दुनिया नष्ट नहीं होगी, श्रेष्ठतर बनेगी

दोनों तरह के युद्धों पर लगेगा अंकुश

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        पशु तात्कालिक समस्याओं पर सोचता है। उसे न भविष्य की चिन्ता होती है और न परिवर्तनों से बचाव करने की। न विपन्नता के बीच सुविधा सोचने की क्षमता होती है। किन्तु मनुष्य को स्रष्टा का सर्वोपरि उपहार दूरदर्शी बुद्धिमत्ता के रूप में मिला है। वह भविष्य की कल्पना कर सकता है। आज की परिस्थितियाँ- कल क्या प्रतिफल उत्पन्न करेंगी? इसका अनुमान तर्क, तथ्य और अनुभव के आधार पर लगाया जा सकता है? मानवीय सुरक्षा और प्रगति का बहुत कुछ आधार इस विशेषता पर ही निर्भर है। भविष्य के प्रति उत्सुकता का अनुमान इस आधार पर भी लगाया जाता है कि ज्योतिषी, भविष्यवक्ता हर किसी को आकर्षित करते हैं। समाचार पत्रों में राशि फल, भविष्यफल छपते रहते हैं। प्रस्तुत समस्याओं के संबंध में मनीषी वर्ग प्रायः इस विषय पर चर्चा करता रहता है कि भविष्य की समस्याएँ क्या हो सकती हैं? और उनके समाधान क्या निकल सकते हैं?

       शीतयुद्ध और गरम युद्ध दो प्रकार की लड़ाइयाँ होती हैं। इसमें शीतयुद्ध कम कष्ट कर और गरम युद्ध देखने में भयंकर वीभत्स लगते हैं, पर परिणाम दोनों के लगभग एक जैसे होते हैं। शीतयुद्ध को कैंसर और गरम युद्ध को हृदयाघात कह सकते हैं। पर दोनों ही ऐसे होते हैं, जो प्राण हरण करके रहें।
        शीतयुद्ध- आज का शीतयुद्ध जनसंख्या का अनियंत्रित अभिवर्धन है। वह चक्रवृद्धि गति से बढ़ता है। अब से १० हजार वर्ष पूर्व संसार भर में १५ लाख आबादी कूती जाती है। पर चक्रवृद्धि का चमत्कार तो देखिए इन दिनों ५०० करोड़ मनुष्य इस धरती पर रहते हैं और रोकथाम करते हुए भी अगली शताब्दी में कम से कम दूनी आबादी हो जाने की संभावना व्यक्त की जाती है। जब आज के मनुष्य की दैनिक आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती और महँगाई का बोझ औसत मनुष्य की कमर तोड़ता है, तो जब आबादी दूनी हो जायेगी, तब स्थिति क्या होगी? इसकी भयावह कल्पना कर सकना किसी भी दूरदर्शी के लिए कठिन न होना चाहिए। हमें सर्वप्रथम इसी संकट का मुकाबला करना चाहिए। सर्वप्रथम इसलिए कहा जा रहा है कि इसका समाधान जन सामान्य के हाथों है। लोग अपना चिंतन बदल दें और व्यवहार में थोड़ा अंतर करें, तो इतने भर से विपत्ति की रोकथाम हो सकती है।

दौड़ती गाड़ी रुकने में कुछ देर लगती है। इस आधार पर दूनी जनसंख्या पहुँचने तक पूरी तरह ब्रेक न कसे जा सकें और विराम न मिले, ऐसी आशंका है। यदि इतना बन पड़े, तो भी संतोष की साँस ली जा सकती है और समुद्र पर तैरती खेती करके किसी हद तक समाधान सोचा जा सकता है। समुद्र में अभी भी जहाँ- तहाँ ऐसे द्वीप हैं, जिनमें भूमि की उर्वरता और पीने का पानी मिल सकता है। उनमें बसावट की अभी भी गुंजाइश है। तैरते उपनगर भी समुद्र तट के बड़े नगरों के इर्द- गिर्द बसाये जा सकते हैं। आकाश में बस्ती बसाना तो क्लिष्ट कल्पना है, पर इन प्रयोजनों के लिए समुद्र और भूमि के वीरान क्षेत्रों को उपजाऊ बनाने का, रेगिस्तानों को नखलिस्तान बनाने का प्रयोग एक सीमा तक सफल हो सकता है। पर्वतों पर भी वृक्ष विकास के साथ- साथ आबादी बढ़ाने की कल्पना भी तथ्यहीन नहीं है। आपत्तिकाल में ऐसे ही उपायों से ठूँस- ठास का प्रयोजन पूरा हो सकता है।

        गरम युद्ध- दूसरा गरम युद्ध है- तीसरे महायुद्ध का संकट जिससे समूची मानव जाति आतंकित है। परमाणु युद्ध, विष गैसें तथा मृत्यु किरणें, उपग्रह आदि के मारक साधन जिस तेजी से बढ़ रहे हैं और उनका भण्डारण जिस विशाल परिमाण में हो रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि यह खेलने के खिलौने नहीं हैं। इतना विपुल धन और साधन इसके लिए लगाया जा रहा है, उसे सनक या अपव्यय नहीं माना जा रहा है। निर्माताओं का ख्याल है कि एक दिन वे शत्रु पक्ष पर इस जखीरे को अचानक उड़ेल देंगे। स्वयं बच जायेंगे और समूची धरती पर निष्कंटक राज्य करेंगे। समस्त संसार की जनशक्ति- धनशक्ति और कौशल शक्ति उनके हाथ में होगी। थल, नभ और जल पर उनका विशाल साम्राज्य स्थापित होगा।

       पर यह योजना बनाने वाले यह भूल जाते हैं कि एक पक्षीय युद्ध नहीं हो सकता। विपक्षी भी हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठा रहेगा। उभयपक्षीय प्रहारों से कोई भी जीतेगा नहीं। दोनों हारेंगे। युद्ध भले ही एक दिन चले, पर उसके उपरांत समस्याएँ ऐसी होंगी, जिनका हजार वर्ष में भी सुलझना कठिन है। ऐसी दशा में आशंका तो यहाँ तक की जाती है कि यह धरती मनुष्यों के रहने योग्य ही न रहे। इस अमृत पिण्ड को विष पिण्ड बनकर रहना पड़े और जीवन कदाचित विषपायी जीवों भर के लिए शेष रहे।

        किन्तु बारीकी से हलचलों पर दृष्टि लगाये हुए लोग बदलते तेवरों और बदलते पैंतरों को देख रहे हैं। संभवतः अणु युद्ध की विभीषिका एक दूसरे को डराते रहने के ही काम आयेगी। उसका उस भयावह रूप में प्रयोग न होगा। प्रचलित हथियार ही आधी दुनिया का कतर व्योंत कर देने के लिए काफी हैं।

    मूर्धन्य युद्धलिप्सु अगले गरम युद्ध में लैसर किरणों का उपयोग करने की बात सोच रहे हैं। यह मृत्यु किरणें अदृश्य रहती हैं, पर जिस क्षेत्र में पहुँचती हैं, वहाँ सब कुछ जलाकर रख देती हैं। जलाना भी ऐसा जिसमें अग्नि की लपटें न उठें। लैंसर किरणें प्राणियों के प्राण हरण करती हैं। वस्तुओं को निःसत्त्व कर देती है। वृक्ष वनस्पतियों को सुखा देती हैं। पानी को सुखा देती हैं और भी बहुत कुछ ऐसा कर देती हैं, जिससे वस्तु या प्राणी की शकल तो बनी रहे, पर उसके भीतर जीवन जैसी वस्तु न रहे। चट्टान जैसी स्थिर भर रहे। लैसर किरणें उपग्रहों को गिरा सकती है, प्रेक्षपणास्त्रों की दिशा मोड़ सकती हैं। उनके विनाश स्तरीय प्रयोगों को मृत्यु किरण नाम दिया गया है। इस प्रहार में यह सुविधा है कि आक्रमण अदृश्य होता है, धुँआ नहीं उठता, विकिरण नहीं फैलता और अंतरिक्ष में पृथ्वी पर चढ़े हुए आवरण कवचों को क्षति पहुँचने का खतरा नहीं रहता। इसलिए अणुयुद्ध के स्थान पर लैसर युद्ध सरल पड़ता है। प्रथम आक्रमणकर्त्ता नफे में भी रहता है। उसे पृथ्वी से ऊपर फेंकने की अपेक्षा उपग्रहों के माध्यम से धरती के अमुक क्षेत्र में गिराना सरल पड़ता है। यही स्टार वार है।

              आकाश में प्लेटफार्म बनाने के लुभावने सपने दिखाकर वस्तुतः आकाश में मृत्यु किरणों के भण्डारण किये जा रहे हैं। इस प्रहार में तात्कालिक लाभ तो है, शत्रु एक प्रकार से अपंग हो जाता है, पर एक खतरा भी है कि आक्रान्ता भूमि या वस्तुएँ समस्या बनकर रह जाती हैं जो विकिरण सोख लेती हैं और संपर्क में आने वाले को अपनी चपेट में लेती हैं। उनसे कब तक बचा रहा जाय? फिर जीती हुई भूमि से क्या लाभ उठाया जाय? वह तो विजेता के लिए भी उलटी समस्या बन जाती है।

        इसके अतिरिक्त एक प्रश्न और भी शेष रह जाता है कि अब तक जो अणु आयुध बन चुके हैं, उनका क्या हो? उन्हें जमीन में गाड़ने, समुद्र में पटकने, अंतरिक्ष में उड़ा देने पर भी खतरे ही खतरे हैं। इन उपायों के कारण भी आयुधों का प्रभाव और विकिरण तो बना ही रहता है। वह घूम फिर कर पृथ्वी के ऊपर या नीचे पहुँचकर विष बरसा सकता है या ज्वालामुखी उगल सकता है। समुद्र जल को भाप बनाकर आकाश में उड़ा सकता है। हिम युग आरंभ कर सकता है और सूर्य किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकने वाला काला आच्छादन बनकर आकाश को घेर सकता है। इसलिए उसे फिर कभी के लिए सुरक्षित भी नहीं रखा जा सकता है। प्रयोग में जो खतरे हैं, उसी से मिलते- जुलते खतरे भण्डारण के भी हैं। बोतल में फिर से बंद होने के लिए जिन्न तैयार नहीं और खुला छोड़ा जाता है, तो विघातक उपद्रव खड़े करता है।

      यह गरम युद्ध की चर्चा हुई। बिना अणु आयुधों के सामान्य एवं विकसित आयुधों से लड़े गये इसी शताब्दी के दो महायुद्धों की विनाशलीला देखी जा चुकी है। जितने रक्तपात से मरे उससे दूने काली मौत बनकर तरह- तरह की महामारियाँ खा गई हैं। कितने अनाथ और अपंग हुए, कितनी आर्थिक क्षति हुई। इसका लेखा- जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि जीता कोई नहीं, हारे सभी। अगला अधिक विघातक अस्त्रों द्वारा यदि युद्ध होता है, तो कहा जा सकता है कि मरेंगे सभी, जीवित कोई नहीं बचेगा। जो जीवित रहेंगे, वे भी इस योग्य न रह सकेंगे कि स्वावलंबी जीवन जी सकें। फिर परायों की सहायता कर सकना भी किसके बलबूते की बात रहेगी। विषाक्तता के वातावरण में जीवन इस योग्य भी नहीं रहेगा, जिसे कोई प्रसन्नतापूर्वक जीना चाहे। ऐसी- ऐसी अगणित समस्याएँ और विपत्तियाँ पैदा करेगा, होने वाला या न होने वाला गरम युद्ध।

       फिर होगा क्या?- अदृश्य दूरदर्शियों का निष्कर्ष है कि इतने बड़े भारी बोझ को लादते, ढोते वे लोग थक जायेंगे, जिन्हें युद्ध विजय का लालच इन दिनों आवेश ग्रस्त किये हुए है। वे यद्यपि जैसे आवेश ही हैं, जो हारे हुए जुआरी की बाजी खेल रहे हैं। किन्तु यह निश्चित है कि इसे इसी तरह बहुत दिन आगे न धकेला जा सकेगा। युद्ध जितनी ही महँगी उसकी तैयारी पड़ रही है। लूट कर धनवान् बनने से पहले उस लालच की पूर्व तैयारी ही खोखला किये दे रही है।

कुश्ती के दाँव पेचों में जो दाँव पेच तुर्त- फुर्त चल जाते हैं, उनमें बल भी रहता है। पर जब पहलवान आपस में गुँथ जाते हैं और रगड़ाई शुरू हो जाती है, तो दोनों का कचूमर निकल जाता है। वे ऊब जाते हैं। मनःस्थिति को देखकर बीच में ही उन्हें बिना हार- जीत की कुश्ती समाप्त हुई घोषित करके जोड़ छुड़ा देते हैं। वे अपने मन में भी छूट जाने की ही बात सोचते हैं।

     वह समय दूर नहीं जब ऐसी ही स्थिति आने वाली है। तैयारी का भार ही इतना बोझिल होगा, जिसे वहन नहीं किया जा सकेगा। अतः तर्क के आधार पर भी यही कहा जा सकता है कि थकों को विराम लेना पड़ेगा और अनुभव तथा विवेक के आधार पर अंतिम दुष्परिणाम की बात समझते हुए विनाश विग्रह को बंद करना पड़ेगा। यह कथन भविष्यवक्ताओं का भी है।

   तैयारी में जो व्यय हुआ है, उसकी क्षतिपूर्ति की बात सूझ पड़ेगी। भय और अविश्वास करते रहने की अपेक्षा एक बार साहसपूर्वक विश्वास कर देखने की बात सूझेगी। संधि समय की आवश्यकता बनेगी और वह फिर अनुभवों का स्मरण दिलाते हुए तत्पर भी रहेगी।

संक्षेप में समस्त भयावह संभावनाओं के होते हुए भी दूरदर्शियों की भाषा में यह कहा जा सकता है कि प्रलय युद्ध नहीं होगा। एक दूसरे को धमकी देने के लिए जहाँ- तहाँ छेड़छाड़ करते रहेंगे। धमकी और घुड़की चलती रहेगी और इस प्रकार बीसवीं शताब्दी बीत जायेगी।
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