अंतर्जगत की यात्रा-विज्ञान-सच्चा वैराग्य तो प्रभु दर्शन के बाद ही आता है

September 2003

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अन्तर्यात्रा के विज्ञान पर चिन्तन, मनन एवं निदिध्यासन करते हुए हजारों-हजार योग साधक अपनी अन्तर्यात्रा के लिए चल पड़े हैं। यह यात्रा उन्हें नित-नयी रोचक, रोमाँचक एवं रहस्यमयी अनुभूतियों के वरदान दे रही है। हर बढ़ते पग पर उन्हें अहसास हो रहा है कि दिव्यलोक में तपोलीन महर्षि पतंजलि की सूक्ष्म चेतना उनके साथ है। और परम पूज्य गुरुदेव हर पल उनका हाथ थामे हैं। युगाचार्य स्वामी विवेकानन्द ने अलीपुर जेल की काल-कोठरी में महर्षि अरविन्द को अतिमानस का बोध कराया था। इस सत्य से योग साधकों का समुदाय भली प्रकार सुपरिचित है। इन दिनों यह ऐतिहासिक सच कुछ निष्ठावान योग साधकों के जीवन में फिर से दुहराया जा रहा है। अपने साधना कक्ष में उन्हें युग ऋषि गुरुदेव के साधना संदेश एवं महर्षि पतंजलि के दिव्य संकेत मिलते हैं।

जिन्हें यह दिव्य अनुदान मिल रहे हैं- वे पुलकित एवं गदगद हैं। जो अभी इस सीढ़ी तक नहीं पहुँच पाये हैं- पल-पल उन्हें अपना आत्मावलोकन व आत्मावलोचन करना चाहिए। अपनी निष्ठ एवं समर्पण भावना को परखना चाहिए। अपने वैराग्य को बार-बार उस कसौटी पर खरा साबित करना चाहिए, जिसे महर्षि ने अपने सूत्र में परिभाषित किया है। साधकों को स्मरण होगा कि इस योग कथा की पिछली कड़ी में इसकी विवेचना की गयी थी। इसमें बताया गया था कि वैराग्य ‘निराकाँक्षा की वशीकार संज्ञा’ नाम की पहली अवस्था है। इसका मतलब है ऐन्द्रिक सुखों की तृष्णा में सचेतन प्रयास द्वारा भोगासक्ति की समाप्ति। परन्तु यह केवल साधन वैराग्य है। सिद्ध वैराग्य इसकी अगली और चरमावस्था है।

यह सिद्ध वैराग्य क्या है? इस जिज्ञासा के उत्तर में महर्षि कहते हैं-

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्॥ 1/16॥

शब्दार्थ- पुरुषख्यातेः= पुरुष के ज्ञान से; गुणवैतृष्ण्यम्= जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का अभाव हो जाना है; तत्= वह; परम्= पर वैराग्य है।

अर्थात्- यह पर वैराग्य निराकाँक्षा की अन्तिम अवस्था है- पुरुष के परम आत्मा के अन्तरतम स्वभाव को जानने के कारण समस्त इच्छाओं का विलीन हो जाना।

वैराग्य की यह अवस्था अतिदुर्लभ है। परमात्मा में अन्तश्चेतना के विलीन हो जाने पर यह अपने आप ही प्रकट हो जाती है। इसीलिए इसे पर वैराग्य कहते हैं। सिद्ध महापुरुषों की यह स्वाभाविक दशा होने के कारण इसे सिद्ध वैराग्य भी कहा जाता है। यह समस्त साधनाओं का फल है, जो सिद्ध योगियों को सहज सुलभ रहता है। अन्तर्चेतना प्रभु में विलीन होने के कारण विषयों के प्रति, भोगों के प्रति न गति होती है, न रुचि और न ही रुझान। यह प्रभुलीन भावदशा की सहज अभिव्यक्ति है। प्रभु प्रीति की सहज रीति है यह।

यह अवस्था कैसे मिले? इस परम सिद्धि का भाव चेतना में किस भाँति अवतरण हो? योग साधकों की जिज्ञासाओं का एक ही उत्तर है, प्रभु प्रेम। जिनमें भगवान् की भक्ति है, प्रभु चरणों में अनुरक्ति है, उन्हें यह सिद्धि अपने आप ही मिल जाती है। भक्ति के अलावा अन्य जो भी साधना मार्ग है- उन पर चलकर इस सिद्ध वैराग्य के दर्शन हो तो सकते हैं पर बड़ी कठिनाई से। यह भी सम्भव है कि इन राहों पर साधकों को कई बार अटकना या रुकना पड़े। और हो सकता है सब कुछ करके भी सिद्ध वैराग्य तक न भी पहुँचा जा सके।

इस सम्बन्ध में परम पूज्य गुरुदेव के श्री मुख से निकले आप्त वचन मानसिक चेतना में उस दिन की भाँति ही प्रखरता से प्रदीप्त है। जब उन्होंने वैराग्य के मर्म को समझाते हुए कहा था- बेटा! मीरा, तुलसी, सूर, रैदास आदि भक्तों को यह अपने आप ही सुलभ हो जाता है। प्रभु स्मरण, प्रभु चिन्तन और प्रभु प्रेम में भीगा हुआ मन जब एक बार उनके चरणों में विलीन हो जाता है- तो किसे याद रह जाते हैं विषय भोग। कहाँ याद रह पाती है- इन्द्रिय विलास की बातें। सब कुछ साँप की केंचुल की तरह उतर जाता है। पेड़ से सूखे पत्ते की भाँति झड़ जाता है।

इस बारे में गुरुदेव प्रायः नारद मोह की कथा सुनाया करते थे। देवर्षि नारद पहले महान् ज्ञानी योग साधक थे। उनकी योग साधना अति प्रखर थी। विवेक उनमें पूर्णतया प्रज्वलित था। अपनी साधना की प्रचण्ड अविरामता में उन्होंने हिमालय में समाधि लगा ली। उनकी योग साधना का तेज ऐसा बढ़ा की देव शक्तियाँ परेशान हो गयी। देवलोक वासियों ने उन्हें डिगाने के लिए भाँति-भाँति के मायाजाल रचे। एक के बाद एक नए तरीके अपनाए, पर कोई कामयाबी न मिली। अन्तिम अस्त्र के रूप में उन्होंने कामदेव को सम्पूर्ण सेना के साथ भेजा। काम की सारी कलाएँ, अप्सराओं की सारी नृत्य लीलाएँ देवर्षि नारद के वैराग्य के सामने पराजित हो गयी। अन्ततः उन सबने देवर्षि से क्षमा याचना की और वापस अपने लोक चले गए।

काम को पराजित करने वाले अपने महान् वैराग्य से नारद को गर्व हो गया। अपनी काम विजय की कथा उन्होंने शिव, ब्रह्म एवं विष्णु को सुना डाली। सर्वेश्वर ने उनके गर्वहरण के लिए लीला रची। जिन नारद के वैराग्य का प्रभाव कुछ ऐसा था कि - ‘काम कला कछु मुनिहि न व्यापी। निज भय डरेउ मनोभव पापी॥’ अर्थात् काम की कोई भी कला मुनिवर को नहीं व्यापी और वह कामदेव अपने पाप से डर गया। वही नारद कुछ ऐसे हो गए कि- ‘जप तप कुछु न होई तेहि काला। हे विधि मिलहि कवन विधि बाला॥’ अर्थात् उनसे उस समय कुछ भी जप-तप नहीं बन पड़ा। बस वे यही सोचने लगे कि हे विधाता किस तरह मेरा विवाह इस कन्या से हो जाय।

यह कथा सुनाते हुए गुरुदेव ने कहा था सब कुछ होने पर भी जब तक अहं का भगवान् में समर्पण, विसर्जन, विलय नहीं होता, तब तक कभी वैराग्य सिद्ध नहीं होता। भक्तिमार्ग में पहले ही कदम पर अहं का बलिदान करना पड़ता है। इसीलिए भक्त को अपने आप ही सिद्ध वैराग्य मिल जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भक्ति की महिमा की अरण्यकाण्ड में बड़ी ही सुन्दर चर्चा की है। नारद की जिज्ञासा के उत्तर में भगवान् कहते हैं-

जनहि मोर बल निज बल ताही। दुह का काम क्रोध रिपु आही॥ यह विचारि पंडित मोहि भजहीं। पायहु ज्ञान भगति नहि तजहीं॥

भक्त को मेरा बल (भगवान् का बल) रहता है और ज्ञानी को अपने बल (स्व विवेक) का सहारा रहता है। काम क्रोध दोनों के ही शत्रु हैं। यह सोचकर विद्वज्जन मेरी भक्ति करते हैं। ज्ञान मिलने पर भी इसका त्याग नहीं करते। गुरुदेव कहते थे कि भक्त में वैराग्य की परम भावदशा प्रकट होती है। उसके लिए विराग (वैराग्य) आराध्य के प्रति वि+राग यानि कि विशिष्ट राग बन जाता है। श्री रामकृष्ण देव इस प्रसंग पर कहा करते थे कि एक बार उनके प्रति प्रेम जग जाय तो फिर रम्भा-तिलोत्तमा जैसी रूपसी अप्सराएँ चिता भस्म जैसी त्याज्य लगने लगती हैं। भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने भी यही सत्य कहा है-

विषयाः विर्निवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसोवर्ज रसोऽप्स्य परं दृष्ट्व निर्वतते॥

यानि कि विषय भोग तो उसके भी छूट जाते हैं, जो इन्द्रिय से विषयों को नहीं ग्रहण कर रहा है। पर रस तो प्रभु दर्शन के बाद ही छूटता है। यह परं दृष्ट्वा स्थिति ही पर वैराग्य है। जो प्रभु भक्ति से सहज प्राप्त है। इस वैराग्य में ही समाधान की समाधि है। इसके स्वरूप की व्याख्या महर्षि के अगले सूत्र में है। जिसे साधक गण अगले अंक में पढ़ेंगे।


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