दुनिया नष्ट नहीं होगी, श्रेष्ठतर बनेगी

बदलना होगा दृष्टिकोण

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नारी को इस स्थिति से उबारना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वर्तमान कुदृष्टि, कामुक चिन्तन की शिकार होने से उन्हें बचाया जाय। समानता का वास्तविक तात्पर्य यह है कि मान्यता और भावना की दृष्टि से नर-नारी भाई की-बहिन बहिन की-या भाई बहिन की दृष्टि से भाई पास्परिक संबंधों को देखें। प्रेत पिशाच की तरह कामुकता को सिर पर न चढ़ी रहने दें। आँखो में शैतान की कुदृष्टि न घुसी रहे। भोग्या और उपभोक्ता का रिश्ता न रहे, कामुकता को न आवश्यक समझा जाय और न महत्त्व दिया जाय। पशुओं में प्रजनन अवधि आने पर मादा ही प्रथम प्रस्ताव करती है। नर बिना अनुरोध के साथ-साथ जीवन भर रहने पर भी अपनी ओर से छेड़खानी का कभी कोई प्रसंग उपस्थित नहीं होने देता। यही प्रचलन मनुष्यों में भी रहे, तो शरीरों का ऐसा सर्वनाश न हो, जैसा कि इन दिनों होता रहता है। उन मानसिक विकृतियों से छुटकारा मिले जो  उत्कृष्ट चिन्तन के लिए गुंजायश ही नहीं छोड़तीं। बलात्कार, व्यभिचार, अपहरण आदि की जो दुर्घटनाएँ आये दिन होती रहती हैं उनकी कोई संभावना या गुंजाइश ही न रहे।

    सौन्दर्य देखने की-पुलकन की वस्तु है। उसे मरोड़ देने गला घोट देने के लिए नहीं सृजा गया है। देवियों की प्रतिमाएँ सुन्दर भी होती हैं और सुसज्जित भी। उन्हें मंदिरों में प्रतिष्ठित देखा जा सकता है। दृष्टि सदा मातृ भाव से सनी पवित्रता से ही भरी रहती है। यही दृष्टि हाड़ मांस की नारी के लिए भी रखी जा सकती है। ऐसी स्थिति में सच्चे प्यार की भावनाएँ बनती हैं और गिराने की नहीं अधिक विकसित करने की इच्छा होती है। इसी मनोभूमि से नर-नारी के बीच पारस्परिक स्नेह सौजन्य पनपता है और उनके सच्चे मन से मिलने पर ही एक और एक ग्यारह की उक्ति चरितार्थ होती है।

    आज की विषम वेला में तो दाम्पत्य जीवन में और अधिक तप संयम बरतने की ही आवश्यकता है। हँसने मुस्कराने भर से काम क्रीड़ा की मानसिक पूर्ति हो जानी चाहिए। साथ-साथ रहने, काम करने, एक दूसरे को अधिक सुयोग्य बनाने, सम्मान देने, प्रशंसा करने में जो प्रसन्नता होती है उस पर घिनौनी कामुकता को निछावर किया जा सकता है।

    अगले दिनों नारी को प्रतिबंधों, दबावों, तनावों, बंधनों से मुक्त करके सामान्य मनुष्य की तरह जीवनयापन करने की स्थिति में लाना होगा। उसे काम कौतुक से उबारकर व्यक्तित्व निखारने, प्रतिभा उभारने एवं योग्यता बढ़ाने के लिए समुद्यत करना होगा। यह समय की अनिवार्य आवश्यकता है। उसे साहित्यकारों, चित्रकारों, विज्ञापन वालों, फिल्म व्यवसायियों के लिए मनोरंजन और कमाई का साधन नहीं बनने देना चाहिए। उसे इस रूप में सज्जित-प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए जिससे वह विलास की पुतली दीख पड़े और इस कारण हर ओर से विपदाओं के बादल टूटें।

    अगले दिनों नारी को हर क्षेत्र में नर की समता करनी होगी, सहायक की समर्थ भूमिका निभानी होगी। पर यह संभव तभी है जब उसे कामुकता की नारकीय अग्नि में जलने और जलाने से बचाया जाय। अगले दिनों नारी का देवी स्वरूप निखरना है जिससे वह सर्वत्र सुख शान्ति की स्वर्गीय वर्षा कर सके। अध्यात्म क्षेत्र की यह जिम्मेदारी है कि आने वाले वर्षों में नारी को जन नेतृत्व हेतु आगे बढ़ाएँ।

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