दुनिया नष्ट नहीं होगी, श्रेष्ठतर बनेगी

कैसा होगा प्रज्ञायुग का समाज?

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    हमने भविष्य की झाँकी देखी है एवं बड़े शानदार युग के रूप में देखी है। हमारी कल्पना है कि आने वाला युग प्रज्ञायुग होगा। ‘प्रज्ञा’ अर्थात् दूरदर्शी विवेकशीलता के पक्षधर व्यक्तियों का समुदाय। अभी जो परस्पर आपाधापी, लोभ- मोहवश संचय एवं परस्पर विलगाव की प्रवृति नजर आती है, उसको आने वाले समय में अतीत की कड़वी स्मृति कहा जाता रहेगा। हर व्यक्ति स्वयं में एक आदर्श इकाई होगा एवं हर परिवार उससे मिलकर बना समाज का एक अवयव। सभी का चिन्तन उच्चस्तरीय होगा। कोई अपनी अकेले की ही न सोचकर सारे समूह के हित की बात को प्रधानता देगा।


   प्रज्ञायुग में हर व्यक्ति अपने आपको समाज का एक छोटा- सा घटक किन्तु अविच्छिन्न अंग मानकर चलेगा। निजी लाभ- हानि का विचार न करके विश्व हित में अपना हित जुड़ा रहने की बात सोचेगा। सबकी महत्त्वाकांक्षाएँ एवं गतिविधियाँ लोकहित पर केन्द्रित रहेंगी न कि संकीर्ण स्वार्थपरता पर। अहंता को परब्रह्म में समर्पित कर आध्यात्मिक जीवन- मुक्ति का लक्ष्य अगले दिनों इस प्रकार क्रियान्वित होगा कि किसी को अपनी चिन्ता में डूबे रहने की- अपनी ही इच्छा पूर्ति की- अपने परिवार जनों की प्रगति की न तो आवश्यकता अनुभव होगी, न चेष्टा चलेगी। एक कुटुम्ब के सब लोग जिस प्रकार मिल- बाँटकर खाते और एक स्तर का जीवन जीते हैं वही मान्यता व दिशाधारा अपनाये जाने का औचित्य समझा जायेगा।


ऋषि- मुनिगण परिवार बसाकर पर्ण कुटियों में रहते थे, लेकिन समाज से कटे हुए नहीं थे। उन दिनों लोभ- मोह के बन्धनों को काटने के प्रयास योग साधना- तप पुरुषार्थ द्वारा सम्पन्न होते थे एवं सुनियोजन सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन हेतु होता था। अब उसी कार्य को चिन्तन की उत्कृष्टता, जीवनक्रम के निर्धारण एवं वातावरण के दबाव से सम्पन्न कराया जाएगा। सभी वैसा ही जीवन जीकर सहकारी प्रयासों में निरत होंगे।


    प्रज्ञा युग के नागरिक बड़े आदमी बनने की नहीं- महामानव बनने की महत्त्वाकांक्षा रखेंगे। सच्ची प्रगति इसी में समझी जाएगी कि गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से किसने अपने आपको कितना श्रेष्ठ- समुन्नत बनाया। कोई किसी के विलास वैभव की प्रतिस्पर्धा नहीं करेगा। वरन् होड़ इस बात की रहेगी कि किसने अपने आपको कितना श्रेष्ठ, सज्जन एवं श्रद्धास्पद बनाया। वैभव इस बात में गिना जायेगा कि दूसरे को अनुकरण करने के लिए कितनी कृतियाँ और परम्पराएँ विनिर्मित कीं। आज के प्रचलन में सम्पदा को सफलता का चिह्न माना जाता है। अगले दिनों यह मापदण्ड सर्वथा बदल जाएगा और यह जाना जायेगा कि किसने मानवी गौरव गरिमा को किस प्रकार और कितना बढ़ाया?


     शरीर यात्रा के निर्वाह साधनों के अतिरिक्त प्रज्ञा युग का मनुष्य दूसरी आवश्यकता अनुभव करेगा- सद्ज्ञान की। इसके लिए आजीविका उपार्जन एवं लौकिक जानकारियाँ देने वाली स्कूली शिक्षा पर्याप्त न मानी जाएगी। वरन् यह खोजा जायेगा कि दृष्टिकोण को परिष्कृत करने- सद्गुणों की परम्परा बढ़ाने एवं व्यक्तित्त्व को प्रखर- प्रामाणिक बनाने के रीति- नीति सीखने, अपनाने का अवसर कहाँ से किस प्रकार मिल सकता है। इस प्रयोजन के लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन की उच्चस्तरीय दिशाधारा कहाँ से मिल सकती है। इसे खोजने, पाने का प्रयास निरन्तर जारी रखा जायेगा, यह कार्य ईश्वर उपासना, जीवन साधना एवं तपश्चर्या की सहायता से भी हो सकता है। ऋषिकल्प- महामानवों का सान्निध्य, सद्भाव और अनुदान तो इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि रहेगा ही।


बदलेगी जीवन दृष्टि --


   संचित कुसंस्कारिता के शमन प्रतिरोध, निराकरण पर प्रज्ञा युग के विचारशील व्यक्ति पूरा- पूरा ध्यान देंगे। संयम बरतेंगे और सन्तुलित रहेंगे। शौर्य, साहस का केन्द्र- बिन्दु यह बनेगा कि किसने अपने दृष्टिकोंण, स्वभाव,रुझान एवं आचरण में कितनी उत्कृष्टता का समावेश किया। प्रतिभा, पराक्रम एवं वैभव को इस आधार पर सराहा जायेगा कि उस उपार्जन का जनकल्याण एवं सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में कितना उपयोग हो सका। विचारशील लोग इसी आधार पर आत्म- निर्माण करेंगे और पुरुषार्थ का क्षेत्र चुनते समय निजी सुख- सुविधाओं की पूर्ति का नहीं विश्व उद्यान को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने की महानता को महत्त्व देंगे। अमीरी को नहीं मानवी गरिमा को अपनाया, सराहा जायेगा। संकीर्ण स्वर्थपरता में संलग्र व्यक्ति तब प्रतिभा के बल पर कहीं कोई श्रेय सम्मान प्राप्त नहीं करेंगे वरन् भर्त्सना के भाजन बनेंगे।

 
  श्रमशीलता को बेइज्जती या दुर्भाग्य का चिह्न न समझा जाय वरन् प्रतिभा- विकास- उपलब्धियों का उपार्जन एवं प्रखरता का परिचायक माना जाय तो ही भौतिक विकास की सम्भावना सुनिश्चित हो सकती है। श्रम का असम्मान परोक्ष रूप से दरिद्रता एवं पिछड़ेपन का आह्वान है। निठल्लेपन के साथ एक दुःखद दुर्भाग्य और जुड़ा रहता है। ‘‘खाली दिमाग शैतान की दुकान’’ की युक्ति चरितार्थ करता है। जिनके पास काम नहीं होगा उनका दिमाग दुश्चिन्तन में और शरीर दुर्व्यसनों में निरत होगा। ठाली लोगों में क्रमशः दुर्गुण बढ़ते हैं। समय काटने के लिए वे दोस्तों की तलाश में रहते हैं और जो भी उनके चंगुल में फँस जाता है उसे अपने जैसा बना लेते हैं। नई पीढ़ी की बर्बादी में इन दिनों दोस्तबाजी का एक प्रकार से भयानक दुर्व्यसन बन चला है। आवारा लोगों की चाण्डाल चौकड़ी ही इन दिनों मित्रमण्डली कहलाती है। यह समस्त अभिशाप खाली बैठने के हैं। इस तथ्य को जितनी गम्भीरतापूर्वक समझा जा सके उतना ही उत्तम है।


       प्रज्ञा युग में चिन्तन, आचरण एवं व्यवहार के सभी पक्षों में काया- कल्प जैसा हेर- फेर होगा। यही युग परिवर्त्तन है। इस परिवर्त्तन का आधार दूरदर्शी विवेकशीलता का कसौटी पर कसकर अपनाया गया औचित्य ही होगा। पिछले दिनों क्या सोचा, माना या किया जाता रहा है। इसे भावी रीति- नीति का आधार नहीं माना जाएगा वरन् तर्क, तथ्य, प्रमाण, न्याय एवं लोकहित की हर कसौटी पर कसने के उपरान्त जो खरा पाया जायेगा उसी को अपनाया जायेगा। न किसी को भूत का आग्रह होगा और न कोई भविष्य की अवज्ञा करेगा। वर्तमान का निर्धारण करते समय आज की आवश्यकता और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना को ही महत्त्व दिया जाएगा। यह निर्धारण पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाये हुए अन्तःकरण ही कर सकेंगे। अगले दिनों उन्हीं को युग ऋषि माना जायेगा और उन्हीं का निर्धारण लोक- मानस द्वारा श्रद्धापूर्वक अपनाया जायेगा।


     महत्त्वाकांक्षाओं का सही आधार है पवित्रता एवं प्रखरता की उच्चस्तरीय अभिवृद्धि। निजी जीवन में गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से अधिक उत्कृष्ट बनना और लोकोपयोगी कार्यों में सामने अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करना किसी व्यक्ति की गौरव- गरिमा का मानदण्ड बनेगा। लोग सादा जीवन- उच्च विचार की भावनाओं से प्रेरित होंगे। जीवन की गरिमा एवं सफलता इस बात में अनुभव करेंगे कि आदर्शवादी प्रगति में कितना साहस दिखाया तथा पराक्रम किया गया। अगले दिनों लोग अपनी चतुरता व सम्पदा तथा सफलता का उद्धत प्रदर्शन करने को छछोरपन मानेंगे और उच्चस्तरीय प्रतिभा का विकास एवं सदुपयोग करने में सन्तोष तथा सम्मान अनुभव करेंगे।


नीतियुक्त मर्यादित जीवन --


      युग परिवर्तन का मूलभूत आधार होगा प्रस्तुत लोक- मानस के अवांछनीय प्रवाह को मोड़- मरोडकर सही सीधी- सी दिशा में गतिशील किया जाना। इसमें से सर्वप्रथम उस व्यक्तिवादी लोभ लालच पर प्रहार होगा जो अनेकानेक स्तर की महत्त्वाकांक्षाएँ- ललक- लिप्साएँ उत्पन्न करता है। दूसरों की तुलना में अधिक सुविधा साधन समेटने और बड़प्पन दिखाने वाले सरंजाम जुटाने में लिप्त रहना ऐसी दृष्टि है जो चिन्तन और चरित्र में बेतरह निकृष्टता भरती जाती है। वासना, तृष्णा, अहन्ता पर आधारित भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण उन्हीं से बन पड़ते हैं जिनके सोचने में संग्रह, उपभोग और प्रदर्शन की निकृष्टता अनावश्यक मात्रा में घुस पड़ी है। व्यक्तित्व के इस स्तर को सर्वत्र निन्दनीय ठहराया जायेगा और इस आधार पर उसके आगे बढ़ने को पीछे हटने के लिए विवश किया जाएगा।


प्रज्ञा युग में हर व्यक्ति सामाजिक नीति मर्यादाओं को महत्व देगा। कोई ऐसा काम न करेगा जिससे मानवी गरिमा एवं समाज व्यवस्था को आँच आती हो। शिष्टाचार, सौजन्य, सहयोग, ईमानदारी वचन का पालन, निश्छलता जैसी कसौटियों पर पारस्परिक व्यवहार खरा उतरना चाहिए। अनीति का न तो सहयोग किया जाय और न प्रत्यक्ष परोक्ष समर्थन। सामाजिक सुव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि मूढ़ मान्यताओं का, अवांछनीय प्रचलनों का, हानिकारक कुरीतियों का विरोध किया जाय। इस प्रकार छल, शोषण उत्पीड़न जैसे अनाचारों से भी असहयोग, प्रतिरोध एवं संघर्ष का रुख अपनाया जाय। अनैतिक आचरण एवं अनुपयुक्त प्रचलनों को समान रूप से अहितकर माना जायेगा और उन्हें अपनाना तो दूर कोई उनका समर्थन तक करने को सहमत न होगा।


    प्रज्ञा युग में शारीरिक और मानसिक व्याधिओं से सहज ही छुटकारा मिल जायेगा। क्योंकि लोग प्रकृति के अनुशासन में रहकर आहार- विहार का संयम बरतेंगे और अन्य प्राणियों की तरह अन्तःप्रेरणा का अनुशासन मानेंगे, फलतःन दुर्बलता सतायेगी न रुग्णता। असमय बुढ़ापा आने तथा अकाल मृत्यु से मरने का भी तब कोई कारण न रहेगा। मानसिक विक्षोभ, चिन्ता, भय, कृपणता, संकीर्णता, द्वेष, छल, कपट, लोभ, मोह, अहंकार जैसे मनोविकारों के कारण उत्पन्न होते हैं। उन्हीं के कारण लोग तनाव, असन्तुलन, सनक, मतिभ्रम, आवेश, उद्वेग, उन्माद, अर्ध- विक्षिप्तता, जैसे मानसिक रोगों से ग्रसित रहकर अन्तर्द्वन्द्वों की प्रताड़ना सहन करते हैं, ऐसे ही लोग भूत- पलीतों की तरह विक्षुब्ध पाए जाते हैं।


  प्रज्ञा युग में सभी सन्तोषी, नीतिवान्, उदार एवं सरल- सौम्य जीवन पद्धति अपनायेंगे। मिल- बाँटकर खायेंगे- हँसती- हँसाती जिन्दगी जियेंगे। फलतः उन्हें हर परिस्थिति में आनन्द- उल्लास से भरा- पूरा पाया जायेगा। सभी के शरीर निरोग और मस्तिष्क शान्त- सन्तुष्ट पाये जायेंगे।


आदर्श सामाजिक व्यवस्था --


  मनुष्य की संरचना सामाजिक प्राणी के रूप में हुई है। उसे जो कुछ मिला है समाज के सहयोग एवं अनुदान द्वारा ही उपलब्ध हुआ है। अस्तु समाज को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने में भी उसका योगदान होना चाहिए। यह कार्य परिवार रूपी छोटे समाज से आरम्भ किया जाना चाहिए। आवश्यक नहीं कि अपने स्त्री- बच्चों को ही परिवार माना जाय। जिस समुदाय में खाने, सोने एवं मिलजुल कर रहने का प्रसंग बनता है, वह परिवार ही है।


इस समुदाय को अपने अवयवों की तरह माना जाय और उसे समाज का एक छोटा रूप मानकर उद्यान के माली की तरह सेवारत रहा जाय। हिलमिलकर रहने मिल बाँट- बाँटकर खाने तथा हँसती- हँसाती जिन्दगी जीने की नीति ही पारिवारिकता है। प्रज्ञा युग का हर मनुष्य शरीर निर्वाह की तरह पारिवारिकता में भी पूरा रस लेगा और प्रयत्नरत रहेगा।


धरती के उपार्जन शक्ति से कहीं अधिक इन दिनों जनसंख्या का भार बढ़ गया है। अब सन्तान भार बढ़ाने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं रही। पिता पर अर्थ- संकट, माता पर रुग्णता और अकाल मृत्यु का आक्रमण, अभाव- ग्रस्त बालकों का दयनीय भविष्य, प्रस्तुत परिवार का हक बँटाना- राष्ट्रीय प्रगति और विश्व व्यवस्था में भयानक गतिरोध जैसे अनेकों अभिशाप इन दिनों सन्तान बढ़ाने की मूर्खता के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं।


      कभी प्रजनन को सौभाग्य कहा और प्रोत्साहन दिया जाता रहा होगा, पर आज तो उसे विपत्ति को प्रत्यक्ष आमन्त्रण देना ही कहा जा सकता है। प्रज्ञायुग का हर विचारशील सन्तानोत्पादन से बचेगा और यदि वात्सल्य आनन्द लेने का मन होगा, तो किसी को गोद लेने की अपेक्षा अनेकों असहाय बालकों को पालने और सुयोग्य बनाने का भार ग्रहण करेगा।


त्रिवेणी संगम की तरह सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की समग्र साधना व्यक्ति, परिवार और समाज की त्रिविधि संरचना से ही सम्भव होती है। तीनों के बीच सघन तालमेल रहने और परस्पर सहयोगी बने रहने से ही सुख, शान्ति और प्रगति की भूमिका बनती है। इस तथ्य से अवगत होने के कारण प्रज्ञा युग का मनुष्य आज की तरह संकीर्ण स्वार्थपरता में ही निरत न रहेगा। वरन् व्यक्तित्व को प्रखर, प्रामाणिक एवं परिवार को सुसंस्कारी, स्वावलम्बी बनाने के लिए गम्भीरतापूर्वक ध्यान देगा। और उसके लिए भावभरी तत्परता के साथ प्रयत्न करेगा।


आधार बनेंगे श्रेष्ठ परिवार --


      परिवार निर्माण के माध्यम से संचालक लोग संयमी, दूरदर्शी एवं उदारमना बनते हैं, साथ ही उस वातावरण में पलने वाले को नर- रत्न बनने का अवसर मिलेगा। व्यक्तित्व और परिवार को एक- दूसरे का अगले दिनों पूरक माना जाएगा और संयुक्त परिवार की वैज्ञानिक आचार संहिता विकसित होगी।


      प्रज्ञा युग में हर व्यक्ति परिवार बसाने से पहले हजार बार विचार करेगा कि क्या उसमें साथी की प्रगति तथा सुविधा के लिए समुचित साधन जुटाने की सामर्थ्य है। क्या उसमें नये बालकों को सुसंस्कारी, सम्भ्रान्त एवं स्वावलम्बी नागरिक बना सकने की योग्यता है। यदि है तो समय एवं धन की कितनी मात्रा साथी तथा नई पीढ़ी के लिए लगा सकने की स्थिति बन सकती है। इन सभी बातों का गम्भीरतापूर्वक पर्यवेक्षण करने के उपरान्त ही विवाह का साहस किया जाया करेगा और सन्तान उत्पन्न करने से पूर्व हजार बार विचार किया जाया करेगा कि इस नई जिम्मेदारी को वहन करने के लिए पत्नी का स्वास्थ्य, पति का उपार्जन, घर का वातावरण उपयुक्त स्तर का है या नहीं। जितनी निश्चित स्थिति होगी उससे अधिक बड़ा कदम बढ़ाने का कोई दुस्साहस न करेगा। समुचित परिपालन की क्षमता न रहने पर भी बच्चे उत्पन्न करना अपना, पत्नी का, बच्चों का तथा समूचे राष्ट्र का भविष्य अंधकारमय बनाने वाला अभिशाप गिना जाएगा।


     विवाह कामुकता की तृप्ति के लिए, रूप सौन्दर्य से खेलने के लिए नहीं- वरन् साथी को स्नेह, सहयोग, सम्मान देकर जीवन की अपूर्णता दूर करने एवं मिलजुलकर अधिक उच्चस्तरीय प्रगति करने की आदर्शवादिता से प्रेरित होकर ही किये जाया करेंगे।


एक दूसरे को निभाएँगे, सहिष्णु रहेंगे। मिलजुलकर किसी निर्णय पर पहुँचेंगे। अधिकार या आग्रह न थोपेंगे। मतभेद सामान्य हो और उनके कारण कोई विग्रह उत्पन्न न हो तो इतनी उदारता भी रहनी चाहिए कि भिन्न प्रकृति की भिन्नताओं को दरगुजर किया जाता रहे। इन दिनों स्त्रियों को दासी की तरह प्रयुक्त किया जाता है, यह प्रथा उलटकर उन्हें समान अधिकार वाली सहयोगिनी का सम्मान भरा स्थान मिलेगा। शृंगार सज्जा को नारी की आन्तरिक हीनता तथा दुर्गति का चिह्न मानकर उसे अनुपयुक्त ठहराया जायेगा।


         प्रज्ञा युग में हर गृहस्थ को धरती के स्वर्ग की तरह स्नेह, सद्भाव, एवं उत्साह, उल्लास से भरा- पूरा पाया जायेगा। क्योंकि उसके सभी सदस्य श्रमशीलता, सुव्यवस्था, मितव्ययिता, उदार- सहकारिता और सुसंस्कारी सज्जनता के पंचशीलों को सुख- शांति का आधारभूत कारण होने की बात पर सच्चे मन से विश्वास करेंगे। संयुक्त संस्था के रूप में सभी परिजन उसे समुन्नत बनाने में अपने- अपने हिस्से का अनुदान प्रस्तुत करने की बात सोचेंगे, न कि जिसके पल्ले जो पड़े उतना ले भागने का उचक्कापन बरतें। सभी मिलकर परिवार में सुव्यवस्था एवं सद्भावना का ऐसा वातावरण बनायेंगे जिसके द्वारा वर्तमान से भी अधिक प्रसन्नता का अनुभव करें और उसमें रहते, पलते हुए उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ स्पष्ट रूप में झाँकती अनुभव करेंगे। ऐसे सुसंस्कृत परिवार ही नर- रत्नों की खदान बनते और उसके संचालकों को धन्य बनाते हैं।


         परिवार के सदस्यों की शरीर यात्रा, अर्थ व्यवस्था, सुख- सुविधा एवं प्रगति- सुरक्षा का प्रबन्ध तो प्रज्ञा युग में भी चलेगा; पर एक विशेषता अनिवार्य रूप से जुड़ी रहेगी कि अधिकार घटाने और कर्त्तव्य पालन बढ़ाने की दृष्टि से हर सदस्य अपने- अपने ढंग से प्रयास करें और पिछड़ने में लज्जा अनुभव करें। परिवारों को सुसंस्कारिता प्रशिक्षण की पाठशाला बनाया जायेगा और उस कारखाने में ढल- ढलकर नर- रत्न निकला करेंगे। परिवार का सारा ढाँचा, कार्यक्रम एवं विधि- विधान इस प्रकार बनेगा कि उसके सभी सदस्यों को श्रमशीलता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, सज्जनता, सहकारिता जैसी सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव में सम्मिलित करने का अवसर मिलता रहे। परिजन उदात्त दृष्टिकोंण, सघन आत्म- भाव, शालीन- सद्व्यवहार और सघन सहयोग देखकर ही परिवारों की सार्थकता और प्रगति का मूल्यांकन किया करेंगे।


     न तो अभिभावक सन्तान से वंश चलने, पिण्डदान मिलने, सेवा सहायता पाने की अपेक्षा रखें और न सन्तान अपने अभिभावकों की छोड़ी सम्पदा के सहारे गुलछर्रे उड़ाने की बात सोचें। दोनों के बीच विशुद्ध स्नेह सद्भाव का रिश्ता होगा और एक- दूसरे के प्रति कर्त्तव्य पालन करते हुए अपनी श्रद्धा शालीनता बढ़ाने का अभ्यास करेंगे। कन्या और पुत्र के बीच कहीं कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। दोनों को समान स्नेह सम्मान एवं महत्त्व मिलेगा। सन्तानों के विवाह की तब तक जल्दी न की जायेगी जब तक वे स्वावलम्बी और नये गृहस्थ के अनेकानेक उत्तरदायित्वों का भार उठाने में समर्थ न हो जायें। सन्तान में अमीरों की महत्त्वाकांक्षाभड़काई जाय। और न आलसी, विलासी,अहंकारी बनने जैसी सुविधा प्रदान की जाय। सुसंस्कारिता प्रदान करना ही सन्तान की सबसे बड़ी सेवा सहायता मानी जायेगी।


कुछ अपवादों को छोड़कर हर काम नियत समय पर पूरा करना,वस्तुओं को यथास्थान सुरक्षित एवं सुसज्जित रखना, फैशन को छछोरपन मानकर उससे बचना, दूर रहना, सादगी और स्वच्छता से सुरुचि का परिचय देना, बजट बनाकर आमदनी से कम खर्च करना और बचत की थोड़ी गुंजाइश रखना, एक- दूसरे का हाथ बँटाना, सहानुभूति और सहयोग का रुख रखना, नम्रता और मिठास भरा व्यवहार करना, चरणस्पर्श और अभिवादन का परिपालन, शिष्टाचार, अनुशासन का निर्वाह, स्वच्छता और सुसज्जा के लिए मिलजुलकर प्रयास करना, टूट- फूट की मरम्मत एक उपयोगी कला- कौशल के रूप में सीखना और प्रयुक्त करना, घर में जहाँ भी स्थान हो पुष्प, बेलें एवं शाक- भाजी उगाना जैसी प्रथा परम्परा घर में डालना जैसे प्रचलन अभ्यास में उतर सकें तो हर घर में स्वर्गीय वातावरण बन सकता है। रात्रि को कथा प्रवचन, प्रातः सायं पूजा आरती, सहगान कीर्तन जैसे धर्म- कृत्यों से भी परिवार को आस्थावान बनने का अवसर मिलता है।


जागेंगी सहकारी प्रवृत्तियाँ --


         एक नया गृह- उद्योग ‘‘लार्जर फैमिली’’ सुसंचालित परिवार -- के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। आज के संयुक्त परिवार तो अनुशासनहीनता और आचार- संहिता के अभाव में स्वार्थों की खींचतान के अखाड़े बन गये हैं। उत्तराधिकार की ललक तथा काम न करने में बड़प्पन समझे जाने के कारण अनेकों विग्रह खड़े हो रहे हैं। जिस स्वरूप में संयुक्त परिवार इन दिनों चल रहे हैं वे अपनी प्रतिगामिता और अस्त- व्यस्तता के कारण अधिक दिन न चल सकेंगे और संयुक्त परिवार पद्धति पाश्चात्य देशों की तरह समाप्त हो जाने का संकट बढ़ेगा, पर उसे वैज्ञानिक, शास्त्रीय, व्यावहारिक एवं सुविधाजनक बनाने का दूसरा नया तरीका ‘‘लार्जर फैमिली’’ एक सहकारी संस्था के रूप में विकसित हो सकेगी। मोहल्ले के सभी काम मिल- जुलकर एक स्थान पर सम्पन्न हो। भोजन बनाना, कपड़े धोना, बच्चे खिलाना, साझे की दुकान, ट्यूशन, स्कूल, मनोरंजन आदि दैनिक जीवन की सभी आवश्यकताएँ अलग- अलग पूरी करते रहने के स्थान पर यदि संयुक्त रूप से पारस्परिक श्रम नियोजित करके पूरी की जाने लगें तो स्थान, समय, श्रम, पैसे की भी भारी बचत हो सकती है एवं अनेकों उपयोगी कार्य सम्पन्न होते रह सकते हैं। व्यक्तिगत सुविधा स्वतन्त्रता तो इसमें है ही, पारिवारिकता एवं सहकारिता का लाभ मिलता रहेगा। ऐसा प्रचलन चल पड़ने पर सारे समुदाय की शक्ति का अपव्यय बचेगा एवं उसे राष्ट्र के रचनात्मक कार्यों में लगाया जा सकेगा।


    व्यक्ति, परिवार और समाज की ऐसी आदर्श संरचना को मात्र कल्पना या यूटोपिया न माना जाय, एक द्रष्टा की ऐसी भविष्यवाणी मानी जाय जो आगामी कुछ दशकों में ही साकार होकर रहेगी। इसे कौन सम्पन्न करेगा? यह प्रश्न गौण है। हर वह व्यक्ति जिसमें उच्चस्तरीय भावनाएँ बीज रूप में विद्यमान हैं, परोक्ष जगत् की सहायता से प्रज्ञायुग को अवतरित करने की भूमिका निभाने हेतु पुरुषार्थ करेगा। वे कषाय- कल्मष, लोभ- मोह के बन्धन जो उसे आज घेरे हैं, आने वाले कल में अपने पाश से मुक्त कर चुके होंगे। ऐसी पीढ़ी जन्म ले चुकी है एवं विकसित हो रही है। हमारी सूक्ष्मीकरण साधना उसे वैसा ही पोषण देने में नियोजित होगी जैसा अपेक्षित है।
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