बनाने वाले के हाथ

October 1996

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“ तू बनाकर भी व्यर्थ करता है। अपने ही निर्माण को कुचल देने में तुझे आनन्द आता है?” इन वाक्यों के साथ भाव के अतिरेक में कभी उसके नेत्र छलक उठते, कभी उसके नेत्र छलक उठते, कभी हलकी-सी मुसकान चेहरे पर बिखर जाती। कोई नहीं जानता वह कौन है? पता नहीं कैसे वह यहाँ आया। गाँव के लोग जब एक सवेरे सोकर उठे , उन्होंने देखा कि उनके गाँव की गलियों में कही से एक नया व्यक्ति आ गया है। गौर वर्ण, लम्बी आँखें, ऊँची नुकीली नासिका, उन्नत ललाट, इकहरा शरीर। सम्भवतः किसी उच्चकुल का है, सम्भवतः अत्यन्त पढ़ा-लिखा विद्वान है। सम्भवतः इसलिए कि केवल अनुमान ही किया जा सकता है।

उसके वस्त्र फटे और मैले होकर भी बताते हैं, वे कभी स्वच्छ थे, सुन्दर थे, मूल्यवान थे। उसके केश उलझे होकर भी कहते हैं, वे कभी सुलझे और सुसज्जित थे, सुगन्धित तैल से सिंचित होते थे। उसकी भाव-भंगिमा, उसकी चाल-ढाल, उसकी दृष्टि कहती थी , वह कभी सम्मान पाता था, सत्कृत होता था। लेकिन वह कुछ बोलता नहीं किसी से। कुछ पूछने पर प्रश्नकर्ता के मुख की ओर घूरने लगता और फिर या तो ठहाका मारकर हँसने लगता है। यदा-कदा उसके चेहरे पर हलकी सी स्मित अथवा नेत्रों में आँसू भी छलक पड़ते। लोग उसकी ओर बड़ी तरस भरी दृष्टि से देखते हुए कहते-बेचारा पागल है।

गाँव के दयालु लोग-वे लोग उसे स्नेहपूर्वक रूखी-सूखी रोटियाँ खिला देते हैं। उसे यदा-कदा एकाध वस्त्र मिल जाते हैं। जाड़े के दिन हैं। रात्रि में वह किसी न किसी अलाव के पास लुढ़क जाता है।

बड़ा रमणीक गाँव है। नहर का पानी सींचता है यहाँ के खेतों को और इन खेतों में गेहूँ, चना नहीं होता। जहाँ के खेत तो खेत नहीं, बगीचे हैं। जहाँ तक नजर जाय पाटल के पौधे लहरा रहे हैं। गुलाब की खेती होती है यहाँ। इत्र बनने के लिए यहाँ से गुलाब के फूल अन्यत्र जाते हैं। जब पुष्प का समय होता है, मीलों तक खिले गुलाब के पुष्पों से मण्डित धरती की शोभा-जो यहाँ आया नहीं-जिसने इस क्षेत्र को देखा नहीं, वह यहाँ के सौंदर्य का अनुमान तक नहीं कर सकता।

मोगरा, चमेली और दूसरे पुष्पों के भी पौधे जहाँ-तहाँ हैं। जल ही जगत का जीवन है। जहाँ जल की पर्याप्त सुविधा है, जीवन अपने अनेक रूपों में प्रस्फुटित, पल्लवित, प्रफुल्लित होगा ही। छोटे-छोटे उपवन हैं। सघन तरु हैं; किन्तु यह तो सब विनोद है, विलास है, उस भूमि का, वहाँ के निवासियों का। वहाँ का जीवन तो है गुलाब और उसका साम्राज्य है वहाँ।

जाड़े के दिन, कठोर शीत, सम्पूर्ण प्रकृति ही तो इस शिशिर में ठिठुर जाती है। गुलाब के पौधों में कलियाँ तो आजकल भी आती हैं किन्तु इस मीलों लम्बी-चौड़ी हरीतिमा में अपनी सुरभि-प्रसारित कर सके। अपने सौंदर्य से लोक-लोचनों को आहृद दे पाये। अपने पराग से भ्रमरों की मूंछें पीताभ बनाकर मुस्करा सके, कदाचित ही किसी एकाध कलिका को ही यह सौभाग्य मिलता है। कोई ही कलका पुष्प बन पाती है। कठोर शीत-बेचारी कलियों का बाहरी पर्दा झुलस जाता है। उसकी पाटल द्युति कालिमा से कलुष हो जाती है। जैसे शीत के भय से कलिका सिकुड़ी-ठिठुरी पड़ी रह जाती है और जब जीवन विकसित न हो पाये-सूख ही तो जाएगा वह।

देवता! तू देवता है न? इसे सार्थक कर दे तब । उस पागल को एक ही सनक है, वह सर्दी से ठिठुरी-मुर्झायी ढेर-सी कलियाँ तोड़ लेता है और शंकरजी की पिण्डी पर चढ़ा आता है। तोड़ता है और चढ़ाता है, दिन में कितनी ही बार ? कोई संख्या नहीं। कोई क्रम नहीं। आखिर वह पागल जो ठहरा।

शिवलिंग पर गुलाब की सूखी, मुरझायी कलियाँ चढ़ाकर वह चुप-चाप बैठा हुआ न जाने किन-किन भावों में खोया रहता है। यदा-कदा उसके मुख से अस्फुट शब्द भी सुनायी पड़ते हैं, देव तू तो महाकाल है, कालचक्र को अपने इशारे से नचाने वाला। न जाने कौन-सी मिट्टी कब किस खिलौने का रूप धारण कर लेगी-इसे तेरे सिवा और कौन जानता है। निर्माता तो तू ही है- जीवन का जगत का, जीवन और जगत के विभिन्न रूपों का। खिलौने टूटकर मिट्टी में बदलते हैं, मिट्टी फिर खिलौने में बदल जाती है। उसके इस अस्फुट शब्दों का कोई अन्त नहीं।

यह तो पाटल की भूमि है। इस शिशिर में भी प्रफुल्लित सौ-दो-सौ पुष्प यहीं नहीं मिलेंगे, ऐसी तो कोई बात नहीं है लेकिन वह पागल है न। उसकी दृष्टि जैसे पुष्पों को देखती ही नहीं। वह तो कलियाँ तोड़ता है, चुन-चुन कर मुरझाई, सूखी-सी कलियाँ और फिर उन्हें देवता पर चढ़ा आता है।

“अपने ही निर्माण को कुचल देने में तुझे आनन्द आता है ?” कभी-कभी वह किसी बड़ी-सी कली को तोड़ लेता है। गुलाबी पंखुड़ियाँ शीत से सूखकर पीताभ हो गयी होती है, कुछ कालिमा आ गयी होती है, कली अपने ही उस अवगुण्ठन में दृढ़ता से आबद्ध हो गयी होती है और वह उसे इस प्रकार देखता है जैसे कोई गूढ़ रहस्य ढूँढ़ता हो।

सौंदर्य , सौरभ, सौकुमार्य का यह निर्माण और फिर उसे आबद्ध करके व्यर्थ बना देना। अनेक बार वह आकाश की ओर बड़ी रहस्यमयी दृष्टि से देखता है। देखते-देखते उसके नेत्रों पर भाव तैरने लगते हैं।

शायद उसे किसी रहस्य की खोज है। सम्भवतः अपने जीवन के रहस्य की खोज। भविष्य की ओर झाँकते नयन-वर्तमान की यवनिका उठाकर अतीत में रहस्य के सूत्र खोजने लगते हैं। बड़ी-बड़ी आशाएँ थीं उसके पिता भगवती प्रसाद जी को उससे। आखिर वह उनका एकमात्र पुत्र जो था। जगदीश, हाँ तब यही नाम था उसका। इस पर सभी पारिवारिकजनों की आशाएँ टिकी हुई थीं। पिता के स्नेह के साथ सृष्टिकर्ता का भी उसे भरपूर स्नेह मिला है। सुन्दर-सुगठित देह है, जन्मजात प्रतिभा है और सम्पन्न घर मिला है। अनेक बार उसे देखकर उसके पिता मन ही मन कह उठते हैं।

‘शुचीनाँ श्रीमताँ गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।’

ब्राह्मण का यह पवित्र कुल और भगवती प्रसाद जी को तो भगवान शंकर की भक्ति पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुई है। जगदीश शैशव में ही मातृहीन हो गया यह ठीक है, किन्तु पिता ने उसे कभी माता के अभाव का अनुभव नहीं होने दिया। पुत्र का लालन-पालन और शिक्षा एक अच्छे सम्पन्न जमींदार के एकमात्र पुत्र के उपयुक्त हो, जगदीश को यह सब प्राप्त हुआ।

बचपन में जब जगदीश भस्म का त्रिपुण्ड लगाकर भगवान शंकर को मस्तक झुकाना था, जल-पुष्पादि चढ़ाकर उस गौर सुन्दर शिशु की शोभा देखने ही योग्य होती थी। अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त करके, ग्रेजुएट होकर भी वह वैसा ही आस्तिक, वैसा ही सुशील, वैसा ही विनम्र बना रहा। वह दोनों समय सन्ध्या करता है, बड़ी-सी चोटी रखता है, भस्म का त्रिपुण्ड लगाता है। जमींदार का पुत्र होकर, उच्च शिक्षा पाकर भी ग्राम के ........................ कहे जाने वाले लोगों से ...............................जाने में , उनसे दादा-चाचा कहकर बात करने में, उनकी सेवा-सहायता करने में उसे कभी हिचक नहीं होती।

गाँव के लोग भगवती प्रसाद जी को देवता कहते हैं उनकी कोठी गाँव के पीड़ितों का, रोगियों का आश्रय है। ............................ की दरिया, बड़े बर्तन गैस आदि सामग्री तो जैसे सार्वजनिक सामग्री है। किसी के यहाँ कथा-कीर्तन, ब्याह या दूसरा कोई उत्सव हो तो वह उन सामग्रियों का बड़ी सरलता से उपयोग करता है। लेकिन जगदीश भैया तो गाँव के लोगों के आत्मीय हैं। अपने घर के हैं। वे कब किसके घर पहुँचकर बीमार की खोज-खबर करने लगें। किसके दर्द करते मस्तिष्क पर औषधि मल दें, किसके रोते बालक की मुट्ठी में पैसे धर देंगे इसकी कहाँ तक कोई गणना कर सकता है। वे तो दया, सहानुभूति, सेवा और आत्मीयता की मूर्ति ही हैं।

जगदीश प्रतिभाशाली है। शिक्षा के समय वह कक्षा में सदा प्रथम रहा है। परीक्षा में विश्वविद्यालय में प्रथम रहा है। सरकार ने उसे पुरस्कृत किया है। पिता नहीं चाहते कि वह शिक्षा के लिए विदेश जाय और विदेश जाने की उसकी अपनी भी रुचि नहीं है। उसके घर कमी किस बात की है कि वह नौकरी करेगा।

जगदीश के मन में उच्च अभिलाषाएँ हैं और ये उचित भी हैं। वह प्रतिभा सम्पन्न है। कालेज के व्याख्यानों में वह सदा प्रशंसित होता रहा है। उसकी कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में आदरपूर्वक छापी जाती हैं। वह यशस्वी होना चाहता है और कोई कारण नहीं कि उसे यश न मिले। एक सुप्रसिद्ध पत्रिका के संचालकों ने उसे आमंत्रित किया है-पत्रिका का सम्पादन करने के लिए। पिता ने अनुमति दे दी है। वह जाएगा-परसों यात्रा करेगा। चला तो वह दस दिन पहले जाता; किन्तु एक महाकाव्य लिखने में लगा था वह पिछले वर्ष से । उसके महाकाव्य के अनेक अंश पत्रिका में छप चुके हैं। जिसने भी उसे सुना है, भूरि-भूरि प्रशंसा की है। आज अपना महाकाव्य उसने पूरा कर लिया है।

भगवती प्रसाद जी को अपने पुत्र से बहुत आशाएँ हैं। उनका पुत्र यशस्वी होगा। उनके कुल का गौरव बढ़ाएगा। जगदीश को अपने महाकाव्य से बहुत आशाएँ हैं। चार दिन बाद वह एक श्रेष्ठ पत्रिका का सम्पादक होगा, उसका महाकाव्य छपेगा। उस महाकाव्य पर मंगला प्रसाद पारितोषिक मिलेगा। जगदीश हिंदी संसार में सबसे कम अवस्था का सबसे अधिक प्रख्यात पुरुष होगा।

भगवती प्रसाद की आशाएं, गाँव के लोगों की आशाएं, जगदीश की आशाएं-स्रष्टा ने सबको सुयोग दिया। किन्तु स्रष्टा सुयोग देकर सफल ही होने देगा, यह कहाँ निश्चित रहता है। बलिया सदा से बाढ़ पीड़ित क्षेत्र है और गंगाजी की यह बाढ़-ऐसी भयंकर बाढ़ की तो कोई कल्पना ही नहीं कर सकता था। इस प्रकार अचानक कहीं बाढ़ आया करती है। कहते हैं कहीं कोई पर्वत टूटकर गिर गया था। गंगाजी का या उनकी किसी सहायक धारा का प्रवाह रुक गया था। जब धारा के वेग से गिरे पर्वत का बाँध टूटा, किनारे के नगर एवं ग्रामों में प्रलय आ गयी।

कितने ग्राम बहे, कितने मनुष्य या पशु मरे, कितनी हानि हुई यह कोई कैसे अनुमान करे। सरकारी कर्मचारी इधर-उधर दौड़-धूप कर रहे थे। जहाँ गाँव थे, समुद्र के समान वहाँ जल लहरा रहा था। उस प्रखर धारा में सर्वत्र एक बार घूम आना भी सरकारी नौकाओं के लिए शक्य नहीं था। जो गए, वे तो गए ही। जो बच गए थे, उनको बचाए रखने की चिन्ता कम बड़ी नहीं थी। स्थान, अन्न, वस्त्र, औषधि सहस्र-सहस्र लोगों के लिए दो चार दिनों में इनका प्रबन्ध कर लेना क्या कुछ हँसी-खेल है।

भगवती प्रसाद जी, जगदीश, उनका ग्राम-सरकारी कागजों में यह लिख दिया गया है कि गंगा की बाढ़ ने उस किनारे के ग्राम को पूरा ही बहा दिया। अब तो वहाँ गंगाजी ने अपना नवीन प्रवाह बना लिया है। क्या हुआ ग्राम का, ग्राम के लोगों का, भगवती प्रसाद जी का, जगदीश का कौन जानता है। उस बाढ़ के प्रलय प्रवाह में व्यक्तियों की खोज क्या रह सकती है?

जगदीश उस बाढ़ के प्रलय प्रवाह में भी बच गया। प्रारब्ध प्रबल था, किसी झोंपड़ी का बहता छप्पर हाथ आ गया था। बहुत दूर जाकर उसे मल्लाहों ने निकाल लिया। दुर्बलता, अनाहार, ज्वर, शोक-बेचारा जगदीश-ऐसी अवस्था में आ पहुँचा। वह कहाँ-कहाँ किस प्रकार भटकता यहाँ पहुँचा है, यह उसे भी स्मरण नहीं है।

खूब बड़ा-सा सुन्दर, सुरंग पुष्प खिला था। इस शिशिर में इतना बड़ा, इतना मोहक पुष्प-जगदीश कभी पुष्पों की ओर ध्यान नहीं देता। किन्तु इस लम्बे-चौड़े खेत में वह एकाकी पुष्प और इतना बड़ा। गाँव में आजकल नगर से एक युवक आया है। लम्बे घुँघराले बालों में सुगन्धित तैल लगाए वह प्रायः घूमता रहता है। उसका वेश, उसके वस्त्र, उसकी चाल-कोई कवि होगा। पता नहीं क्यों जगदीश जब उसे देखता है देखता ही रहता है और फिर हँस देता है। वह युवक भी घूमने आया है। वह उस पुष्प के पास खड़ा है, बड़े स्नेह से पुष्प को देख रहा है, बहुत सम्भव है कि उसका पुष्प को इस प्रकार देखना ही जगदीश की दृष्टि पुष्प की ओर खींच सका हो।

जगदीश उस युवक को देखता है और पुष्प को देखता है, वह आज कलियाँ तोड़ना भूल गया है। युवक पुष्प को तल्लीनता से देख रहा है। इधर खड़े होकर कुछ गुनगुना कर वह पुष्प को देखे जा रहा है। कितना सौंदर्य प्रेमी है यह। कितना स्नेह है इसका पुष्प से। जगदीश उसे चुपचाप देख रहा है।

युवक ने अपनी सुकोमल पतली अंगुली से फूल की टहनी हिला दी। पुष्प झूम उठा। युवक देखता रहा। अब उसने पुष्प की पंखुड़ियाँ धीरे से स्पर्श कीं। दो क्षण और-और-और-अरे युवक ने पुष्प को तोड़ लिया। तोड़कर नेत्रों से लगाया, कपोलों पर फिराया और पुष्प को लिए चल पड़ा। चल पड़ा उसके पीछे-पीछे वह भी।

युवक ने पुष्प को अपने कोट की जेब में रखा, फिर निकाला, फिर रखा बार-बार सूँघा, बार-बार घुमाया और यह क्या ? वह पुष्प की एक-एक पंखुड़ी नोंचता भूमि में गिराता चला जा रहा है। अपने गुनगुनाने में मस्त चला जा रहा है। पुष्प के प्रति उसका कुछ स्नेह भी था, यह जैसे उसे स्मरण भी नहीं। पागल जगदीश चीख पड़ा और भागा-भागा वह उलटे पैर सीधे उस शंकरजी की पिण्डी के पास पहुँचा, जहाँ उसने आज सबेरे से अंजलि भर-भर कर मुरझायी कलियाँ चढ़ाई थीं।

देवता! तू देवता है। तू ठीक करता है। ये कलियाँ धन्य हैं। ये सफल हैं। ये पुष्प बनती तो इन्हें भी कोई तोड़कर बिखेर देता। इनकी पंखुड़ियाँ भी कोई पैरों से कुचल देता। कहते-कहते उसके नेत्रों से आँसू की धाराएँ झरने लगीं। वह अपने अश्रुप्रवाह से भगवान महाकाल का अभिषेक करने लगा। जगत का प्यार जिस पर उमड़ता है, उसे कुचल देता है, नष्ट कर देता है। जगत कृतघ्न है। वह जिसे चाहता है, चूस लेता है।

जगदीश एक-एक कली को उठाता था, सिर से लगाता था और फिर भगवान शंकर की मूर्ति पर चढ़ा देता था। वह अपनी धुन में मस्त है, उसके जो मन में आती है, करता है। वह कहता जा रहा है- लेकिन हे प्रभु! तू सौंदर्य, सौरभ, सौकुमार्य देता क्यों है ? अपने आप में वह आबद्ध होकर कुचल उठे-उसमें घुटता रहे, ऐसा तू क्यों करता है ?

इसलिए कि मैं अन्तर में हूँ। अन्तर में स्थित मुझे ही अर्पित होकर जीवन सार्थक होता है, अनन्त होता है, धन्य होता है। जब कोई एकान्तनिष्ठा से विश्व के अधिदेवता को सम्बोधित करता है, वह पागल है या सचेत, इसका प्रश्न ही नहीं रह जाता। वह चिंतन उसे अपने चैतन्य के अनन्त प्रवाह से निश्चय ही आप्लुप्त कर देता है। उसे उस सर्वव्यापी को कोई हृदय की वाणी से सम्बोधित करे और उत्तर न मिले, यह तो कभी हुआ नहीं, हो सकता भी नहीं। जगदीश का अन्तर्यामी आज उसके लिए जाग गया है। वैसे तो वह नित्य जागरुक हैं। लेकिन आज वह जगदीश को उत्तर देने लगा है।

‘जो अपनी प्रतिभा, अपने सद्गुण, अपने ऐश्वर्य से जगत को तुष्ट करना चाहता है, वह बहिर्मुख होता है। जगत से उसे दो क्षण का स्नेह, कृत्रिम सुयश एवं सौहार्द्र मिलता है और वह नष्ट हो जाता है। जगत उसे चूस लेता है, नष्ट कर देता है।’ वह आज अपने अन्तर्यामी की दिव्य वाणी सुन रहा है। मैं जिस पर कृपा करता हूँ, उसे अन्तर्मुख बनाता हूँ,। उसे जगत के लोभी-लालची नेत्रों से बचाता हूँ। उसका सौरभ, उसके सद्गुण, उसके भाव अपने अन्तर में स्थिति मुझे समर्पित होते हैं। वह आनन्दमय हो जाता है। क्रीड़ा करता है।

‘राम कीन्ह चाहहि सोई होई।’

पगल जगदीश-लेकिन उसका नाम यहाँ कोई नहीं जानता। यहाँ तो वह केवल पागल कहा जाता है। अब वह रोते नहीं देखा जाता। वह रामायण की एक अर्द्धाली का आधा हिस्सा गुनगुनाया करता है और सदा-सर्वदा आनन्द में विभोर रहता है। खूब खुलकर हँसता है वह। उसकी हँसी में जीवन-बोध की सरगम गूँजती है।

‘तुम क्या गाते हो ?’ कोई भी उससे जब चाहें पूछ ले, उसका एक ही उत्तर है- “अरे रोना’-धोना मत! घबराना भी मत। राम जो करते हैं, बड़ा अच्छा करते हैं। वे हम सबका सदा मंगल ही करते हैं।”

गाँव के बाहर जो मन्दिर है, उस पर एक सन्त आए थे। बड़ी प्रसिद्धि थी उनकी। गजानन महाराज नाम था उनका। थे भी वे बड़े महान सन्त । उन्होंने उसे देखकर प्रणाम किया । बहुत देर तक उसके सामने विभोर खड़े रहे। लगता था दोनों में अन्दर ही अन्दर कुछ बात हुई। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह प्रसन्नता बिखरी हुई थीं। वे बड़े आदर भरे स्वर में गाँव वालों से बोले- धन्य हो तुम लोग, जो तुम्हारे यहाँ इतने बड़े सन्त, तत्वज्ञानी, परमहंस रहते हैं। गाँव के भोले लोग- गजानन महाराज की बात को सुनकर उसकी यथासम्भव सेवा करते हैं। उसे महात्मा मानते हैं। वह महात्मा है ? लेकिन वह महात्मा न हो तो महात्मा होगा कौन ? एक युवक जो लेखक था, जो सम्पादन बनने जा रहा था, सन्त बन गया, परम हो गया। बनाने वाले के हाथ बड़े समर्थ हैं, वह किसे कब क्या बना देगा।


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