दुनिया नष्ट नहीं होगी, श्रेष्ठतर बनेगी

परिवर्तन होना है राजतंत्र में भी, अर्थ तंत्र में भी

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राजतंत्र की दिशा --

       इन दिनों शासन सत्ता की शक्ति समस्त तंत्रों से ऊपर है। उसे प्रगति और अवगति दोनों की ही प्रशंसा- निन्दा सिर पर ओढ़नी होगी। परिवर्तन के इस माहौल में उसी को अपने दायित्व और ढाँचे दोनों ही बदलने के लिए तैयार होना होगा। राज्य सत्ता में भागीदारी एवं दिलचस्पी लेने वालों को अगले दिनों कुछ प्रवाह तेजी से बहते दिखाई पड़ेंगे। इसलिए अपने को उनके अनुकूल समय रहते ढाल लेने में भलाई है।

     इस संदर्भ में पहला निर्धारण है- युद्ध से कदम वापस लेने की बात सोचना। जिस विषय में सोचा जाता है उसका रास्ता भी अवश्य मिल जाता है। हर किसी को सोचना चाहिए कि इकट्ठे युद्ध का अर्थ आत्मघात है। न्याय की रक्षा और अनौचित्य के निवारण का यही एक मात्र मार्ग नहीं है। इसके अलावा भी कुछ रास्ते हैं और वे निकलेंगे। हमें इन्हीं के समर्थन की तैयारी करनी चाहिए।

      दूसरा विचारणीय प्रश्न राजनीतिज्ञों के सामने यह है कि वे क्षेत्रवाद को समेटें। देश भक्ति की दुहाई न दें। एक राष्ट्र- एक विश्व बनाने की बात सोचें। हमारा अपना मुल्क उसमें कहाँ होगा, इसका विचार न करें। अब यह सोचना जरूरी है कि शासन कितने व किसके हाथों में हो। इसके संबंध में कसौटियाँ निर्धारित हों। जो इसके योग्य हों, उन्हीं को वह जिम्मेदारी सौंपी जाय।

     आज की खर्चीली और प्रोपेगैंडा पर अवलम्बित चुनाव पद्धति में ऐसा परिवर्तन आवश्यक है, जिसमें समझदार और जिम्मेदार लोग ही संचालक तंत्र बना सकें। सर्वसाधारण को स्थानीय पंचायत स्तर की समितियाँ बनाने का हक हो। बड़ी जिम्मेदारियाँ उठाने वालों को वोट देने की योग्यता अनुबंधित हो। बहुमत आवश्यक नहीं। अल्पमत में भी जो विचारशील लोगों के वोट प्राप्त कर सकें, वे ही शासन तंत्र में पहुँचें। चुनाव लड़ने के लिए राशि खर्च करने की आवश्यकता न पड़े। सरकार ही उतना प्रबंध कर दे अथवा जनता वह खर्च वहन करे। पार्टियाँ चुनाव लड़ें, इसकी अपेक्षा यह अच्छा है कि बिना पार्टी देश में एक ही प्रजा पार्टी रहे और उसके द्वारा चुने हुए संभ्रान्त लोग शासन तंत्र चलाएँ। महत्त्वपूर्ण पदों पर भर्ती करने के लिए परीक्षाएँ उत्तीर्ण करना ही पर्याप्त नहीं, वरन् उसकी प्रतिभा, योग्यता और ईमानदारी जैसी कई कसौटियों पर कसी जाने के उपरांत ही महत्त्वपूर्ण स्थानों की पूर्ति हो सकती है।

वर्तमान स्थिति में राजनैतिक क्षेत्र में उपरोक्त तीन प्रकार के परिवर्तनों की हवा चलेगी। दैवीसत्ता इसके लिए अनुकूलता उत्पन्न करेगी। (उसके प्रभाव से) लोगों के विचार इन संभावनाओं की ओर स्वयमेव मुड़ते दिखाई पड़ेंगे। इसमें राजनैतिक क्षेत्र को प्रभावित करने वाले मनीषी एवं अर्थशास्त्री दोनों ही नये और प्रौढ़ विचार देंगे।

   अर्थ तंत्र की मर्यादाएँ - राजनीति के उपरांत दूसरा समर्थ क्षेत्र है अर्थतंत्र का। इन दिनों अर्थ तंत्र अधिक लाभदायक उत्पादन करने के लिए स्वच्छन्द है। जो रोकथाम है, वह नाम मात्र की है। लोगों की कुरुचि को भड़काने और पैसा बनाने में उसे न जनता रोक पाती है न शासन। जनमानस को प्रभावित करने वाले साहित्य, चित्र, फिल्म आदि में कुरुचि वाले उत्पादन की भरमार है। अगले दिनों इस प्रकार के उपार्जन पर रोक लगेगी। नशा उत्पन्न करने की बात कोई मानवी मौलिक अधिकार की दुहाई देकर न कर सकेगा। जो भी उत्पादन हो, उसकी उपयोगिता जनहित में सिद्ध करने के पश्चात् ही उसके निर्माण की छूट मिला करेगी।

     विवेकपूर्ण उत्पादन- जन जीवन की आवश्यकताएँ पूरी करने वाली प्रमुख वस्तुएँ कुटीर उद्योग के क्षेत्र में चली जायेगी और उन्हें सहकारी तंत्र के अंतर्गत रखते हुए ऐसी स्थिति उत्पन्न की जायेंगी कि बड़े उद्योग उनसे प्रतिद्वद्विता न करने पाएँ। वस्त्र उद्योग, जन, जीवन से संबंधित शिल्प छोटे कारखानों और छोटे कस्बों में बनने लगें, तो बेकारी की समस्या न रहेगी। बड़े कारखाने मात्र उन्हीं वस्तुओं को बनाएँ जो कुटीर उद्योगों के अंतर्गत नहीं बन सकतीं।

     अब निर्यात का सामान बहुत कम रह गया है। जो रह गया है वह भी बहुत जल्द घटेगा या समाप्त होगा। कुछ ही दिनों में सभी देश अपनी जरूरत का सामान बनाने लगेंगे। कच्चे माल को इधर- उधर करने की ही जरूरत पड़ा करेंगी। इसलिए उचित है कि पहले से ही निर्यात को महत्त्व न दिया जाय। आयात कच्चा माल का ही किया जाय। ऐसा करने से बड़े शहरों में बड़े उद्योग लगाने के कारण घिचपिच जन्य जो समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, न होंगी। शहरों का मोटापा हलका होगा और दुबले- गाँव कस्बे बनकर मजबूत दृष्टिगोचर होने लगेंगे।

उचित मुनाफा- वर्तमान धनाध्यक्ष प्रायः अधिक आमदनी वाले कारोबार बढ़ाते हैं और बड़े मिल कारखाने जमाने में अधिक लाभ देखते हैं। यह प्रवृत्ति जल्दी ही बदली जानी है। असमंजस उनके सामने है, जो बड़े व्यवसायों में फँसे हुए हैं। उन्हें समय के साथ बदलना होगा। अच्छा हो वे हठ न करें और समय रहते बदलने की प्रक्रिया आरंभ कर दें। अन्यथा एक साथ झटका पड़ने पर वे सँभल न सकेंगे। सरकारी बैंक अभी तो उन्हें बड़े उद्योगों के लिए बड़ी सुविधाएँ देती हैं, पर अगले दिनों यह भी संभव न रहेगा। आने वाले दिनों में कुटीर उद्योग ही प्रमुख होंगे। वे कस्बों में चलेंगे और सहकारी सीमित स्तर पर उनका ढाँचा खड़ा होगा।

      धनाध्यक्षों को समय की चेतावनी इतनी ही है कि समिति लाभांश में काम चलाएँ। जो कमाएँ उसमें लाभांश का सीमा बंधन हो। इसी समिति में वे श्रमिकों को भी भागीदार रखें। इस प्रकार समय बदल भी जायेगा और वे हैरान भी न होंगे। अगले दिनों अर्थ तंत्र चलेगा इसी तरह और मुड़ेगा इसी तरफ। इसलिए इस संभावना को भविष्यवाणी मानकर नोट कर लिया जाय और जिनसे इसका संबंध है, वे अपना ढर्रा अभी से बदलना आरंभ कर दें।

  खर्च और संग्रह की मर्यादा - अर्थ तंत्र की बात चल पड़ी, तो यहाँ एक और बात भी नोट करनी चाहिए कि समाज को जन साधारण के ऊपर लदे हुए आज के उत्तरदायित्व भी अपने ऊपर लेने होंगे यथा- शिक्षा- चिकित्सा, व्यवसाय आदि। आज धनिक अपने परिवार के लिए निर्वाह से अधिक धन जुटा लेते हैं। निर्धन मारे- मारे फिरते हैं। उनके स्तर में जमीन आसमान जैसा अंतर रहता है। अगले दिनों सर्वसाधारण की अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ समाज तंत्र को ही वहन करनी पड़ेगी। इसलिए आवश्यक होगा कि वही व्यक्ति उत्पादन का स्वामित्व ग्रहण करे। सरकार जिम्मेदारियाँ उठाये। कमाने वाले पूँजी जेब में रखे, हर व्यक्ति को सामर्थ्य भर काम करने पर बाधित होना होगा और औसत स्तर के अनुरूप गुजारा करने के लिए आदत डालनी होगी।

    आज कोई कितना ही धन जमा कर सकता है और मनमर्जी के कार्यों में खर्च कर सकता है। किसी को भी दे सकता है। किन्तु कल वैसी स्थिति न रहेगी। पूँजी एक तंत्र के पास जमा होगी। निजी संचय की और मनमाने अपव्यय की तब किसी को भी छूट न रहेगी। इससे दुर्व्यसनों और अपराधों का पत्ता कटेगा। चाहे जितना धन पास रखने और चाहे जिस तरह खर्च करने की सुविधा ने ही समाज में अनेकों दुष्प्रवृत्तियाँ उत्पन्न की हैं। इन्हें मिटाने के लिए पुलिस, सेना, अदालत पर्याप्त नहीं। वरन् धन संबंधी प्रचलित अराजकता पर भी अंकुश लगाना होगा। भावी अर्थ तंत्र का यही स्वरूप होगा।
     
आज संसार में अनेक प्रकार की अर्थ पद्धतियाँ प्रचलित हैं, पर अगले दिनों वह एक ही रहेगी। बृहद् परिवार व्यवस्था इसी को कहते हैं। परिवार के सभी कमाऊ लोग जो कमाते हैं, एक स्थान पर जमा करते हैं। उसी में से हर छोटे- बड़े का उसकी स्थिति तथा आवश्यकता के अनुसार काम चलता है। संसार अगले दिनों एक कुटुम्ब की तरह होगा। इसे साझे की दुकान कहना चाहिए। सभी देश अपनी भूमि, सम्पदा बड़े विश्व परिवार में विसर्जित करेंगे। यही काम व्यक्तियों को भी समाज के भण्डार में जमा करते हुए करना होगा। यह भविष्यवाणी संभावना या आवश्यकता जो भी है, पर भवितव्यता के रूप में इसे सुनिश्चित समझा जाना चाहिए।

     अभ्यास सुधारें- यह कब तक पूरा होगा? इस संदर्भ में युग संधि के भावी १६ वर्षों की चर्चा प्रायः होती रहती है। वह निरर्थक नहीं है। जो अनुपयुक्त है वह गलती चलेगी और जो उपयुक्त है, वह ढलती चलेगी। समझदार परिवर्तन का पूर्वाभास पा लेते हैं, तो समय रहते अपने चिन्तन- व्यवहार और व्यवसाय- क्रियाकलाप में तद्नुरूप हेरफेर करना आरम्भ कर देते हैं। उन्हें सुविधा रहती है। आकस्मिक टकरावों की मुसीबत नहीं सहनी पड़ती। जो अड़ियल प्रकृति के हैं, जो चल रहा है, उसी को अनादि और अनन्त मान बैठते हैं, उनके लिए बदली परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना कठिन पड़ता है।
       प्रस्तुत दुनिया बहुत ऊबड़- खाबड़ हो गई है। विगत तीन सौ वर्षों में वैज्ञानिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक परिवर्तन इतनी तेजी से हुए हैं कि इसे जादू तिलिस्म कहा जा सकता है। अब से तीन सौ वर्ष पुराना कोई व्यक्ति कहीं जीवित हो और प्रकट होकर आज की परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करे, तो उसे पग- पग पर आश्चर्यचकित रहना पड़ेगा। रेल, मोटर, जलयान, वायुयान, टेलीफोन, टेलीविजन, रेडियो, बिजली आदि का जितना प्रचलन हो चुका है इसे देखते हुए इन सभी वस्तुओं से सर्वथा अपरिचित व्यक्ति अवाक ही रह जायेगा।

       अगले बीस वर्ष इससे भी अधिक आश्चर्यजनक होंगे। इन दिनों लोग क्या सोचते, क्या चाहते, क्या करते रहते हैं, उन सब को नोट करके रखा जाय और बीस वर्ष बाद की दुनिया के साथ उसकी संगति बिठाई जाय, तो प्रतीत होगा कि दोनों की दिशाधारा में जमीन- आसमान जैसा अन्तर पड़ गया। नासमझ आदमी अपनी सम्पदा और बुद्धिमता की अकड़ में जिन प्रचलनों को उत्साह अहंकारपूर्वक अपनाए हुए हैं, उनमें से प्रत्येक को वह इस बीच परख चुका होगा। इतना ही नहीं, जो अनुपयुक्त है, उसे छोड़ने की तैयारी भी कर चुका होगा। मस्तिष्कीय हेरफेर से विचार पद्धति में जब हेरफेर होना आरम्भ हो जाता है, तो फिर क्रिया रूप का परिवर्तन कोई बहुत अधिक कठिन नहीं होता। कठिनाई आकस्मिक परिवर्तनों से आती है। जो कभी सोचा ही नहीं गया था, वह सामने आ खड़ा हो, तो आदमी हड़बड़ा जाता है और लगता है या तो किसी स्वप्न लोक से आया है या जादूगरों की दुनिया में प्रवेश कर रहा है।

       हजारों- लाखों वर्षों से यों हर क्षेत्र में प्रगति प्रयास होते रहे हैं और एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी कुछ अधिक समझदारी का परिचय देती रही है। पर अबकी बार जो हुआ है, होना है उसे तो एक प्रकार से अद्भुत ही कहना चाहिए, अभूतपूर्व भी। पिछले तीन सौ वर्षों में दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई और अगले बीस वर्षों में उसका क्या स्वरूप बनने जा रहा है, इसे तुलनात्मक दृष्टि से देखते हुए भयंकर भूकम्प की ही उपमा दी जा सकती है। यह उभय पक्षीय परिवर्तन ऐसा है, जिसे भयानक ज्वार- भाटे के समतुल्य कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

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