अपनों से अपनी बात - विश्वविद्यालय का आधार बनेगा संगठन-सशक्तिकरण का महापुरुषार्थ ही

May 2002

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अब हमारे अपने गायत्री परिवार के स्वामित्व वाले देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना हो चुकी। यह हर गायत्री परिजन का है, हर भावनाशाली का है, जिसे साँस्कृतिक मूल्यों के आधार पर इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य के, वह भी शीघ्र ही एक दशक में आगमन में जरा भी संदेह नहीं है। निश्चित ही युगपरिवर्तनकारी शिक्षण पद्धति एवं महामानवों को गढ़ने वाला तंत्र वह आधारशिला रखेगा, जिससे लोकसेवी कार्यकर्ता ढलते चले जाएं स्वयं अपने पैरों पर खड़े हो सकें एवं अपने पैरों पर खड़े हो सकें एवं अपने भारतवर्ष को पुनः बृहत्तर भारत, एक समर्थ विश्वनायक राष्ट्र बनाकर ही छोड़े। स्वदेशी-स्वावलंबन- सुसंस्कारिता पर आधारित यह तंत्र निश्चित हो इसके संस्थापक सूक्ष्म- कारण रूप में सदा से ही प्रेरणा-मार्गदर्शन प्रदान करने वाले हमारे गुरुदेव द्रष्टा थे। वे दिव्य संभावनाएँ देखते थे। और अपनी परोक्ष में झाँकने की क्षमता के आधार पर ही उन्होंने वर्षों पूर्व भविष्य बता दिया था। 1926 में अखण्ड दीप प्रज्वलन से लेकर 1958 में एक विराट् वाजपेय स्तर के 1008 कुंडी गायत्री महायज्ञ द्वारा मथुरा से गायत्री परिवार के निर्माण तक वे ‘ एकोऽहं बहुस्यामि’ की उक्ति के अनुसार बहुगुणित होते चले गए। अपने द्वितीय एकवर्षीय हिमालय प्रवास से लौटते ही उनके स्वर तीखे होने लगे। युगनिर्माण योजना का सूत्रपात उन्होंने किया एवं नवयुग का संविधान रचा। पंचकोशी साधना का पत्राचार पाठ्यक्रम ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से एवं कुछ साधकों की धुरी पर क्राँतिकारी परिवर्तन कैसे आएगा। इस पर ‘महाकाल और उसकी युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ नामक लेखमाला उन्होंने जून - अक्टूबर 1967 में लिखी। फिर पुस्तक रूप में उसकी प्रस्तुति 1968 में की। यह एक प्रकार से नवजागरण का शंखनाद था। भारत को राजनैतिक आजादी तो मिल गई थी, पर साँस्कृतिक नवजागरण ने, जिसके लिए विगत ढाई सौ वर्षों से महामानव इसी धरती पर जन्म ले रहे थे। तीव्र गति युगनिर्माण योजना के सक्रिय रूप लेने पर ही पकड़ी।आज का देव संस्कृति विश्वविद्यालय एवं उसका भावी विश्वव्यापी तंत्र उस प्रक्रिया की पूर्णाहुति की वेला में ही उभरकर सामने आया है।

जून 1990 में परमपूज्य गुरुदेव ने ‘युगपरिवर्तनकारी शिक्षा और उसकी रूपरेखा’ शीर्षक से अपना संपादकीय- अपनों से अपनी बात में लिखा। इसमें वे लिखते हैं “ व्यक्ति और समाज का भावनात्मक कायाकल्प करने के लिए हमें रचनात्मक और संघर्षात्मक मोरचे खोलने पड़ेंगे । रचनात्मक कार्यों में शिक्षा और कला दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें विनाश की दिशा में मोड़कर विकास के लिए प्रयुक्त किया जाना है। हमें एक समानाँतर शिक्षातंत्र खड़ा करना है।

उद्देश्य गुरुसत्ता के समक्ष स्पष्ट था। वे चाहते थे कि जीवन जीने की कला और समाज के समग्र पुनरुत्थान की प्रक्रिया इस प्रशिक्षण की आधारशिला बने। इसके लिए शुरुआत उन्होंने ‘युगनिर्माण विद्यालय’ के रूप में गायत्री तपोभूमि में 1967 में कर दी थी। यह एक छोटा-सा शुभारंभ था,जहाँ एक वर्ष की अनौपचारिक संस्कार प्रधान शिक्षा दी जाती थी, पर वे इतने मात्र से संतुष्ट नहीं थे। वे इसी लेख में लिखते हैं, ‘एक सुव्यवस्थित योजना हमारे दिमाग में है। इन दिनों उसकी झाँकी भर करा रहे हैं। क्योंकि इस विदाई वर्ष में और कुछ करने के लिए नहीं कहेंगे अन्यथा लोगों का ध्यान बँटेगा और संगठन सशक्त मजबूत बनाने की बात से उचटकर ‘जड़ खींचना छोड़ पत्ते सींचे’ वाली कहावत चरितार्थ करने लगेंगे। अगले वर्ष एक ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना करेंगे। जो उसे अभाव की पूर्ति करेगा। जो सरकार नहीं कर सकी।”

किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि यह स्थापना कब व कहाँ हुई। हम परिजनों को बताना चाहेंगे कि यही स्थापना शाँतिकुँज सप्तसरोवर हरिद्वार में 1971 की जून में हुई। जब उन्होंने परमवंदनीया माताजी को विधिवत् मथुरा से हरिद्वार स्थानांतरित कर एक छोटे से आरण्यक में लगातार बिठा दिया एवं स्वयं एक वर्ष का तप संपन्न कर आए। पृष्ठभूमि से सारा मार्गदर्शन करने लगे। प्राण प्रत्यावर्तन, जीवन साधना, नारी जागरण, लेखन, रामायण शिक्षण, वानप्रस्थ प्रशिक्षण आदि सूत्रों का संचालन कर वे धीरे-धीरे उस प्रक्रिया को स्थापित करने लगे। जिसे शाँतिकुँज में स्थापित होने वाले देव संस्कृति विश्वविद्यालय का आधार बनाना था।

परमवंदनीया माताजी का कठोर तप, साथ में देवकन्याओं द्वारा अखण्ड दीप के समक्ष किया गया जप क्रमशः फलित हुआ। विस्तार लेते जा रहे गायत्री तीर्थ रूप कल्पवृक्ष के साये में सभी महान ऋषियों की परंपरा का बीजारोपण विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की एक अद्वितीय प्रयोगशाला का निर्माण इसी विश्वविद्यालय के इतिहास की प्रारंभिक कड़ी बने। इतना सब न होता, धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की अगणित प्रवृत्तियों का तथा उनके निमित्त क्षेत्रीय स्तर पर गायत्री शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण का कार्य नहीं चल रहा होता, तो क्या यह देव संस्कृति विश्वविद्यालय खड़ा हो पाता । सूक्ष्मीकरण की कठोर तप साधन देवदक्षिणा महा अभियान राष्ट्रीय एकता महासम्मेलनों तथा देव संस्कृति दिग्विजय के महापुरुषार्थों द्वारा ग्राम-ग्राम रज जलवंदन समारोहों, संस्कार महोत्सवों के माध्यम से तो मानो धरित्री के कण-कण को संस्कारित कर दिया गया। यह कर्म मात्र भारतवर्ष में नहीं, विश्वभर में संपन्न हुए एकवंतब जाकर 1999 की वह पावन बेला आई, जब ऋषि-परंपरा के अनुकूल ही विश्ववंद्य संतों की पावन पुण्य उपस्थिति में प्राणवान परिजनों द्वारा 23 मई को गायत्री कुँज में भूमिपूजन कर वह आधारशिला रख दी गई। जहाँ आप आम्र वृक्षों के कुँजों के बीच भव्य इमारतें खड़ी होते देख रहे हैं।

देव संस्कृति विश्वविद्यालय का मूलभूत आधार कितना सशक्त है एवं यह 1926 में प्रज्वलित अखंड दीपक की ही ऊर्जा से तपकर बना है इसे स्पष्ट देख व समझा जा सकता है। विधिवत घोषित यह तंत्र भले ही अब इस वर्ष सामने आया हो, पर सर्वधर्म सभा, जाति विहीन समाज एवं संस्कारवान् देवमानवों के संगठन की धुरी पर स्थापित नींव पर ही इसे खड़ा होना था। नया व्यक्ति नया समाज-नया युग विनिर्मित करने की प्रक्रिया वर्षों पूर्व आरंभ हो गई, उसकी अंतिम परिणतिस्वरूप यह तंत्र अब विनिर्मित होने जा रहा है। भावनाशील परिजन ही अपने बूँद-बूँद अंशदान से इसे खड़ा करेंगे, इसलिए न शासन से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता लेकर स्वयं को शर्तों से बाँधा गया है। न यू.जी.सी. का अनुदान लिया गया है। सुयोग्य छात्रों के लिए एक निःशुल्क तंत्र के रूप में खड़ा करने का दुस्साहस जरूर किया गया है। डेढ़ सौ करोड़ रुपये के इस तंत्र का शुभारंभ पूज्यवर के उसी आश्वासन के आधार पर किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ कार्यों की प्रामाणिकता देख स्वयं देवता व्यक्ति के अंदर अवतरित हो जाते हैं फिर ढेरों श्रीमंत-भामाशाह खड़े होकर श्रेय लेते चले जाते हैं। स्वर्ग से देवता फूल बरसाते हैं यह उक्ति फिर चरितार्थ होने लगती है। परमपूज्य का मत है कि ‘विवेकशीलता और उपयोगिता रहित धर्मशिक्षण शक्ति का अपव्यय ही नहीं हानिकारक भी है। स्कूली शिक्षा भी सामान्य जानकारियाँ देने के कारण अपूर्ण है। धर्मतंत्र के माध्यम से क्राँतिकारी शिक्षण पद्धति चल सकती है, क्योंकि वह भावनात्मक नवनिर्माण करती है। हमें यह स्पष्ट मस्तिष्क लेकर चलना चाहिए कि परखे हुए अध्यापकों द्वारा व्यक्ति और समाज का सर्वांगपूर्ण विकास प्रस्तुत कर सकने में समर्थ शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए और उसे प्राप्त करने वाले मस्तिष्क में यह तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए कि नौकरी के लिए नहीं प्रतिभा संवर्द्धन के लिए पढ़ा जा रहा है। (संपादकीय- जून 1970,अखण्ड ज्योति पृष्ठ 57-58)

उपर्युक्त प्रवाह के अंतर्गत ही आज से आठ वर्ष पूर्व भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा आरंभ हुई, जिसमें भागीदारी करने वालों की संख्या इस वर्ष पूरे भारत में तेईस लाख पहुँच गई। महापूर्णाहुति वर्ष में कामकाजी विद्यालयों एवं अन्य सभी विद्यालयों-’महाविद्यालय में एक लोकसेवी कार्यकर्त्ता के रूप में प्रशिक्षित होने के लिए चुना जाएगा।

प्रतिभावानों को प्रशिक्षण भी प्रतिभाएँ ही करेंगी, पाठ्य सामग्री का निर्माण भी अनुभवी प्रतिभाएं ही करेंगी। इस प्रतिभाओं को पूज्यवर ने ‘अंधड़’ नाम दिया है जो जब गतिशील होती है तो परिवर्तन की आँधी लाकर दिखा देती है। अपनी व्यक्तिगत अर्थ आकांक्षाओं को, अहं की विकृत महत्वकांक्षाओं को कुचलकर जो एक ओर कर दे और सादगी की साधुता सच्चे मन स्वीकार कर इस विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण-लेखन हेतु उपलब्ध हो सकें, इसके लिए एक व्यापक गहन मंथन चल रहा है एवं समाज तंत्र में से मणि मुक्तक खोजे जा रहे है। इस संगठन -सशक्तिकरण वर्ष में ताल्लुका-जनपद स्तर पर जो पुनर्गठन किया जा है, उसका मूल उद्देश्य भी यही है। प्रतिभाशाली तंत्र द्वारा इस अध्यात्मिक प्रधान तंत्र का सुसंचालन। युगनिर्माण योजना एक छोटी चिनगारी के रूप में आरंभ हुई थी। पर इसे अगले दिनों विशालकाय दावानल का रूप धारण करना है, ताकि समाज का कूड़ा-करवट जलकर भस्म हो जाए। इस संगठन सशक्तिकरण वर्ष में यह होना ही है, क्योंकि यही पुरुषार्थ साँस्कृतिक नवोन्मेष को गति देगा। प्रतिभाओं को विश्वविद्यालय के प्राँगण में लाकर बिठाएगा।

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