पुराना सो सोना

August 1943

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(श्री स्वामी सत्य भक्त जी महाराज, वर्घा)

भाई भूत भगत जी, आजकल तो मंहगाई के मारे बड़ी परेशानी है। कल घी लेने गया, पर बड़ी मुश्किल से साढ़े तीन रुपये सेर मिला, सो भी अच्छा नहीं था।

भूत भगत- परेशानी तो पूरी है। हाँ घी की परेशानी से कुछ दिनों के लिए मुझे जरूर छुट्टी मिल गई है।

ज्ञानदास-सो कैसे?

भूत भगत-पुराने सामान में एक घी का पीपा निकल आया है। पिताजी के हाथ का घी है वह।

ज्ञानदास-पर अब किस काम का? तुम्हारे पिताजी को गुजरे तो आठ दस वर्ष हो गये होंगे, उसके भी पहले का होगा वह घी, अब क्या इसे खाओगे?

भूत भगत-नहीं तो क्या? पिताजी के हाथ का घी भला यों ही फेंका जायेगा क्या? पुराना हुआ तो क्या हुआ? पुराना सो सोना।

ज्ञानदास-भाई साहब, पुराना तो सोना भले ही रहे पर कृपा कर उसे खाने की चेष्टा न कीजिए। पुराना जब तक अच्छा रहे, तभी तक उसका उपयोग करना चाहिए।

भूत भगत-अरे बाप दादों की चीज में क्या अच्छा क्या बुरा? आप मानें या न माने पर हमारी तुम्हारी अक्ल से बाप दादों की अक्ल अधिक थी। उसने अगर कोई चीज रक्खी है तो उससे बुराई कभी नहीं हो सकती। मेरा नाम भूत भगत है। मुझे यह नाम बुरा नहीं लगता, बल्कि इससे मैं गौरव का अनुभव करता हूँ।

ज्ञानदास-सो आप कीजिए गौरव का अनुभव, पर कृपा कर वह घी न खाइयेगा।

भूत भगत-वास्तव में आप नास्तिक हैं, आपको समझाना बेकार है। पुरुषों के विषय में आपको जरा भी सम्मान नहीं है।

ज्ञानदास-खैर साहिब, जैसी आपकी मर्जी।

(2)

ज्ञानदास-क्यों भाई? आज तो आपको बहुत देर हुई कहिए क्या काम था?

रामनाथ-पड़ौस में एक गमी हो गई थी, उसी की क्रिया के लिए श्मशान गया था।

ज्ञानदास-आपके पड़ोस में कौन मर गया?

रामनाथ- भूत भगत को तो आप जानते ही होंगे उन्हीं की मौत हो गई, बेचारे बड़े सीधे आदमी थे।

ज्ञानदास-(चौंककर) ऐ, क्या कहा, क्या भूत भगत की मृत्यु हो गई, कैसे? शायद वही पुराना घी उन्हें ले गया।

रामनाथ-हाँ, सुनते तो कुछ ऐसा ही हैं। आपको यह सब कैसे मालूम हुआ?

ज्ञानदास- अजी, उस दिन मैंने उसे बहुत रोका था। पर आखिर उसने न माना, आखिर भूतभगत ही तो था। बेचारा, ‘पुराना सो सोना’ का शिकार।

-संगम।


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