समग्र चिकित्सा अध्यात्म के समन्वय से ही सम्भव होगी

July 1983

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मनुष्य काया अद्भुत है- अनुपम है। स्थूल क्रियाकलापों की एक झांकी भर जब हतप्रभ कर देती है तो सूक्ष्म का कहना ही क्या? वास्तविकता तो यह है कि सारे स्थूल क्रिया-कलाप सूक्ष्म की हलचलों पर ही निर्भर है। चेतना के स्पन्दन दृश्यमान स्थूल के काय-कलेवर को सुरक्षित ही नहीं बनाये रखते, उसके प्रत्येक क्रिया-कलाप के प्रत्येक घटक के मूल कारण भी होते हैं। हारमोन्स रूपी अंतःस्रावी रसमय सागर व्यक्तित्व की संरचना, जीवनी शक्ति, जिजीविषा, भाव सम्वेदना, कोमलता-दृढ़ता आदि महत्वपूर्ण पर अदृश्य सामर्थ्यों का निर्धारणकर्त्ता है। इन सूक्ष्म रस स्रावों को प्रत्यक्ष तो नहीं देखा जा सकता, लेकिन इनके परोक्ष चमत्कारों की झांकी हर क्षण देखने को मिलती है। मात्र हारमोन्स ही नहीं- जीन्स व न्यूरोह्यू मरल संस्थान दोनों मिलकर पौरुष एवं दृढ़ता, करुणा एवं कोमलता के लिये भी उत्तरदायी माने जाते हैं। इनकी सूक्ष्म संरचना के कारण ही इन्हें “सटलर सिस्टम” में गिना जाता है।

स्थूल को ही मान्यता देने वाली बहिरंग प्रधान दृष्टि का एक सबसे बड़ा दुष्परिणाम जो मानव जाति को भुगतान पड़ा है। वह है- अन्तःकरण का शुष्क हो जाना, भाव सम्वेदनाओं-करुणा-उदारता जैसे गुणों का लोप होते चले जाना। आस्थाओं- उत्कृष्टता प्रधान- मान्यताओं का तो मानों आज अकाल ही हो गया है। अन्तः की यही दुर्गति आस्था संकट एवं प्रकारान्तर से रोक-शोकों का मूल कारण जान पड़ती है, ऐसा मत अब बहुसंख्य वैज्ञानिकों- मनोवैज्ञानिकों का बनता चला जा रहा है।

वृक्ष का ऐश्वर्य फल, फूल, पत्तियों के रूप में दिखाई देता है। मूल सत्ता जो इस वैभव का कारण है, उसकी जड़ों में विद्यमान है जो निरन्तर ऊर्जा खींचती और पोषण देती रहती है। जड़ें जितनी मजबूत होंगी, वृक्ष भी उतना ही दृढ़-फल वैभव से सम्पन्न होगा। ठीक यही तथ्य मानवी काया पर भी लागू होता है। अन्तःकरण में संव्याप्त आस्थाएँ- भाव-सम्वेदनाएँ ही वे जड़ें हैं जो मनुष्य को समग्र रूप से स्वस्थ ठहराती है। अन्तः यदि सूखा हो एवं दुष्चिन्तन-कुकल्पनाओं ने मस्तिष्क में घर बना रखा हो तो काया बाहर से भले ही स्वस्थ दीखे, अध्यात्म मान्यता के अनुसार अस्वस्थ ही कहलाती है। अज का रोग भूतकाल के मनोविकारों एवं शुष्क अन्तःकरण की ही परिणति हैं, यह एक सुनिश्चित सत्य है। तनाव वस्तुतः उस हिम खण्ड के समान है जो बाहर से दिखाई नहीं पड़ता, पर किसी भी क्षण जहाज से टकराकर उसे तहस-नहस कर सकता है। शरीर का हर जीवकोश अन्तः के विक्षोभ की प्रतिक्रिया बहिरंग में दिखाता है, इसे वैज्ञानिक अब “लाइ डिटेक्टर” के माध्यम से सिद्ध भी किया जा चुका है।

पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति जब निदान मात्र में ही सहयोग कर रोग निवारण के प्रयोजन में सार्थक होती नहीं दिखाई देती तो प्रश्न यह उठता है कि स्वास्थ्य संरक्षण के जन-व्यापी इस महत् तन्त्र को कैसे सही रूप दिया जाय? उत्तर एक ही है- सूक्ष्मता के दर्शन पर आधारित, आध्यात्म प्रधान चिकित्सा पद्धति को आधार बनाया जाय जो व्यक्ति की गहरी परतों को छू सके। इसमें औषधि से अधिक महत्ता देनी होगी आहार-बिहार के संयमित जीवन क्रम को, नैसर्गिक जीवन पद्धति को तथा चिन्तन की परिष्कृति को। इन सबका समुचित समन्वय जिस चिकित्सा पद्धति में हो वही सर्वांगपूर्ण उपचार प्रणाली कही जा सकती है। इसी से मनुष्य आत्मिक, मानसिक एवं कायिक दृष्टि से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर अपनी सामर्थ्यों का सुनियोजन भौतिक अथवा आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में करते हुए प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

स्वस्थ मनुष्य का अर्थ है- मनोविकारों से मुक्त स्वच्छ मन तथा अन्तः में कारुण्य, औदार्थ जैसे गुणों के बाहुल्य वाला व्यक्ति। ऐसा व्यक्ति काया की दृष्टि से कभी रोगी नहीं होता। जब कुण्ठाएँ मुक्त होती हैं- ग्रन्थियाँ सुलझ जाती हैं, तब व्यक्ति स्वयं को स्वस्थ अनुभव करता है। यही शारीरिक स्वास्थ्य की अनुभूति है। दमित भावनाएँ तो गुपचुप व्याधियों के घर बनाती रहती हैं जो समय आने पर रोग के रूप में प्रकट होती हैं और चिकित्सा के प्रयास पर न होने असाध्य रूप ले लेती हैं।

सामयिक राहत मात्र पर ही सन्तोष करना हो तो प्रचलित चिकित्सा पद्धति पर भी सन्तोष किया जा सकता है। पर यदि अस्वस्थता का आत्यन्तिक समाधान खोजना है तो गहराई में जाकर उस मूल केन्द्र को खोज निकालना होगा जहाँ से विकार जन्म लेते हैं। मेंड़ बाँधने से काम नहीं चलेगा। उफनता नाला एक स्थान से रोकने पर दूसरे स्थान से फूट पड़ता है। असंयम की मनःस्थिति शरीर से प्रकृति की अवज्ञा कराती रहेगी और दण्ड शरीर को ही भुगतना होगा। “स्प्रिचुअल पैथॉलाजी” या आध्यात्मिक रोग विज्ञान समझे बिना किसी प्रकार का न तो निदान ही सम्भव है, न चिकित्सा। ईसाई धर्म में प्रायश्चित कर्म द्वारा यही कराया जाता है। मन के हल्का होते ही शरीर भी स्वस्थ हो चुका होता है।

नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉक्टर ऐलेक्सी कैरेल के अनुसार “मनुष्य ससीम है, इस कारण समय-समय पर आस्थाओं की दृष्टि से कमजोर पड़ता- व्याधिग्रस्त होता देखा जाता है। यदि वह प्रार्थना द्वारा अपने अन्दर निहित असीम सामर्थ्य को बढ़ाने का प्रयास करे तो वह रोगमुक्त हो उस विराट् शक्ति पुँज से शान्तिरूपी वरदान पा सकता है जो कि आज की बढ़ती तनावजन्य स्थितियों में उसे अभीष्ट भी है। जिस प्रकार दृष्टिहीन मानव बसन्त के फूलों के वैभव, अरुणोदय की लालिमा, इन्द्र धनुष के सौंदर्य का आनन्द ले नहीं पाता, उसी प्रकार आस्थाहीन लोग उस परम सत्ता की शक्ति से अनभिज्ञ बने भावनात्मक विकृतियों एवं तद्जन्य रोगों से ग्रसित होते व अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं।”

भारतीय अध्यात्म इस मान्यता में दृढ़ विश्वास रखता है कि मनुष्य के शरीर का नहीं, मन मात्र का ही नहीं, अन्तःकरण का उपचार होना चाहिए। जब तक सारस सम्वेदनाओं- उदात्त भावनाओं का सिंचन इस क्षेत्र में नहीं किया जाता, मानवता रुग्णता से कभी मुक्ति नहीं पा सकती। अनास्था ही विक्षोभों को- उद्वेगों को- निषेधात्मक चिन्तन को जन्म देती है। इस “पैथालॉजी” का मापन करने वाला कोई यन्त्र नहीं है लेकिन इससे होने वाली विकृतियों की फलश्रुति जिन शरीरगत व्याधियों, मनोशारीरिक रोगों, कायविद्युत सम्बन्धी अव्यवस्थाओं के रूप में प्रकट होती हैं, उसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। साथ ही चिन्तन की परिष्कृति, दृष्टिकोण की व्यापकता तथा सुनियोजित भाव-सम्वेदनाओं की परिणति भी स्वस्थ, प्रफुल्लचित्त हल्के-फुल्के व्यक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होती है।

रोगों के मूलतः दो वर्ग माने गए हैं- आधि एवं व्याधि। आधि अर्थात् मनोरोग एवं व्याधि अर्थात् शारीरिक रोग। मधुमेह, रक्त भाराधिक्य, अपच, दमा आदि शरीरगत रोग हैं और उन्माद, सनक, अल्प मन्दता, आवेश, अवसाद आदि आधियाँ हैं। मनोविकारों की चिकित्सा पागलखानों में नहीं हो सकती। इसके लिये तो मनोआध्यात्मिक परामर्श की सेनिटोरियम व्यवस्था ही कारगर हो सकती है। वे कुण्ठाएँ- गुत्थियां सुलझाकर शारीरिक व्याधियाँ (साइकोसोमेटिक) की चिकित्सा करते हैं।

जब तक चेतना के मर्मस्थल को जो व्यक्तित्व का केन्द्रबिन्दु है, छुआ नहीं जाता, चिकित्सा अधूरी है। आज के वैज्ञानिक जिसे न्यूरोह्यूमरल एबनार्मलिटी कहते हैं, अध्यात्म चिकित्सा से ही दूर की जा सकती है। मान्यताओं को बदलना एक प्रकार का भावकल्प है। चाहे उसके लिये प्रायश्चित का सहारा लिया जाय अथवा मार्गदर्शक, स्वाध्याय, सत्संग सत्परामर्श का- उद्देश्य सदा उसका एक ही रहेगा- अन्तराल का परिशोधन परिष्कार। रुग्ण मानवता को यही चिकित्सा पद्धति अब चाहिए भी।


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