एक न्यायाधीश था (kahani)

August 1981

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एक न्यायाधीश था, वह बड़ा भक्त था, एक बार एक चोर उसके न्यायालय में लाया गया। पूछने पर कहने लगा, “जज साहब आप जैसे साधु वृत्ति के व्यक्ति के सामने उपस्थित हो मुझे बड़ा आनन्द आ रहा है। मैंने चोरी कोई अपने वश होकर नहीं की। मुझे ऐसी प्रभु प्रेरणा ही हुई कि चोरी करूं, अतः मैंने चोरी की। मेरे हाथों का दोष नहीं।’’

चोर का तर्क सुन कचहरी वाले विस्मित से रह गए व सोचने लगे कि- देखें ऐसे में न्यायाधीश अब कैसा दृष्टिकोण अपनाते हैं।

परन्तु न्यायाधीश पक्के निकले उन्होंने फैसला सुनाया, चोर का कथन पूर्णतः मान्य है जिसे भगवान् ने उसे चोरी करने की प्रेरणा की उसी भगवान की प्रेरणा से मैं इस चोर को दण्ड देता हूँ।


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