दुनिया नष्ट नहीं होगी, श्रेष्ठतर बनेगी

जनसंख्या की समस्या भी सुलझानी होगी

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   अपने पास समय की कुछ विषम समस्याएँ हैं, जिनके संबंध में उन लोगों की चिंता गहरी होती जाती है, जो मात्र अपनी उदरपूर्ति तक सीमित नहीं रहते, वरन, समाज की, विश्व की स्थिति के संबंध में भी अनुमान लगाते और उसमें आवश्यक मोड़ देने का प्रयत्न करते हैं।

इन दिनों प्रत्यक्ष और सुनिश्चित समस्याओं में सबसे बड़ी है जन- संख्या वृद्धि की समस्या। विचारशील वर्ग इससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं को समझने लगा है, किन्तु अशिक्षित, अनगढ़ वर्ग के लिए इसमें कुछ नया सूझता ही नहीं। पड़ौसियों, संबंधियों के यहाँ बच्चे होते और पलते रहते हैं, फिर हमीं क्यों चिन्ता करें? यह सोचना ऐसा ही है, जैसा यह समझना कि रोज असंख्यों व्यक्ति बीमार पड़ते और मरते रहते हैं, फिर हमें ही स्वस्थ रहने और जीवन की दिशा धारा बनाने की क्या आवश्यकता है?

     एक बहुत पुरानी बात है, लारेन्स ने एक बेकार मित्र की आर्थिक चिन्ता को देखते हुए उससे मजाक में कहा था कि किसी ऐसी विधवा से विवाह कर लो, जिसके पाँच- छः बच्चे हों। वे कमाते और तुम दोनों को खिलाते रहेंगे। पति पत्नी बैठे ठाले मजे में समय गुजारा करोगे। वह समय वास्तव में था ही ऐसा। जंगलों और जमीनों की कमीं नहीं थी। पशु चराने, घास खोदने, लकड़ी बीनने और चिड़ियाँ- मछली मारने जैसे छोटे- छोटे काम करने पर भी बच्चे कुछ न कुछ कमा लाते थे। उस कमाई के बल पर अधिक बच्चों वाला अधिक नफे में रहता था। न स्वार्थ थे, न स्वार्थों के बीच टकराव। सहयोगपूर्वक साथ रहने में ही सबको भलाई दीखती थी, इसलिए उस प्रकार की जिन्दगी पीढ़ियों तक कटती रहती थी।

पर अब वे परिस्थितियाँ बिलकुल नहीं रहीं। जमीन के चप्पे- चप्पे पर लोगों ने कब्जा कर लिया है। खाली कही जा सकने वाली ऐसी जमीन कहीं नहीं है जिसके आधार पर लाखों लोग अनायास ही गुजारा कर लेते थे। किसी गृहस्थ को किसी बात की चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी। बड़ी आबादी के लिए नये झोंपड़े बनाने होते थे, तो उसके लिए भी बाँस, फूस, लकड़ी उन्हीं सुविस्तृत सार्वजनिक जंगलों से मिल जाती थीं। पीढ़ियाँ इतनी सशक्त चली आती थीं, कि परिवार- मोटा अन्न खाकर ही खुली वायु के सहारे मोटा तगड़ा बना रहता था। पर अब वैसा कहाँ है?

     कभी भेड़ बकरी पालने की तरह बच्चे बढ़ाना भी एक कमाऊ उद्योग रहा होगा। पर अब तो उसमें घाटा ही घाटा है। उपयुक्त वस्त्र- बिस्तर, स्कूली शिक्षा, दवा- दारू, विवाह- शादी, धंधा- व्यवसाय बनाने में ढेरों धन खर्च होता है। फिर भाई- भाई परस्पर प्रतिद्वन्द्वी और ईर्ष्यालु बनकर रहते हैं। सहयोग के स्थान पर उपेक्षा ही बरतते हैं। उनके बँटवारों की, दुर्गुणों की, बुरी आदतों की समस्याएँ आये दिन उठती और बढ़ती रहती हैं। जो अपनी ही समस्याओं को नहीं सुलझा पाते वे माँ- बाप की सेवा क्यों करेंगे? यही दृश्य चारों ओर दीखते भी हैं। जिसके जितने अधिक बच्चे हैं, वह उतना ही अधिक चिन्तित, दुःखी और कर्जदार पाया जाएगा।

  नये जमाने में मान्यताएँ सुधारने के यह नये तथ्य अब धीरे- धीरे हर समझदार के मन में बैठने लगे हैं। जिन्हें प्रसव वेदना का भार लाद कर पत्नी का स्वास्थ्य चौपट करने में, अपने ऊपर पहाड़ जितना बोझ लादने में, बच्चों का भविष्य बिगाड़ने में हया शर्म नहीं है वे ही बच्चे जनने की खुशियाँ मनाते और बधाइयाँ बाँटते देखे जाते हैं। जिनमें थोड़ी भी समझदारी का अंश है, वे गृहस्थी बसा लेने पर भी प्रजनन संकट को टालने का ही प्रयत्न करते हैं।

मान्यताएँ सुधरेंगी --

    भविष्य में समझदारी बढ़ेगी और लोग नफा नुकसान का- संभव असंभव का अनुमान सही रीति से लगाने लगेंगे, तब उन्हें किसी के प्रचार से प्रभावित होकर नहीं अपने स्वविवेक के आधार पर ही यह निश्चय करना पड़ेगा कि बहुप्रजनन विपत्ति को प्रत्यक्ष निमंत्रण देना है। समय की विकटता जब अधिक बच्चे न पैदा करने के लिए लोगों को बाधित करेगी, तो वे इस आग में हाथ डालने से स्वयं ही रुकेंगे।

   लड़के अपने वृद्ध माँ- बाप की सेवा कर सकते हैं और उनकी पत्नियाँ उनके लालन पालन में कोई बाधा नहीं डालतीं तो इसमें ही क्या बुरी बात है, कि समर्थ लड़कियाँ अपने असमर्थ अभिभावकों की सेवा सुश्रूषा करें और पति के भाई बहिनों की तरह पत्नी के छोटे भाई बहन भी उस खाते पीते परिवार में अपना आश्रय प्राप्त करें। जब लड़की और लड़के का कोई अन्तर न रह जाएगा, तो इस वहम के दूर होने में भी कोई कठिनाई न रहेगी कि पुत्री नहीं पुत्र ही होना चाहिए। सच तो यह है कि लड़कियाँ सौम्य प्रकति की होने तथा स्वतंत्र परिवार बसा लेने के कारण अभिभावकों के लिए चिन्ता का विषय नहीं बनती वरन् हँसने खेलने के दिन पूरे करके अपना दायित्व अपने ही कंधे पर सँभाल लेती हैं।

        बढ़ती हुई मँहगाई में अपना निज का निर्वाह ही भारी पड़ता है। फिर बच्चों का बोझ बढ़ा कर कमर तोड़ संकट आमंत्रित करना किसे पसन्द आवेगा? अगले दिनों यह समझदारी बढ़ेगी। बढ़ती ही चलेगी। जीवनोपयोगी वस्तुओं की कमी के रहते यह संभव न होगा कि कोई संतान बढ़ाये और चैन से दिन गुजारे। तथ्य समझ में आयेंगे तो लोग इसका उपाय भी सोच लेंगे कि ब्रह्मचर्य न रह पाने पर भी, विवाह व्यवस्था बना लेने पर भी किस प्रकार प्रजनन से बचा जा सकता है। यह कुछ कठिन नहीं, अति सरल है। इस संबंध में तनिक -सी सतर्कता भर से परिवार का सीमा बंधन हो सकता है, भले ही इस सन्दर्भ में किसी औषधि या उपकरण का उपयोग न किया जाय।

       मनुष्य समय की अवज्ञा करने की हठवादिता से जब विरत नहीं होता तो प्रकृति उसका इलाज करती है। जीवनोपयोगी वस्तुओं की कमी, कुपोषण, रोग निरोधक- क्षमता का ह्रास, समस्याओं से उद्विग्न मन जैसी अनेकों समस्यायें मिल कर मनुष्य को अशक्त, अपंग, रुग्ण- पीड़ित रहने के लिए बाधित करेंगी और वे बेमौत मक्खी, मच्छरों की तरह मरेंगे।

इसके अतिरिक्त उदारता का एक क्रम दूसरा भी चलेगा कि धनी और भावनाशील स्वयं तो बच्चे न पैदा करें पर अनगढ़ लोगों की अवांछनीय सन्तानों को पालने- पोसने, उनके साथ खेलकर मन बहलाने की नई पुण्य प्रक्रिया अपनायें। यह ज्यादा अच्छा है कि हट्टे- कट्टे लोगों को वंश और वेश के नाम पर पाखंडो के सहारे लूटमारी करते रहने को रोक कर बढ़े हुये बच्चों के पालने और उन्हें सुयोग्य बनाने का नया परमार्थ कार्य चल पड़े। यह भी हो सकता है कि विधवाओं, परित्यक्ताओं को स्वावलम्बी बनाने के लिए ऐसे आधार खड़े किये जाँय जिससे उन्हें सदा आँसू बहाते हुये हेय जिन्दगी न जीनी पड़े।
      आशा की जानी चाहिए कि समझने के प्रयत्न और प्रकृति के दबाव एक प्रकार की विवशता बनकर हर आदमी को सोचने के लिए बाधित करेंगे कि गृहस्थी बसाना यदि आवश्यक ही है, तो इन डैड- लाक जैसी स्थितियों में उसे किस प्रकार निर्वाह करना है?

कई मंजिले मकान बनेंगे। आँगन, छत, छप्पर पर खाद्य उगाये जायेंगे। रेलें, मोटरें दुमंजिली बनेंगी। सड़कें बनाने के लिए सुरंगे खोदी जायेंगी। ऊर्जा के लिए प्राकृतिक गैसों का, सूर्य ताप का, गोबर गैस का आश्रय लिया जायगा।

      बेरोजगारी दूर करने के लिए थोड़ी- थोड़ी दूर पर छोटे शहर या बड़े कस्बे बसाने पड़ेंगे। गाँवों में बिखरी जमीन को समतल बनाकर उसके बड़े- बड़े फार्म बनेंगे जो सहकारी व्यवस्था के अन्तर्गत चल सकें। खाने की आदतें बदलनी पड़ेंगी। अन्न का स्थान कंद और शाक लेंगे। तिलहनों का पाउडर दूध का काम देगा। पशुओं को बड़े उद्योगों की श्रेणी में रखकर उनका लाभदायक व्यवसाय चल सकेगा। जमीन जब मनुष्यों के लिए ही कम पड़ेगी, तो पशुओं के लिए चारागाह कहाँ से आवेंगे? इससे तो अच्छा यह है कि जितनी भी जमीन बनाई जा सके उस पर जलाऊ लकड़ी या फल चारा देने वाले पेड़ लगाये जाँय। पशुओं और पेड़ों में से एक का चयन करना हो तो वृक्ष पहली श्रेणी में आते हैं और पशु दूसरी श्रेणी में। उनका मांस मँहगा होता है और हानिकर भी सिद्ध होता है।

    अगले दिनों बढ़ती समस्याओं में सर्व प्रमुख है जनसंख्या की बढ़ोत्तरी। जमीन रबड़ की तरह खींचकर बढ़ाई नहीं जा सकती। अनगढ़ प्रजा बच्चे जने बिना रह नहीं सकती। ऐसी दशा में हमें अनेक उपाय सोचने पड़ेंगे जिस आगत विभीषिका से अगले दिनों किसी प्रकार आत्म- रक्षा की जा सके। यदि कोई उपाय कारगर न हुए, तो प्रकृति का विनाश- चलेगा और आबादी उतनी ही बच पावेगी, जितनी के लिए कि धरती पर गुंजाइश है। यह अपनी बुद्धिमानी पर निर्भर है कि संतुलन हँसते- हँसाते बुद्धिमतापूर्वक बिठायें या रोते कलपते बाधित और विवश होकर। उस सीमा में रहें जिसमें कि रहने का औचित्य है।

     समझदारी इसी के लिए दी गई कि उसके सहारे कठिनाइयों का हल खोजा जाय और प्रगति की दिशा में योजनाबद्ध कदम बढ़ाया जाय। आज इसी अवलम्बन को अपनाने की सबसे अधिक आवश्यकता है।
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