जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता आत्मज्ञान

आत्मा की पुकार अनसुनी न करें

<<   |   <   | |   >   |   >>


आज सर्वत्र ज्ञान-विज्ञान की बड़ी लंबी-चौड़ी बातें होती हैं। अटलांटिक से लेकर एशिया, अफ्रीका तथा योरोप आदि का संपूर्ण भूगोल पुस्तकालयों में भरा पड़ा है। पाषाण युग से लेकर आज तक की मानव जाति का इतिहास मनुष्य रटे बैठा है। हजारों, लाखों कार्बनिक एवं अकार्बनिक रसायन तत्त्वों से प्रयोगशालाओं की शीशियां भरी पड़ी हैं। कल-कारखानों के बोझ से धरती-आसमान सभी परेशान से नजर आते हैं। जिधर आंख उठाकर देखो, साहित्य, कला, शल्य-चिकित्सा आदि के ढेरों ग्रंथ, अगणित जानकार और असंख्य प्रयोगशालाएं आज खुली हैं। इन्हें देखते हुए मनुष्य की बौद्धिक क्षमता पर अपार आश्चर्य होता है। समझ में नहीं आता कि आखिर आदमी के दिमाग में कौन-सा जादू है, जो अनेक आश्चर्यजनक उपकरण बनाता चला जाता है।

हजारों मील दूर तक उड़ जाने वाले पक्षियों की क्या मजाल कि एक छोटे-से हवाई जहाज को दौड़ में परास्त कर दें। जलयान निरंतर ही सागर की छाती पर कुहराम मचाते रहते हैं। इन्हें देखकर अन्य जलचर जीवों की क्षमता तुच्छ-सी जान पड़ने लगी है। अपने घर बैठे-बैठे हजारों मील की खबरें जान, समझ एवं देख लेते हैं। आज जैसी प्रकाशन आदि की सुविधाएं यदि प्राचीन युग में भी संभव रही होतीं, तो शायद उसी समय विश्व साहित्य का निर्माण हो गया होता। खाने-पीने से लेकर चलने-फिरने तक, बोलने, बात करने से लेकर गाने-बजाने तक के जो भी आविष्कार आज मनुष्य ने कर लिए हैं उन्हें देखकर दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है कि आखिर मनुष्य में इतनी बड़ी क्षमता का प्रादुर्भाव कहां से और कैसे हुआ?

जब एक क्षण इस मशीनी दुनिया से ध्यान हटाकर व्यावहारिक जगत की ओर देखते हैं, साधनों के साथ सुख और शांति की तुलना करने बैठते हैं, तो भारी निराशा होती है। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मनुष्य ने इतनी सारी सुविधाएं जुटाईं, वह उद्देश्य अभी तक अधूरा पड़ा है। अभी तक इनसान अपनी मंजिल की ओर सही कदम नहीं बढ़ा पाया है। आज एक ओर सभ्यता के विकास का प्रतिपादन किया जाता है, किंतु दूसरी ओर मनुजता आहें भर रही है। नाना आभूषणों, वस्त्रालंकारों से आदमी अपने शरीर को सजाता है, पर दूसरी ओर वासना की महामारी फैली है। एक ओर आमोद-प्रमोद चलता है, तो दूसरी ओर शोषण-अपहरण की चक्की में आदमी पिसा जा रहा है। शिक्षा-सभ्यता के विकास के लिए हजारों स्कूल खोजे जा रहे हैं, किंतु दूसरी ओर वे ही असुरक्षित, उद्धतता एवं अनाचार का सृजन कर रहे हैं।

इससे अलग एक और संसार है। सत्य संसार या आध्यात्मिक आस्था की दुनिया। मनुष्य सारा जीवन अपने अहंकार के पोषण में ही गंवाता रहता है, पर जब मृत्यु उसके सामने उपस्थित होती है, तो उसे इस आत्मिक संसार का पता चलता है। तब ज्ञान-विज्ञान की लंबी-चौड़ी चौकड़ी भूल जाता है। इस समय पछतावा ही हाथ लगता है। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह जीवन मिला था, वह तो तुच्छ बातों में गंवा दिया गया। सारा-का-सारा जीवन तुच्छ कामनाओं और सांसारिक गोरख धंधों में बिता दिया तो आखिरी समय क्या बन सकता है? मनुष्य भारी दिल लिए हुए इस संसार से विदा हो जाता है। यहां का सारा वैभव, व्यापार, वस्त्र, आभूषण, स्त्री, पुत्र सब यही रह जाता है। साथ में मात्र पश्चात्ताप ही जाता है। महान विजेता सिकंदर ने अपनी मृत्यु के समय प्रमुख सचिव को बुलाकर एक ही आदेश दिया था—‘‘मृत्यु के बाद मेरे दोनों हाथ अर्थी से बाहर निकालकर रखना, ताकि दर्शक यह जान लें कि सिकंदर अपने साथ कुछ भी नहीं ले गया। मृत्यु अपने लंबे हाथ राजा-रंक सभी पर फैलाती है। उससे कोई बच नहीं पाता। पर कितने आश्चर्य की बात है कि उससे निरंतर उपेक्षा ही बरती जाती है। लोग आने वाली मृत्यु का कभी विचार तक नहीं करते।’’

मनुष्य जितना समय अपनी भौतिक उन्नतियों के लिए लगाता है, उसका आधा भी यदि अपनी आत्मिक प्रगति के लिए लगाता तो अपने जीवनलक्ष्य को जरूर समझ लेता। आध्यात्मिक जीवन के शुभ परिणाम भी उसे मिलते, आत्मा-परमात्मा की संपदाओं से वह वंचित न रहता। पीछे भी ऐसा हुआ है और आगे भी होना संभव है, किंतु यह सब आत्मा की उपेक्षा करते रहने से नहीं होगा। इसके लिए भी अपनी बौद्धिक क्षमता को लगाना पड़ेगा। अपना पुरुषार्थ अर्पित करना पड़ेगा। आध्यात्मिक प्रगति के लिए भी उतनी ही लगन और तत्परता की आवश्यकता है, जितनी से आज की आश्चर्यजनक भौतिक सफलताएं मिल सकी हैं। अध्यात्म कोई जादू नहीं, जो छड़ी घुमाते ही सारे सत्परिणाम उपस्थित कर देता है। इसके लिए भी विधिवत साधना करनी पड़ती है। सुखी जीवन का आधार है—प्रेम, न्याय, अपरिग्रह, सच्चरित्रता, सौहार्द्र, सौजन्य और विवेक। इन्हें धारण करने से ही व्यक्ति दूसरी दुनिया अर्थात् आध्यात्मिक जगत में देर तक टिक सकता है। उनका अनुशीलन करने से ही उस महान उद्देश्य की पूर्ति किया जाना संभव है, जिसके लिए मनुष्य का जन्म हुआ है। ‘विश्वानि देव सवितर्दुरितानि’ की भावना बनाएं, उसी से ही यह संभव है कि आध्यात्मिक दिशा में कुछ प्रगति की जा सके।

मनुष्य ने जितनी प्रगति भौतिक जगत में की है, उससे भी अधिक की संभावना अध्यात्म में है। उसकी स्वचेतना में वह शक्ति भरी पड़ी है, जिसका उत्कर्ष-जागरण किया जा सके, तो इस संसार के सारे वैभव-विलास तुच्छ से लगेंगे। शास्त्रकार ने लिखा है—

यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतनं महत् ।
सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरम् स त्वमेव त्वमेव तत् ।।


‘‘सबकी आत्मा परब्रह्म परमात्मा है, जो विश्व से भी बड़ा है तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, वही नित्य तत्त्व है और तुम भी वही हो।’’ यह आत्मा-परमात्मा की एक रूपता देवज्ञ आप्तपुरुषों ने स्पष्ट बता दिया। परमात्मा की संज्ञा के साथ जिन शक्तियों का बोध होता है, वे सब बीज रूप से आत्मा में विद्यमान हैं। इतनी महत्त्वपूर्ण सत्ता का अधिकारी पुरुष इतना महान अवसर प्राप्त करके भी उसकी उपेक्षा करता है, तो इसे उसका दुर्भाग्य ही माना जाएगा।

दुःख और निराशा की परिस्थितियों का निर्माण अपना भौतिकवादी दृष्टिकोण बनाने में होता है। अपने दृष्टिकोण में यदि परिवर्तन कर सके होते, तो आत्मिक जगत का भी ज्ञान अवश्य मिला होता। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में सत्य का अनुशीलन किया जाए, तो आध्यात्मिक जगत के सत्परिणामों से भी लाभान्वित हुआ जा सकता है। आत्मा की उपेक्षा करते रहने से भौतिक संपदाएं कभी भी सुख नहीं दे सकतीं। शाश्वत शांति की प्राप्ति अथवा जीवनलक्ष्य की सिद्धि का एक ही माध्यम है—अध्यात्मवाद। इस पर चल पाना, देर तक टिके रहना तभी संभव है, जब आत्मा के हित की उपेक्षा न करें। उसके महत्त्व को समझें और उसकी प्राप्ति के लिए आज से, अभी से लग जाएं।

इस संसार में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं दिखाई देती जो देर तक टिकती जान पड़ती हो। जो वस्तु आज है वह कल दिखाई भी नहीं देती। आज के पहाड़ इतिहास के पन्नों में किसी समय के सागर अंकित हैं। पेड़ आज खड़ा दिखाई देता है, तो कल उसकी जड़ें तक दिखाई नहीं देतीं। समुद्र की लहरों की भांति यह जगत बनता-बिगड़ता रहता है। यदि कुछ अमृत है, अविनाशी है तो वह आत्मा है। मनुष्य जनम का उद्देश्य यही है कि वह आत्मा के माध्यम से चिन्मय परमात्मा की प्राप्ति करे। इसी को जीवनलक्ष्य आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसी की प्राप्ति के लिए ऋषियों ने जोर दिया है। गीताकार ने भी इसी की चर्चा करते हुए लिखा है—

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ।। —गीता 6.22

‘‘योगी परमेश्वर की प्राप्ति रूप लाभ से अधिक लाभ कुछ भी नहीं मानता। आत्मा को प्राप्त कर लेने से दुःख चलायमान नहीं करते। इस परमतत्त्व को धारण करने से जाना जाता है, कथन मात्र से नहीं। बाह्य ज्ञान बौद्धिक क्षमता को बढ़ाकर तद्जन्य सुख दिला सकता है, पर उससे इंद्रियनिग्रह का सुख प्राप्त करना संभव नहीं। बाह्य ज्ञान मात्र से श्रेयपथ पर नहीं चला जा सकता है। विश्व-कल्याण आत्म–ज्ञान का संपादन अत्यावश्यक है। इसी से मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति संभव है अन्य कोई चारा नहीं।’’

***

<<   |   <   | |   >   |   >>

Write Your Comments Here: