उड़ीसा के दीवान कृष्णच्न्द्र सिंह (kahani)

August 1980

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उड़ीसा के दीवान कृष्णच्न्द्र सिंह बंडे़ विलासी थे। उनके जीवन का लक्ष्य मात्र इन्द्रिय सुख में लिप्त रहना था। जब उनकी भौतिकता की अति हो गई तो पत्नी ने कहा भी ‘आप आपना सारा पुण्य इस जन्म में ही समाप्त कर देगें या अगले जन्म के लिए भी कुछ एकत्रित करेगे। अगले जन्म में आप कुछ पा सके इसके लिये अभी से परमार्थ-परायण बनिये, आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखिये।’

पत्नी की बात को कृष्णचन्द्र सिंह ऐसे ही हँसकर टाल दिया करते थे। परन्तु एक घटना ने उनका जीवन ही बदल दिया। एक बार कृष्णचन्द्र जंगल के रास्ते से आ रहे थे। रास्तें में किसी गरीब की कुटिया थी । लड़की अपने चारपाई में पडे़ हुए रोगी पिता से कह रही थी-’बाबूजी, रात घिर आयी, आपने अभी तक दीपक नहीं जलाया।”

वृद्ध ने उत्तर दिया-’बेटी! जीवन की रात्रि भी निकट है। यदि मैंने सत्कर्मों का दीपक जलाया होता, समय रहते अपने जीवन का सदुपयोग किया होता तो आज मेरी यह स्थिति न होती। मैंने अपने जीवन को भोग-विलास में र्व्यथ गँबाया। उसी के परिणामस्वरुप मैं आज व्याधियों से घिरा हुआ मरणासन्न दयनीय स्थिति में पड़ा हूँ। लगता है कि मेरा अगले जन्म का खाता भी शून्य ही होगा।’

यह कहकर वह वृद्ध विलाप करने लगा। कृष्णचन्द्र ने वृद्ध में अपना भविष्य प्रतिविम्बित पाया। वे सोचने लगे कि यदि मैं भी समय रहते नहीं चेतता तो मेरी स्थिति भी इस वृद्ध जैसी ही दयनीय होगी।

इस विचार धारा ने कृष्णचन्द्र का जीवन ही बदल दिया। उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति दीन-दुखियों और असहायों को दान दे दी और स्वयं तपोवन में जाकर साधना करने लगे।


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