दुनिया नष्ट नहीं होगी, श्रेष्ठतर बनेगी

संघर्ष और सृजन का संयुक्त मोर्चा

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स्थिति की समीक्षा-

          राम- रावण युद्ध प्रायः दो महीने चला था। इसके बाद उन रीछ वानरों का क्या हुआ, जो दल- बल समेत ऋष्यमूक क्षेत्र से समेट बटोर कर लाये गये थे। नल- नील ने एक पुल बनाने के बाद पेन्शन ले ली थी क्या? भरत लक्ष्मण चँवर ही डुलाते रहते थे क्या? नहीं। वे सब सृजनात्मक कार्यों में व्यस्त हुए थे और सतयुग की वापसी का योजनाबद्ध सरंजाम जुटाते रहे थे। कृष्ण कालीन गोप गोवर्द्धन उठाने के उपरान्त छुट्टी पर नहीं चले गये थे। महाभारत भी प्रायः दो महीने में ही समाप्त हो गया था। इसके बाद उन सब लोगों ने क्या किया? इसका उत्तर भी यही है कि परीक्षित के तत्त्वावधान में सुव्यवस्थाओं की स्थापना के विशालकाय प्रयत्न हुए थे। यही रीछ- वानर करते रहे थे।

        बुद्ध की परिव्राजक दीक्षा और संघारामों के निर्माण का जो वर्णन मिलता है, वह सब मिलाकर बीस- तीस वर्षों का है। इसके उपरान्त वह लाखों की बौद्ध मण्डली विसर्जित तो नहीं हो गई थी। जेल से छूटने के उपरान्त भी सत्याग्रही सर्वोदय आदि के रचनात्मक कामों में लगे रहे हैं। इतिहासकारों की कुछ शैली ही ऐसी है कि विवाह की धूमधाम अगवानी भर का उल्लेख करते हैं। उसके उपरान्त दोनों परिवारों में क्या हलचल रही, इसका वर्णन करने में उन्हें रुचि नहीं होती। इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि आरम्भिक मारधाड़ प्रधान घटनाक्रम ही सब कुछ होता है। महत्त्वपूर्ण तो वह रहता है, जो सृजन की दृष्टि से किया जाता और लम्बे समय तक चलता है।

        बीज एक दिन में बो दिया जाता है। मुहूर्त उसी का निकालते हैं; पर फसल आने तक जो लम्बी व्यवस्था बनानी पड़ती है, उसकी चर्चा तो लोग भूल ही जाते हैं। पर इससे क्या? वर्णन उल्लेख वाले अपनी बात आप जानें, तथ्य तो जहाँ के तहाँ रहेंगे। आपरेशन एक मिनट का होता है, पर मरहम पट्टी तो घाव भरने के लिए महीनों करनी पड़ती है।

बात सूक्ष्मीकरण के सन्दर्भ में चल रही थी। (वर्तमान पहले चरण में) उसका एक पक्ष ही हमारे जिम्मे है। गाड़ी जहाँ दल- दल में फँस गई है, उसे निकाल देने और सड़क पर खड़ी कर देने जितनी ही क्षमता और अवधि अपने पास है। (यहाँ पर जिस क्षमता और अवधि का जिक्र किया गया है, वह स्थूल काया से सम्बन्धित है। स्थूल कार्यों से मुक्त होकर बड़े कार्य अगले चरणों में किए जाने हैं, उनका उल्लेख आगे की पंक्तियों में किया गया है।) पर यह नहीं समझना चाहिए कि इसके बाद कुछ करने को शेष ही नहीं रहेगा। जो करना होगा, वह इतना ही बड़ा होगा, जो पन्द्रह मिनट के आपरेशन के उपरान्त रोगी को अच्छा करने के लिए महीनों करना पड़ता है। बहुमुखी सृजन उससे कठिन है, जितना कि इस बिगाड़ को उत्पन्न करने में करना पड़ा है। लोगों ने व्यक्ति को भटकाने और समाज को गिराने वाले अनेकानेक खर्चीले श्रमसाध्य प्रयत्न किये हैं और मुद्दतों में दुर्व्यसन पनपाये, लोगों के स्वभाव के अंग बनाये हैं। अब उन्हें छुड़ाना ही नहीं, उनके स्थान पर नई व्यवस्था बनानी और नई सभ्यता खड़ी भी करनी जो है।

       हमारी दो प्रकार की कार्य पद्धति (इस पहले चरण में) है। एक को ढाल, दूसरी को तलवार कहना चाहिए। एक से अपना बचाव करना है और दूसरी से शत्रुओं को खदेड़ना है। इन दिनों खदेड़ने वाला काम प्रत्यक्षतः बड़ा दीखता है, क्योंकि उसने जीवन मरण जैसी समस्या उत्पन्न कर दी है। विनाश अपनी चरम सीमा पर है। उसे अभी और कुछ समय खेल खेलने दिया जाय, तो फिर लाखों वर्षों की संचित सभ्यता और प्रकृति का कहीं अता- पता भी न चलेगा। धरातल की दुर्गति श्मशान जैसी होगी और यहाँ कंकाल बिखरे तथा भूत नाचते दृष्टिगोचर होंगे। इस विनाश विभीषिका के उत्पादन केन्द्रों पर समय रहते गोलाबारी करनी है ताकि महाप्रलय का अवसर प्राप्त करने से पूर्व ही वे अपने हाथ पैर तुड़ा बैठें और वह न कर सकें, जो करने की डींग हाँकते और आतंक मचाते हैं।

      यह एक कार्य हुआ, वो यह हमारे अपने जिम्मे है। सूक्ष्मीकरण के उपरान्त हमें विश्वास है कि दधीचि वाला इन्द्रवज्र बन सकेगा, जो वृत्तासुर का अहम् चूर्ण कर सके। हमें विश्वास है कि जिस शान्ति और प्रगति की प्यास से धरातल जल रहा है, उसे शीतलता प्रदान करने योग्य गंगावतरण हो सकेगा। इसमें किसी भगीरथ का तप काम आ सकेगा।

        दूसरा पक्ष नर्सरी उगाने जैसा है। अगले दिनों इसी धरती को स्वर्गोपम बनाना है। मानवीय गरिमा की टूटी कई कड़ियों को फिर से जोड़ना है। जो गँवा चुके, उसे फिर से प्राप्त करना है। इसलिए इसी भूमि पर नन्दन वन, कल्पवृक्ष उद्यान उगाने की आवश्यकता पड़ेगी। इसकी तैयारी भी साथ- साथ चालू रहनी चाहिए। गोला बारूद की फैक्टरी भी पूरी तत्परता से आवश्यक सामान उत्पादन करने में निरत रहे। किन्तु दूसरी ओर विशालकाय कृषि फार्म में ऐसी नर्सरी भी बोई- उगाई जाती रहे, ताकि समय पर खोया हुआ ऊँट घड़े में न ढूँढ़ना पड़े।

     परशुराम परम्परा में ऐसा ही हुआ था। उनने एक बार आततायियों के शिर काटकर समस्त धरती को दुश्चिन्तनों से मुक्ति दिलाई थी। ब्रेन वाङ्मय का, विचार क्रान्ति का उद्देश्य पूरा किया था। इसके तुरन्त बाद उन्होंने फरसा गंगा सागर के समुद्र में फेंक दिया और नये सिरे से नया फावड़ा उठाया। इस आधार पर वे फलदार उद्यान बोते- लगाते चले गये और जो स्तब्धता आई थी, उसे नवसृजन के नये उल्लास से भर दिया। उन्होंने सभी दिशाएँ हरियाली से भर दीं। उनका दुहरा- परस्पर विरोधी अभियान देखकर लोग आश्चर्यचकित रह गये। युद्ध में शौर्य, पराक्रम और साधनों की आवश्यकता पड़ती है। पर सृजन में तो इससे हजारों गुनी सूझ- बूझ तत्परता और साधन सामग्री चाहिए। इसलिए नाम भले ही सेनापतियों का मोटी पंक्तियों में छपता रहा हो, पर वस्तुतः श्रेयाधिकारी वे इन्जीनियर ही बनते हैं, जिनने निर्माण की विशालकाय योजनाएँ बनाईं और प्राण- पण से संलग्न होकर पूरी कर दिखाई।
अस्पताल में भी मेज पर छुरी कैंची भी सजाई जाती है, पर ठीक उसकी बगल में टाँके लगाने की सुई, मरहम, गॉज रुई आदि भी तैयार रखी जाती है। अन्यथा केवल फाड़- चीर न केवल अधूरी रहेगी, वरन् बिना क्षति पूर्ति के नये किस्म के संकट भी उत्पन्न करेगी।

तैयारियाँ दोनों तरह की- हमें दोनों ही प्रबन्ध करने पड़ रहे हैं। देवशक्तियों के साथ सम्बन्ध साध कर वह सरंजाम जुटाना पड़ रहा है जिससे कि आतंक की छाती पर ऐसा घूँसा जमाया जा सके कि उसे पीछे ही हटते बने। इसके लिए हमसे बड़ों की- समर्थों की सहायता अपेक्षित हो रही है सो वह जुटाई जा रही है। जुट रही है और विश्वास है कि जितनी कम है, वह पूरी होकर रहेगी। अगले दिनों महाविनाश की घोषणा हर क्षेत्र से हो रही है। परिस्थितियों को देखने वाले एक ही बात कहते हैं कि महाविनाश अब आया- तब आया।

    इतने पर भी हम अकेले का यह कथन अन्य सभी के प्रतिकूल है कि यह दुनिया न केवल जियेगी, वरन् और भी अच्छी बनेगी। जिन्हें रुचि हो वे इस भविष्यवाणी को नोट कर लें। युद्ध जहाँ- तहाँ क्षेत्रीय स्तर के ही होते रहेंगे। कोई ऐसी विपत्ति खड़ी न होगी जिससे समूचे संसार भर के मनुष्य समुदाय का भविष्य ही संकट में घिर जाय।

         इसके अतिरिक्त दूसरा पक्ष है- सृजन का। उसके लिए ट्यूबवेल खोदना, जनरेटर बिठाना- नर्सरी उगाना है। बीज गोदाम जमा करना है। ट्रैक्टर खरीदने हैं और सरंजाम जुटाने हैं, जो लहलहाती फसल उगाने में आवश्यक होते हैं। यह साधन क्या हो सकते हैं? कहाँ हो सकते हैं? इसका उत्तर एक ही है कि अन्त तक की हमारी संचित सम्पदा इस प्रयोजन की पूर्ति में अच्छी खासी सहायता देगी। संचित सम्पदा से तात्पर्य है- संजोया हुआ गायत्री परिवार। इसमें से अधिकांश छोटे, हलके दीखते हैं। उनकी योग्यता एवं समर्थता हलकी लगती है, तो भी यह विश्वास किया जाना चाहिए कि यह कलियाँ अगले ही दिनों खिलकर फूल बनेंगी। यह अंकुर हरे- भरे पौधे बनकर समूचे कृषि क्षेत्र को लह- लहायेंगे। यह अभी के छोटे बछड़े कल- परसों हल चलायेंगे और रथ खींच दिखायेंगे। बच्चे सभी के अनगढ़ होते हैं। उन्हें शऊर कहाँ होता है। फिर भी वे देखने में कितने सुन्दर लगते हैं। उनकी अनगढ़ हरकतें भी सुहाती हैं। उनके अधरों पर भविष्य चमकता है। ऐसा ही कुछ प्रज्ञा परिवार के सम्बन्ध में कहा जाय, तो अत्युक्ति न होगी। उसमें हनुमान, अंगद निश्चय ही उँगलियों पर गिनने जितने हैं, पर कुरेदकर देखा जाय, तो जटायु और केवट, शबरी और गिलहरी की भक्ति भावना में यह समूचा समुदाय भरा पड़ा है। छोटे होने पर भी वे कहते हैं कि हमसे आशा रखी जा सकती है।

       पुरुषार्थ की तीन धाराएँ -हमारा ध्यान इन दिनों तीन ओर है। एक अपनी ओर जिसे इन्हीं दिनों अधिक दबोचा और अधिक ऊँचे स्तर का सूक्ष्मीकरण किया जाना है। इसके लिए जो कठिन प्रयास करने हैं, उनमें उत्तीर्ण होना है, अन्यथा चूकी गोली निशाना न बेध सकेगी और व्यर्थ ही उपहास होगा।

    दूसरा ध्यान विश्व समस्याओं को समझना- विश्व को मूर्धन्य दिव्य सत्ताओं का सहकार एकत्रित करना और उन केन्द्रों पर गोलाबारी करना है, जहाँ महाप्रलय के सरंजाम जमा हो रहे हैं। यह समूची प्रक्रिया सूक्ष्म जगत् की है। हम अपना ध्वज लेकर कहीं तोप बन्दूक चलाने नहीं जा रहे हैं।
     तीसरा प्रयास है उन प्रज्ञा परिजनों के प्रति जो प्राणवान हैं। उन्हें अपने हट जाने (स्थूल काया में न रहने) के कारण निराश न होने देना- बिखर जाने की स्थिति न आने देना। नर्सरी की पौधों को अपने क्रम से इतना बढ़ने देना कि उन्हें समय आने पर आरोपित किया जा सके और अभीष्ट उद्यान का सुरम्य दृश्य बिना समय गँवाये देखा जा सके।

उपरोक्त तीनों मोर्चों में से एक भी कम महत्त्व का नहीं है। इनमें से किसी एक के सहारे अभीष्ट लक्ष्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। साथ ही यह भी निश्चित है कि किसी एक को भी कम महत्त्व का समझकर छोड़ा नहीं जा सकता। तीनों ही प्रयोजनों के लिए जो बन पड़ रहा है उसे समग्र तत्परता के साथ सम्पन्न कर रहे हैं। ऐसी दशा में भेंट मिलन का पुराना लोकाचार न निभ पा रहा हो। दर्शन स्पर्श की गतिविधियों को रोककर एकाकी रहा जा रहा हो, तो अप्रिय लगने या अहंकारी स्वार्थी जैसा प्रतीत होने पर भी उसे क्षम्य समझने का अनुरोध करना पड़ रहा है। हमें अपने परिजनों की प्रज्ञा पर पूरा विश्वास है कि वे इस प्रयोजन की उच्चस्तरीय फलश्रुतियों को दृष्टिगत रख हमारी साधना प्रक्रिया में सहभागी ही बनेंगे।

श्री अरविन्द के अनुरूप --

       एकाकी तप साधना व लेखनी के योगाभ्यास के इन क्षणों में हमें योगीराज अरविन्द के कुछ कथन सहसा स्मरण हो आते हैं, जो उन्होंने परतन्त्र भारत की उन विषम परिस्थितियों में अपने एकान्तवास में व्यक्त किये थे। उन्हें शब्दशः यहाँ उद्धरित कर रहे हैं-

‘‘इतना महान और विराट् भारत जिसे शक्तिशाली होना चाहिए था, युगान्तरकारी भूमिका निभाना चाहिए था, आज दुःखी है। क्या है दुःख इसका? निश्चय ही कोई भारी त्रुटि है, जीवन्त चीज का अभाव है। हमारे पास सब कुछ है, पर हम शक्तिहीन हैं, ऊर्जा रहित हैं। हमने शक्ति की उपासना छोड़ दी, शक्ति ने हमें छोड़ दिया। माँ न अब हमारे दिल में हैं, मस्तिष्क में है, भुजाओं में है।

      इस विशाल राष्ट्र के पुनर्जीवन के कितने प्रयत्न किए गए, जाने कितने आन्दोलन हुए- धर्म, समाज, राजनीति सभी क्षेत्रों में, लेकिन सदैव दुर्भाग्य साथ रहा। हमारी शुरुआतें महान होती हैं, पर न तो उनसे नतीजे निकलते हैं, न कोई तात्कालिक फल ही हाथ लगता है। हमारे अन्दर ज्ञान की कमी नहीं। ज्ञान के उच्चतम व्यक्तित्व हमारे बीच से ही पैदा हुए हैं। लेकिन यह ज्ञान मुरदा है। एक विष है, जो हमें धीरे- धीरे मार रहा है। शक्ति के अभाव में, आत्मबल के बिना यह ज्ञान अधूरा है। भक्ति भावना- उत्साह प्रशंसनीय है। लेकिन भक्ति रूपी लपट को भी शक्ति का ईंधन चाहिए। जब स्वस्थ स्वभाव ज्ञान से प्रदीप्त, कर्म से अनुशासित और विराट् शक्ति से जुड़ता है, तभी वह ईश्वरीय कृपा का अधिकारी बनता है।

यदि हम गम्भीरता से विचार करें, तो पायेंगे कि हमें सबसे पहले शक्ति चाहिए- वह है आत्मबल, आत्मिकी की सर्वोच्च शक्ति। इसके बिना हम पंगु हैं, भारतवासी पंगु हैं, सारा विश्व पंगु है। भारत को उस शक्ति को पुनः पाना ही होगा, पुनर्जन्म लेना ही होगा; क्योंकि सारे विश्व के उज्ज्वल भविष्य के लिये इसकी माँग है। मानवता के समस्त समूहों में यह केवल भारत के लिये निर्दिष्ट है कि वह सर्वोच्च नियति को प्राप्त करे, जो सारी मानव जाति के भविष्य के लिए अत्यावश्यक है। उस शक्ति की उपासना के लिए सदैव महामानव अवतरित हुए हैं। उसी कड़ी में यदि मुझे एकाकी पुरुषार्थ हेतु नियोजित होना पड़े, तो यह मेरा परम सौभाग्य होगा।’’

   वस्तुतः योगीराज श्री अरविन्द द्वारा सन् १९०५ के आस- पास लिखे इस वक्तव्य से स्पष्ट हो जाता है कि उनके मन में भारत के उज्ज्वल भविष्य के प्रति कितनी उत्कट उमंग थी। उसी अन्तःप्रेरणा ने, परोक्ष जगत् से आए निदेर्शों ने उन्हें क्रान्तिकारी का पथ छोड़ तप साधना में निरत हो वातावरण को गरम करने हेतु विवश किया। यदि हमारी प्रस्तुत सूक्ष्मीकरण दिनचर्या को इसी साधना उपक्रम के समकक्ष समझा जाए, तो इसमें कोई अत्युक्ति न होगी। परिजन इसे उतनी ही गम्भीरता से लेंगे भी।

नवयुग जल्दी आयेगा --

       जो संकट इन दिनों सामने खड़े दृष्टिगोचर हो रहे हैं, विज्ञजनों ने जिन सम्भावनाओं का अनुमान लगाया है, वे काल्पनिक नहीं हैं। विभीषिकाएँ वास्तविक हैं, इतने पर भी विश्ववासियों को यह विश्वास करना चाहिए कि समय चक्र को बदला जाएगा और जो संकट सामने खड़े दीखते हैं, उन्हें उलटा जायेगा।

  सामान्य स्तर के लोगों की इच्छा शक्ति भी काम करती है। जनमत का भी दबाव पड़ता है। जिन लोगों के हाथ में इन दिनों विश्व की परिस्थितियाँ बिगाड़ने की क्षमता है, उन्हें जाग्रत् लोकमत के सामने झुकना ही पड़ेगा। लोकमत को जाग्रत् करने का अभियान ‘प्रज्ञा आन्दोलन’ द्वारा चल रहा है। यह क्रमशः बढ़ता और सशक्त होता जायेगा। इसका दबाव हर प्रभावशाली क्षेत्र के समर्थ व्यक्तियों पर पड़ेगा और उनका मन बदलेगा कि अपने कौशल, चातुर्य को विनाश की योजनाएँ बनाने की अपेक्षा विकास के निमित्त लगाना चाहिए। प्रतिभा एक महान शक्ति है। वह जिधर भी अग्रसर होती है, उधर ही चमत्कार प्रस्तुत करती जाती है।

      वर्तमान समस्याएँ एक- दूसरे से गुँथी हुई हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ सम्बन्ध है, चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव। बढ़ती अनीति- दुराचार हो अथवा अकाल- महामारी जैसी दैवी आपदाएँ। एक को सुलझा लिया जाय और बाकी सब उलझी पड़ी रहें, ऐसा नहीं हो सकता। समाधान एकमुखी खोजने पड़ेंगे और यदि इच्छा सच्ची है, तो उनके हल निकल कर ही रहेंगे।

      शक्तियों में दो ही प्रमुख हैं। इन्हीं के माध्यम से कुछ बनता या बिगड़ता है। एक शस्त्र बल- धन बल। दूसरा बुद्धि बल- संगठन बल। पिछले बहुत समय से शस्त्र बल और धन बल के आधार पर मनुष्य को गिराया और अनुचित रीति से दबाया गया। जो मन आया, सो कराया जाता रहा है। यही दानवी शक्ति है। अगले दिनों दैवी शक्ति को आगे आना है और बुद्धिबल तथा संगठन बल का प्रभाव अनुभव कराना है। सही दिशा में चलने पर यह दैवी सामर्थ्य क्या कुछ कर दिखा सकती है, इसकी अनुभूति सबको करानी है।

       न्याय की प्रतिष्ठा हो, नीति को सब ओर से मान्यता मिले, सब लोग हिलमिल कर रहें और मिल बाँटकर खायें, इस सिद्धान्त को जन भावना द्वारा सच्चे मन से स्वीकारा जायेगा, तो दिशा मिलेगी, उपाय सूझेंगे, नयी योजनाएँ बनेंगी, प्रयास चलेंगे और अन्ततः लक्ष्य तक पहुँचने का उपाय बन ही जायेगा।
      
आत्मवत् सर्वभूतेषु और वसुधैव कुटुम्बकम् यह दो ही सिद्धान्त ऐसे हैं, जिन्हें अपना लिये जाने के उपरान्त तत्काल यह सूझ पड़ेगा कि इन दिनों किन अवांछनीयताओं को अपनाया गया है और उन्हें छोड़ने के लिए क्या साहस अपनाना पड़ेगा, किस स्तर का संघर्ष करना पड़ेगा? मनुष्य की सामर्थ्य अपार है। वह जिसे करने की यदि ठान ले और उसे औचित्य के आधार पर अपना ले तो कोई कठिन कार्य ऐसा नहीं है, जिसे पूरा न किया जा सके। नव निर्माण का प्रश्न भी ऐसा ही है। मनुष्य कुछ बनाने पर उतारू हो, तो वह क्या नहीं बना सकता? मिश्र के पिरामिड, चीन की दीवार, ताजमहल, स्वेज तथा पनामा की नहर, पीसा की मीनार उसी के प्रयासों से ही तो बन पड़े हैं। जलयान, थलयान, नभयान के रूप में उसी की सूझ- बूझ दौड़ती है। नवयुग निर्माण के लिए प्रतिभाशाली लोगों को लोकमत के दबाव से यदि विवश किया जाय, तो कोई कारण नहीं कि ‘मनुष्य में देवत्व’ के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रक्रिया कुछ ही समय में सरलतापूर्वक सम्पन्न न की जा सकें।

     अगले दिनों एक विश्व, एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति का प्रावधान बनने जा रहा है। जाति, लिंग, वर्ण और धन के आधार पर बरती जाने वाली विषमता का अन्त समय अब निकट आ गया। इसके लिए जो कुछ करना आवश्यक है, वह सूझेगा भी और विचारशील लोगों के द्वारा पराक्रमपूर्वक किया भी जाएगा। यह समय निकट है। इसकी हम सब उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर सकते हैं।
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