एक तुम्हीं जीवन-आधार

October 1969

Read Scan Version
<<   |   <   | |   >   |   >>

मेरे जीवन का अथ क्या है, इति क्या है, प्रभु! मैं यह भी ता नहीं जानता। मुझे ऐसा लगता है, तुम्हारे जीवन का ही एक अंश लेकर प्रादुर्भूत हुआ, प्राणी मैं केवल तुम्हारा ही हूँ। तुम्हीं मेरे भीतर और बाहर भी तुम्हीं हो। तुम्हीं मेरे सर्वस्व हो। मेरे सर्वस्व तुम्हीं तो हो।

प्रेम और प्यार के साँसारिक नाते-रिश्ते मेरे लिये क्या है? मैं संसार के लिये क्या हूँ? हाड़-माँस का पुतला। उससे लोग कितना चाहते हैं। मैं सब निकली है, उसे तुम्हारे अतिरिक्त और कौन समझेगा, मेरे प्रियतम! मेरे लिये तुम्हीं सबसे प्रिय हो। सबसे प्रिय संसार में तुम्हीं मेरे लिये हो।

मछली को मैंने जल से बाहर आकर तड़पते देखा! माँ के अगाध वात्सल्य से बाहर आकर तड़पते देखा। माँ के अगाध वात्सल्य से रिक्त होते हुये बालक का करुण क्रन्दन मैंने देखा, 14 वर्ष हो गये वनवासी प्रियतम नहीं आये, उनके प्रेम की पीर में विकल विरहिणी की पीड़ा को मैंने देखा। प्रभु! तुमसे पृथक् होकर मैं भी तो पीड़ाओं के सागर में गिर गया हूँ। मेरी सुनने वाला कोई नहीं रह गया, देवेश! मुझे ते अब अपनी इस पृथकता को देर तक बनाये रखना में खींच लो। मुझे आत्मसात् कर लो प्रभु!

मेरे मन, मेरी बुद्धि, मेरी चेतना में, अब तुम्हारा ही ध्यान शेष हैं। कहने को श्वाँस चल रही है, किन्तु यह मुझे ऊपर उठाया लिये जा रही है। नीले आकाश में जहाँ हे दिव्य! केवल तुम्हारा ही प्रकाश प्रस्फुटित हो रहा है। जहाँ केवल तुम्हीं अपने अनहद नाद से विश्व भुवन में मधुर संगीत आलोड़ित कर रहे हो। अब यह श्वाँस जो तुम्हारी दिव्य-ध्वनि में अटक गई है, पीछे नहीं लौटना चाहती सर्वेश्वर! अब इसे पीछे न लोटने दो, महाभाग! कौन जाने फिर तुम्हारी कृपा की किरण मिले या न मिले।

विचार मन्थन की प्रक्रिया में कष्ट उठाते बहुत दिन हो गये प्रभु। एक दिन मुझे ऐसा लगा था, संसार में केवल तुम्हीं सत्य हो। उस दिन मेरे जीवन की चन्द श्वाँसें तुम्हें ही समर्पित हो गई थीं। उस दिन से तुम्हारा दिया ही खाया, जो तुमने पिलाया पिया। अमृत भी, विष भी। कामनायें कभी मिटी, कभी भड़की तुमने कई बार बहुत समीप आकर मुझ व्यथित को संभाला। कई बार पुकार पर पुकार लगाई पर तुम मेरे द्वारा तक भी न आये। कभी एक क्षण के लिये भी आ जाते तो ऐसा ड़ड़ड़ड़ जीवर परिपूर्ण हो गया। एक पल की अनुभूति से ही हृदय कमल खिल उठता था, सुख की खोज के लिए ड़ड़ड़ड़ की तरह उड़ते मन की डोर टूट जाती और लगता, मुक्त में, तुम में कोई अन्तर नहीं रह गया। जो तुम, सौ में। किन्तु अगले ही क्षण कौन-सा पर्दा डाल देते हो, जो तुम एक तरफ और मैं दूसरी ओर खड़ा ताकता रह जाता हूँ। अतीत की सुधियों में खोये मन को विश्राम दो प्रभु! अब मुझ में और अधिक प्रतीक्षा की शक्ति शेष नहीं रही है। मेरी आँखें तुम्हें अपलक ढूँढ़ते थक गई हैं।

मैं अपने लिये अलग क्या हूँ। मैं तो तुमसे अलग हूँ भी नहीं। मुझमें तुम्हीं तो सुनते हो, मैंने देखा ही कब, यह तुम्हीं तो मेरी आँखों के भीतर बस कर देखते हो। मुझे क्यों दोष देते हो प्रभ्रुवर। मैंने इच्छा ही क्या की। तुम मेरे भीतर बैठकर नाना प्रकार की इच्छाएँ न जगाते तो मुझे क्या आवश्यकता थी, जो मैं संसार में भटकता। जो कुछ भी है, अच्छा या बुरा तुम्हारा ही हैं। अब मुझे इस प्रपंच में पड़कर रहा नहीं जाता, मेरे सर्वस्व! जो कुछ भी है, तुम्हारा है, सो तुम ले लो। अपना दिया हुआ सब वापस कर लो।

पीड़ाओं के सागर से निकल कर यों ही मैं एक दिन ध्यानावस्थित होकर प्रभु से अनवरत पुकार किये चला जा रहा था। वहाँ मेरे अतिरिक्त एक दूर-दूर तक निर्जन पृथ्वी थी और उसे ड़ड़ड़ड़ में भरता हुआ शुभ्र नीलाकाश। समस्त बहिर्मुखी चित्त-वृत्तियों को मैंने समेट कर अपने भीतर भर लिया था, यों कहें मैं अपने हृदय की गुफा में आ बैठा था और उसमें बैठा-बैठा उस परम ज्योति के दर्शन कर रहा था, जो इतने समीप थी, जितना मेरा हृदय और इतनी दूर कि उसे अनन्त आकाश की विशाल बाहों से भी स्पर्श करना मेरे लिये कठिन हो रहा था। मैं निरन्तर उन पावन-ज्योति परमात्मा का भजन कर रहा था। उनके भजन में मैं संसार की सुध-बुध खो बैठा था।

हे प्रभु! मुझे क्या पता तुम दोष रहित हो, ड़ड़ड़ड़ हो या सर्वथा विकार-ग्रस्त और गुणहीन। तुम प्रकृति हो या प्रकाश, निर्मल हो या मलीन मुझे तो एक दृष्टि में तुम ही तुम दिखाई दे रहे हो, तुम्हारी ही सत्ता सारे जग में समा रही है, तुम्हीं फूलों में हँस रही हो, पत्तों में डोल रहे हो। वनस्पतियों का रस और हरीतिमा भी तुम्हीं हो, सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों की चमक तुम्हीं हो, बादलों की गरज, विद्युत की चमक, मेघों का वर्षण, नक्षत्रों की गति, सब कुछ तुम्हीं हो, यह संसार तुम्हीं में सभा रहा है या तुम्हीं संसार में समा रहे हो।

तुमसे बढ़कर सुन्दरतम, रूपराशि वाला मैंने और नहीं देखा, तुम से महान् और नहीं पाया तुम्हारी जैसी करुणा तो सम्राटों के हृदय में भी नहीं देखी। पृथ्वी से भी अधिक क्षमाशील और जननी से भी बढ़कर वात्सल्य का प्रवाह भेजने वाले प्रियतम! तुम्हारे अतिरिक्त और मुझे कुछ सूझ नहीं रहा। यदि मैं किसी और का गुणगान करूँ, किसी और को देखूँ, किसी और की सुनूँ तो मेरे जीवन! में आँखें न रहें, कान न रहें, जिह्वा न रहे प्रभु! तुम्हारे प्रेम की चाह लेकर तुम्हारे द्वार पड़ा हूँ। मेरे जीवन धन! ठुकरा दो अथवा प्यार करो, अब मेरे लिए और कहीं ठौर भी तो नहीं है।

हे प्रभु! मेरा जीवन तुम्हें समर्पित है। अब मैं कहीं भी रहूँ, कैसे भी रहूँ। दुःख मिले या सुख तेरा प्रेम तो निबाहूँगा ही। मेरे मन में अब सांसारिकता की चाह नहीं रही। स्वर्ग मिले या मुक्ति, नरक मिले या पुनर्भव मुझे उसकी भी चिन्ता नहीं है, प्रभु तुम्हें पाकर अब मुझे और कुछ पाने की कामना शेष नहीं रही। हे प्रभु! तुम्हारा ही प्यार, तुम्हारा ही नाम, तुम्हारा ही भजन मेरे शरीर, मन और आत्मा में छाया रहे। हे मेरे जीवन-आधार मुझ पर तुम्हारा पूर्ण अधिकार रहे, तुम मुझ पर पूर्ण अधिकार रखना।


<<   |   <   | |   >   |   >>

Write Your Comments Here:


Page Titles