपना जौहर दिखाने और उपयुक्त पुरस्कार पाने का अवसर मिलेगा। विवाह शादियों के समय एक उल्लास बरसता है उसी के आनन्द लेने के लिए सभी स्वजन संबंधी एकत्रित होते हैं। उसमें समय, श्रम और धन की दृष्टि से घाटा ही रहता है। हीरक जयन्ती को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए और उसके संदर्भ में किन्हें क्या करना है इसका निर्धारण किया जाना चाहिए।

शुभ कामना, बधाई, घनिष्ठ पारिवारिक होने की दिशा में ओछे शिष्टाचार भर रह जाते हैं। धूमधाम और समारोह आयोजन की भी इन दिनों उपयोगिता नहीं समझी गई ताकि लक्ष्य से किसी का ध्यान न हटे। कुछ प्रत्यक्ष कृत्य करना हो तो दो बातें नोट की जा सकती हैं। एक यह कि बसन्त पर्व तक निरन्तर चलने वाले सत्रों में से किसी में सम्मिलित होने का समय निकाला जाय और अतिरिक्त प्राण ऊर्जा साथ लेकर वापस लौटा जाय। दूसरा यह कि आगामी बसन्त पर्व पर स्थानीय स्तर का छोटा गायत्री यज्ञ और युग निर्माण सम्मेलन अपनी स्थिति के अनुरूप कर लिया जाय। उसके लिए बाहर से मिशन के प्रवक्ताओं के आने वाले की आशा न की जाय क्योंकि वे अपने−अपने स्थानों में गायत्री यज्ञ और ज्ञानयज्ञ युग निर्माण सम्मेलन का प्रबंध करने में लगे होंगे।

यह अभिव्यक्ति का प्रदर्शन है। ठोस काम वह किया जाना चाहिए जिसे करने का दायित्व महाकाल ने वरिष्ठ प्रज्ञा−पुत्रों के कन्धों पर सौंपा है। वह कार्य एक ही है—जनमानस में महाप्रज्ञा का आलोक भर देना। इसके लिए किस स्थिति में किन्हें क्या करना चाहिए इसका उल्लेख इन पंक्तियों में होता रहा है। उस पर एक बार फिर दृष्टिपात किया जा सकता है कि जो सौंपा गया था वह बन पड़ा या नहीं। बन पड़ा तो इतना कम तो नहीं है जो तपती धरती को मूसलाधार जल बरसने वाले महामेघ की गरिमा से कम पड़े। समय की माँग बड़ी है उसके लिए उबली पूजा से काम नहीं चल सकता। जलते तवे पर पानी की कुछ बूंदें पड़ने से क्या काम चलता है। इसके लिए इन दिनों समर्थों का ऐसा पुरुषार्थ होना चाहिए जो उलटे को उलट कर सीधा कर सके।

इसके लिए प्रत्येक वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र सर्वथा समर्थ है। यदि परिस्थितियाँ बाधक हैं तो उन्हें ठोकर मारकर रास्ता रोकने से हटाया जा सकता है सृष्टा का राजकुमार मनुष्य केवल इसलिए दुर्बल पड़ता है कि उसे लोभ, मोह और अहंकार की बेड़ियाँ बेतरह जकड़कर असह्य बना देती हैं। यदि औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाया जाय परिवार को छोटा, सभ्य, सुसंस्कृत, स्वावलंबी रखा जा सके तो युग धर्म के उच्चस्तरीय निर्वाह की सुविधा हर किसी को सहज ही मिल सकती है। संकीर्ण स्वार्थपरता और अहंकारी साज−सज्जा जुटाने में तनिक कटौती की जा सके तो हर विचारशील को इतना अवकाश मिल सकता है। जिसमें वह आत्म−कल्याण और युग निर्माण की महती आवश्यकताओं को पूरा कर सके। प्रकारान्तर से यही कोयले को बहुमूल्य हीरा बनाने वाला काया कल्प है। इसे स्वेच्छापूर्वक किया जा सकता है। सहयोग की कमी हो तो सत्पात्र की सुगन्ध सूँघकर खिले पुष्प पर मंडराने वाले भ्रमरों की तरह समूचा देव परिकर दौड़ पड़ता है। गुरुदेव ने मात्र अपनी पात्रता बढ़ाने में अथक प्रयास किया है और वह पाया है जो सच्चे अध्यात्म का सच्चा अवलम्बन करने पर मिलना चाहिए। इसी के अनुकरण की आवश्यकता है। हीरक जयन्ती का एक ही सन्देश है कि यदि किसी की प्रज्ञा अभियान में उसके सूत्र−संचालक में वास्तविक श्रद्धा हो तो उसका बखान करके नहीं कार्य रूप में अपनी ऐसी श्रद्धाञ्जलि प्रस्तुत करनी चाहिए जिसकी इस विनाश के ज्वालामुखी पर बैठे संसार को नितान्त आवश्यकता है। ऐसी आवश्यकता है जिसकी अनिवार्य आवश्यकता है। इतनी अनिवार्य कि उसे एक क्षण के लिए भी ढाला नहीं जा सकता।

क्या किया जाय? इसका संक्षिप्त उत्तर इतना ही है कि अपने प्रभाव क्षेत्र में दीपक की तरह अपने को श्रद्धा का प्रतीक बनाया जाय और संपर्क क्षेत्र में युग चेतना का आलोक जगाया जाय। घर−घर नव परिवर्तन का अलख जगाने के लिए कटिबद्ध होकर निकल पड़ा जाय। इसके निमित्त क्या किया जाय। इसका सार संक्षेप छः सूत्री योजना के रूप में मई की अखण्ड−ज्योति में तथा बाद की अन्यान्य पत्रिकाओं, टाइटिल के तीसरे पृष्ठ पर छप चुका है। उसमें नवीनता कुछ नहीं पुनः स्मरण कराया जाना मात्र है। इसे परिजन चाहें तो अनुरोध आग्रह या निर्देश भी मान सकते हैं। ऐसा अनुरोध जिसे फिर कभी के लिए नहीं ही टाला जाना चाहिए।

कोयले का काया कल्प हीरा है। हममें से कौन अब तक क्या था इसकी चर्चा अप्रासंगिक है। अभीष्ट तो परिवर्तन है। ऐसा परिवर्तन जिसे नये जन्म का नाम दिया जा सके। मनुष्य में देवत्व उभरता हुआ इन्हीं दिनों इन्हीं आँखों से देखा जा सके। यह कठिन लगता हो तो भी सरल है क्योंकि कदम बढ़ाने वाले के लिए, उपयुक्त सहयोग देने के लिए वे देव शक्तियाँ वचनबद्ध हैं जो गुरुदेव की गोदी में खिलाती और उनकी राई जैसी निजी क्षमता को पर्वतोपम बनाती रही हैं।

यों अब तक भी जो प्रगति हुई है वह उत्साहवर्धक है, किन्तु अनेकानेक धर्मों, देशों, भाषाओं में बढ़े हुए 500 करोड़ पढ़ों और अनपढ़ों तक युग चेतना का आलोक पहुँचाने का—उन में नव जीवन भरने का लक्ष्य बहुत बड़ा है—उसे देखते हुए समग्र सफलता अभी काफी दूर दिखती है उसे करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। जो बाकी है उसकी पूर्ति के लिए अभी इतना भारी भरकम प्रयास करना है जिसे सन्तोषजनक कहा जा सके। जिसकी पृष्ठभूमि पर आशा के अंकुर उग सकें। करना तो भगवान को ही है। इतना बड़ा गोवर्धन उठाने और समुद्र सेतु बाँधने जैसी योजना को पूर्ण करना तो उसी के बलबूते से हो सकता है। पर यह तथ्य भी निश्चित है कि ऐसे ही अवसरों पर भगवान अपने सच्चे भक्तों की परीक्षा लेते, पात्रता परखते और तद्नुरूप श्रेय पुरस्कार देकर कृत−कृत्य करते हैं। ऐसे समय चाहे जब नहीं आते। ओलम्पिक खेलों जैसी विशालकाय प्रतियोगिता का नियोजन चाहे जब नहीं होता, उन्हें हर कोई मनमर्जी के समय पर सामने खड़ा नहीं देख सकता। उन्हें बुलाने और व्यवस्था बनाने के लिए बहुत बड़ी सामर्थ्य चाहिए और वह मात्र भगवान में है। पर इतना कर गुजरने की हर किसी को सुविधा है कि उनमें भाग लेने की तैयारी व्यक्तिगत रूप से करे और अपनी प्रयत्नशीलता के अनुरूप असंख्यों के सम्मुख अपनी दक्षता प्रस्तुत करे और तदनुरूप श्रेय सम्मान और पुरस्कार प्राप्त कर सके। पर यह सब किसी विशेष समय पर ही हो सकता है। सुविधा आयोजकों की मुख्य है। अपनी फुरसत का समय आने पर यह किया जायेगा। बात इस तरह नहीं बनती। जब अफसरों की भर्ती होती है तभी प्रार्थियों को उपस्थित होना पड़ता है। जब प्रार्थी चाहें तभी जगह खाली हों और तभी आवेदन−पत्र माँगे जाय और तद्नुरूप नियुक्ति हो यह नहीं हो सकता। सुयोग से हमें लाभ उठाना होता है। पर्व अपनी मर्यादा के अनुरूप आते हैं वे हमारे बुलाते ही नहीं आ धमकते हैं। वर्षा अपने समय पर होती है। हमारे पुकारते ही बादल नहीं आ धमकते।

हीरक जयन्ती की अवधि ऐसी ही है जिसे प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को अपना सौभाग्य उभारने वाला अनुपम अवसर है इसे चुका नहीं जाना। यह उपेक्षा करने और बहाने ढूँढ़ने की भी घड़ी नहीं है। यह तो कोई भी कभी भी सड़कची करता रह सकता है पर बिगुल बजते ही पंक्ति में जा खड़े होने की घड़ी छावनी में कप्तान की योजनानुसार ही निर्धारित होती है। इसमें सैनिकों की सुविधा और मर्जी को महत्व नहीं मिलता।

समझना चाहिए कि यह समय वरिष्ठ प्रज्ञा परिजनों के बहुमूल्य हीरक बनने का है। यह वस्तुतः उन्हीं के सौभाग्य की बेला है। गुरुदेव तो अपने को उस आत्मिक स्थिति में विकसित कर चुके हैं, जिसमें मरण का और जयन्ती मनाने जैसे हर्षोत्सव का कोई विशेष महत्व रह नहीं गया है। अतः हीरक जयन्ती को इसके सही परिप्रेक्ष्य में समझने और तद्नुरूप ही संकल्प लेने का परिजनों से इन पंक्तियों में आग्रह अनुरोध किया जा रहा है।


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