ज्ञान-यज्ञ के लिये निमन्त्रण

August 1968

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जब जब ज्योति ज्ञान की जग में गई जलाई है। हुआ दुःख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥

धरती माता के कण-कण में है अकूत भण्डार ज्ञान का, नदी पर्वतों में पत्ते-पत्ते में बहता प्राण ज्ञान का, सूर्य चन्द्रमा निहारिकाओं में बसता विज्ञान ज्ञान का, यह संसार सत्य पूछो तो एकमात्र है पिण्ड ज्ञान का, पाकर जिसे प्रशस्त पन्थ होता मनुष्य के परित्राण का,

और उसी ने शक्ति, श्रेय, संपत्ति दिलाई है। हुआ दुख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥

नश्वर तन के अन्तस्थल में एक अदृश्य तत्व रहता है। अग्नि, मरुत, आकाश सभी में प्राणों का अमृत बहता है॥ बसा हुआ जो कण-कण, तृण-तृण में समष्टि का प्रण गहता है। उस अदृश्य सत्ता से ही जीवन का दृश्य-सत्य लहता है॥ उसे जान कर मुक्त बनो नर! बारम्बार ज्ञान कहता है।

ऐसे पथ-दृष्टा को पाना भूरि भलाई है। हुआ दुख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥

पिप्पलाद ने उस प्रकाश के लिये सदा पीपल फल खाये, कण्वधौर ने जीवन के क्षण उसी ज्ञान के लिये लगाये, व्यास, गणेश, अगस्त्य आदि ने, सारे इन्द्रिय सुख बिसराये, कश्यप, उद्दालक, वशिष्ठ ने सदा ज्ञान के दिये जलाये, कण-कण अन्न बीन कर खाने वाले ऋषि कणादि कहलाये,

अब भी उनके महाज्ञान की कीर्ति समाई है। हुआ दुःख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥

यह भी ज्ञान कि प्रकृति शक्तिमय, किन्तु पुरुष को भी पहचानो, ज्ञान और विज्ञान युगल में एक समन्वय की गति आनो, अमृतत्व की प्राप्ति कराये उसे लक्ष्य जीवन का मानो, पड़े रहो मत, कुण्ठाओं में उठो श्रेय पथ अनुसधानो, ज्ञान यज्ञ के लिये करवटें बदलो, अपने को भी जानो,

यह पावन सन्देश सभी के हित सुखदाई है। हुआ दुःख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥

*समाप्त*


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