माँ की सीख (Kahani)

February 1997

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बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला से उनकी माँ पूछ रही थीं-”बेटा! यदि तुम्हारा कोई शत्रु तलवार लेकर मेरी ही गर्दन काटने आ जाये, तो तुम क्या करोगे?” “माँ आज ऐसी अनहोनी बात क्यों पूछ रही हो? भले ही मेरा अंग्रेजों से युद्ध चल रहा हो, पर आपने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा है।” सिराज ने उत्तर दिया।

“पर यह भी तो सम्भव है कि वह कुछ न बिगाड़ने पर मेरा जीना-हराम करने लगे।”

“नहीं ऐसी बात नहीं। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आज आपको मेरी शक्ति पर अविश्वास क्यों हो रहा है? मुझे आपत्तिग्रस्त देखकर, जाफर ने अवश्य मेरे विरुद्ध षड्यन्त्र कर दिया है और मुझे परास्त करना चाहता है, पर मैं पारिवारिक जीवन के कर्तव्यों से उदासीन नहीं हूँ। विश्वास रखो माँ ! मुझसे कितना ही शक्तिशाली शत्रु क्यों न हो, पर मैं अन्तिम समय तक मौत के घाट उतारने में लगा रहूँगा। यह मेरा दृढ़ संकल्प है।”

सिराज की बात सुनकर माँ को सन्तोष हुआ। उसे अपना काम बनता दिखाई दिया। उसने कहा-”बेटे सिराज ! मैं तुम से कई दिन से निराशा की भावना देखती आ रही हूँ। मीरजाफर के षड्यन्त्र से तुम्हारे हौंसले पस्त हो गए हैं और आत्मसमर्पण की बात सोच रहे हो। तुम्हारी मातृभूमि पर शत्रु हथियार उठाये खड़ा है। वह मातृभूमि अकेले तुम्हारी ही नहीं, मुझ जैसी माताओं की भी है।”

माँ की बात बेटे को चुभ गयी। वह माँ का आशय समझ चुका था। शत्रुओं को पछाड़ने के लिए आतुर हो उठा।

अब एक क्षण की भी वह देर न करना चाहता था। वह उठा और तुरंत बाहर चला गया, एक दिन उसका कवच ही उसके शव का आवरण बना।


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