दुनिया नष्ट नहीं होगी, श्रेष्ठतर बनेगी

नीतियुक्त मर्यादित जीवन

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युग परिवर्तन का मूलभूत आधार होगा प्रस्तुत लोक-मानस के अवांछनीय प्रवाह को मोड़-मरोडकर सही सीधी-सी दिशा में गतिशील किया जाना। इसमें से सर्वप्रथम उस व्यक्तिवादी लोभ लालच पर प्रहार होगा जो अनेकानेक स्तर की महत्त्वाकांक्षाएँ- ललक-लिप्साएँ उत्पन्न करता है। दूसरों की तुलना में अधिक सुविधा साधन समेटने और बड़प्पन दिखाने वाले सरंजाम जुटाने में लिप्त रहना ऐसी दृष्टि है जो चिन्तन और चरित्र में बेतरह निकृष्टता भरती जाती है। वासना, तृष्णा, अहन्ता पर आधारित भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण उन्हीं से बन पड़ते हैं जिनके सोचने में संग्रह, उपभोग और प्रदर्शन की निकृष्टता अनावश्यक मात्रा में घुस पड़ी है। व्यक्तित्व के इस स्तर को सर्वत्र निन्दनीय ठहराया जायेगा और इस आधार पर उसके आगे बढ़ने को पीछे हटने के लिए विवश किया जाएगा।

प्रज्ञा युग में हर व्यक्ति सामाजिक नीति मर्यादाओं को महत्व देगा। कोई ऐसा काम न करेगा जिससे मानवी गरिमा एवं समाज व्यवस्था को आँच आती हो। शिष्टाचार, सौजन्य, सहयोग, ईमानदारी वचन का पालन, निश्छलता जैसी कसौटियों पर पारस्परिक व्यवहार खरा उतरना चाहिए। अनीति का न तो सहयोग किया जाय और न प्रत्यक्ष परोक्ष समर्थन। सामाजिक सुव्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि मूढ़ मान्यताओं का, अवांछनीय प्रचलनों का, हानिकारक कुरीतियों का विरोध किया जाय। इस प्रकार छल, शोषण उत्पीड़न जैसे अनाचारों से भी असहयोग, प्रतिरोध एवं संघर्ष का रुख अपनाया जाय। अनैतिक आचरण एवं अनुपयुक्त प्रचलनों को समान रूप से अहितकर माना जायेगा और उन्हें अपनाना तो दूर कोई उनका समर्थन तक करने को सहमत न होगा।

प्रज्ञा युग में शारीरिक और मानसिक व्याधिओं से सहज ही छुटकारा मिल जायेगा। क्योंकि लोग प्रकृति के अनुशासन में रहकर आहार-विहार का संयम बरतेंगे और अन्य प्राणियों की तरह अन्तःप्रेरणा का अनुशासन मानेंगे, फलतःन दुर्बलता सतायेगी न रुग्णता। असमय बुढ़ापा आने तथा अकाल मृत्यु से मरने का भी तब कोई कारण न रहेगा। मानसिक विक्षोभ, चिन्ता, भय, कृपणता, संकीर्णता, द्वेष, छल, कपट, लोभ, मोह, अहंकार जैसे मनोविकारों के कारण उत्पन्न होते हैं। उन्हीं के कारण लोग तनाव, असन्तुलन, सनक, मतिभ्रम, आवेश, उद्वेग, उन्माद, अर्ध-विक्षिप्तता, जैसे मानसिक रोगों से ग्रसित रहकर अन्तर्द्वन्द्वों की प्रताड़ना सहन करते हैं, ऐसे ही लोग भूत-पलीतों की तरह विक्षुब्ध पाए जाते हैं।

प्रज्ञा युग में सभी सन्तोषी, नीतिवान्, उदार एवं सरल-सौम्य जीवन पद्धति अपनायेंगे। मिल-बाँटकर खायेंगे- हँसती-हँसाती जिन्दगी जियेंगे। फलतः उन्हें हर परिस्थिति में आनन्द-उल्लास से भरा-पूरा पाया जायेगा। सभी के शरीर निरोग और मस्तिष्क शान्त-सन्तुष्ट पाये जायेंगे।

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