संचालन सामर्थ्य का लौकिक प्राकट्य

September 2002

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पहली बार गुरुदेव जब हिमालय गए थे, तब गायत्री तपोभूमि के क्रिया-कलापों का विस्तार न हुआ था। सारे काम-काज का केन्द्र अखण्ड ज्योति संस्थान था। हर महीने निश्चित समय पर अखण्ड ज्योति के प्रकाशन के अलावा दूसरी कोई विशेष जिम्मेदारी न थी। मिशन का बहुत ज्यादा प्रचार-प्रसार न होने के कारण आगन्तुक जन भी थोड़े ही थे। लेकिन अब दूसरी बार की हिमालय यात्रा की स्थितियाँ एकदम अलग थीं। सन् 1953 में गायत्री तपोभूमि का निर्माण होने और यहाँ शिविरों की नियमित प्रक्रिया चल पड़ने से श्रद्धालुओं एवं जिज्ञासुओं के आवागमन का ताँता लग गया था। वर्ष 1958 के सहस्र कुण्डीय यज्ञ आयोजन ने भी स्थिति को एकदम बदल दिया था। इस यज्ञ आयोजन से देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी, साधक, राजनेता व विशिष्ट जन गुरुदेव के दैवी स्वरूप से काफी कुछ परिचित हो गए थे। इनमें से किसी न किसी का प्रायः प्रतिदिन आना लगा रहता था।

स्थितियों के इस बहुआयामी परिवर्तन के बाद मिशन में समर्थ संचालक की जरूरत हर पल-हर क्षण थी। गुरुदेव के अभाव में इस गुरुतर दायित्व को निभाने की जिम्मेदारी माताजी पर ही थी। हालाँकि इस बारे में उन दिनों कई कार्यकर्त्ताओं के मनों में काफी आशंकाएँ-कुशंकाएँ थी। वे सब सोच ही नहीं पाते थे कि सीधी-सादी, सरल गृहिणी की भाँति जीवन यापन करने वाली माताजी इतने सारे दायित्व को किस तरह निभाएगी? ये सभी कार्यकर्त्ता माताजी के भावपक्ष से परिचित होने के बावजूद उनकी बुद्धि कुशलता एवं लोक व्यवहार में दक्षता से प्रायः अपरिचित थे। आपस में इनकी चर्चाएँ बड़ी निराशाजनक एवं हताशा भरी होती थीं। कभी तो ये कहते- कि गुरुदेव के जाने के बाद मिशन बिखर जाएगा। कभी कहते- गुरुदेव का इस तरह माताजी के हाथों में सब कुछ छोड़कर हिमालय जाना ठीक नहीं है। सबको खाना खिला देना और बात है, इतने बड़े संगठन को सही तरह से चलाना एकदम अलग बात है। अपनी यात्रा के कुछ पहले इस तरह की चर्चाएँ गुरुदेव के कानों में पड़ी तो वे मुस्कराए। और उन्होंने कहा- शंका-कुशंका करने वाले भला माताजी के बारे में जानते ही क्या हैं? उन्हें क्या मालूम, माताजी कौन हैं? उनकी सामर्थ्य क्या है? अपनी शक्ति-सामर्थ्य के एक अंश से सबको समर्थ बनाने वाली माताजी को मैं अच्छी तरह से जानता हूँ।

माताजी के दिव्य स्वरूप एवं उनकी दैवी क्षमताओं से अच्छी तरह परिचित गुरुदेव ने बड़ी निश्चिन्ततापूर्वक हिमालय के लिए प्रस्थान किया। गुरुदेव के हिमालय चले जाने के बाद माताजी ने मिशन का सारा सूत्र संचालन अपने हाथों में ले लिया। हालाँकि उन दिनों उन पर घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ भी बहुत थीं। बच्चों की पढ़ाई चल रही थी। उनसे किसी विशेष मदद की आशा न थी। अपने अकेले के दम पर ही उन्हें साधना, गृहकार्य, पत्र लेखन, अखण्ड ज्योति पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि के कार्यों की देखभाल करनी थी। यह ठीक है कि इन सभी कार्यों में सहयोग के लिए कार्यकर्त्ता थे। परन्तु वे सब के सब सहयोगी नहीं थे। माताजी के दैवी स्वरूप के प्रति अनभिज्ञता एवं श्रद्धा-भक्ति के अभाव में इनमें से कुछ की मनःस्थिति बड़ी विपन्न हो गयी थी। अपनी मानसिक विपन्नता के वश हो, ये कभी-कभी उल्टे-सीधे काम भी कर बैठते थे।

अपने आराध्य के प्रति परिपूर्ण निष्ठ के साथ माताजी दिन-रात काम में लगी रहती थीं। घर और मिशन के अनेक तरह के कार्यों के अलावा उन पर कष्ट पीड़ित शिष्यों-भक्तों की आध्यात्मिक शक्ति से सहायता करने की जिम्मेदारी भी थी। वे कब-कब, क्या-क्या करती हैं? इसे उनके पास रहने वाले लोग भी ठीक तरह से समझ न पाते थे। सभी को बस इतना पता चल जाता कि सारे काम, सुचारु ढंग से और सही समय से हो रहे हैं। माताजी के इस दैवी संचालन से वे विपन्न बुद्धि लोग तो बहुत हतप्रभ होते थे, जो सहयोग की आड़ में विरोध और विद्वेष के कुचक्र रचते रहते थे। माताजी उनकी इन षड़यन्त्र भरी गतिविधियों से अनजान न थीं। पर उनका अपनी इन बुद्धिहीन सन्तानों के प्रति भी करुणा भाव था। इन कुपुत्रों के प्रति भी माँ के वात्सल्य में कोई कमी न आयी थी।

एक बार इन्हीं दिनों गायत्री तपोभूमि में कार्यकर्त्ताओं के बीच झगड़ा हो गया। इस व्यर्थ के झगड़े को सुलझाने के लिए माताजी को जाना पड़ा। वे गयीं। सभी लोगों को एक जगह इकट्ठा किया गया। सब के ठीक तरह से बैठ जाने के बाद उन्होंने कहना शुरू किया- “बेटा! मैं तुममें से हर एक को बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ। तुम लोग जो कुछ भी इतने दिनों तक करते रहे हो, उससे मैं अच्छी तरह से परिचित हूँ। मैं इस भीड़ में किसी का नाम लेकर उसे शर्मिन्दा तो नहीं करूंगी। पर तुममें से जिसने जो कुछ किया, उसके कामों का खुलासा कर देती हूँ। उसी से तुम्हें यह अन्दाजा लग जाएगा कि मुझे क्या कुछ मालूम है।” इसी के साथ माताजी ने हर एक कार्यकर्त्ता की गड़बड़ियों को गिनाना शुरू कर दिया। आर्थिक गड़बड़ियों के साथ विद्वेष और विरोध के कुचक्रों का वह एक-एक करके खुलासा करने लगीं। जैसे-जैसे वह बोलती जातीं सुनने वालों का सिर शर्म से झुकता जाता। सब कुछ कह चुकने के बाद उन्होंने कहा- “बेटा! अब तक मैं चुप रही, इसका कारण यह नहीं है कि मुझे कुछ मालूम नहीं था। कारण केवल इतना ही था कि मैं माँ हूँ। और माँ हर हाल में अपने बच्चों को प्यार करती है। फिर वे बच्चे कैसे भी क्यों न हो? रह गयी मिशन की बात, तो इसे भगवान् ने जन्म दिया है। वही इसे बढ़ा रहा है। चाहे जितने लोग जितनी भी तरह से स्वार्थवश या अपनी कुटिलता के कारण इसका विरोध करें, पर इसे तो हर हाल में बढ़ना ही है।”

माताजी की बातों को सुनकर, सुनने वाले अवाक् रह गए। उनमें से जिनकी भावनाएँ अभी पूरी तरह से मरी नहीं थीं, जो किसी कारण बहकावे में आकर भटक गए थे, उन्होंने रोते हुए माताजी के चरणों में गिरकर माफी माँगी। माँ ने भी प्यार से अपने इन अज्ञानी बालकों के सिर पर हाथ फेरकर क्षमा कर दिया। पर कुछ के मन में कलुष अभी बाकी था। उन्होंने पहले तो यह पता करने की कोशिश की कि माताजी को सारी बातें कहाँ से पता चली। जब अपनी इस कोशिश में सब तरह से थक-हार गए तब उन्हें भी माताजी की दिव्य क्षमताओं पर विश्वास करना पड़ा। हालाँकि इसके बावजूद वे अपनी प्रवृत्ति को बदलने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने अपनी कारगुजारियाँ जारी रखीं। पर महाशक्ति की संचालन सामर्थ्य से मिशन की सम्पूर्ण गतिविधियाँ, सुनियोजित एवं सुनियंत्रित रीति से चलती रहीं।

इसी बीच गुरुदेव की हिमालय यात्रा की अवधि भी पूरी हुई। वह निश्चित समय पर वापस आए। उनके आते ही माताजी ने संचालन सूत्र फिर से उनके हाथों में सौंप दिया। अन्तर्यामी गुरुदेव को बिना बताए ही सारी स्थितियाँ पता चल गयी। और उन्होंने दोषी जनों के प्रति कठोर कार्यवाही करने का निश्चय किया। पर यहाँ भी माँ की ममता आड़े आ गयी। उन्होंने गुरुदेव से कहा- अब रहने भी दीजिए, वे जैसे हैं, मेरे बच्चे हैं। जब गुरुदेव ने मिशन के भावी विस्तार का हवाला देकर उन्हें बहुत समझाया, तो वे जैसे-तैसे किसी तरह बहुत दुःखी मन से राजी हुई। पर यहाँ भी उन्होंने अपनी शर्त रख दी। वे बोलीं- कि उन्हें नया जीवन शुरू करने के लिए पर्याप्त धनराशि एवं आप अपने द्वारा लिखे गए मौलिक एवं अनूदित साहित्य के प्रकाशन का अधिकार दें। उनकी इन बातों पर गुरुदेव हँस पड़े और कहने लगे- “आपकी ममता के सामने तो त्रिलोक के स्वामी को भी झुकना पड़ेगा, फिर मेरी क्या मजाल। आप जैसा चाहती हैं, वैसा ही होगा।” सब कुछ माताजी की सहज संवेदनाओं के अनुसार ही हुआ। जिन आत्मदानियों को अलग किया गया, वे अपने हृदय में माताजी के असीम प्यार की अनुभूति लेकर गए। माताजी की दिव्य शक्तियों और गुरुदेव के तपःतेज ने मिशन को फिर से नए प्राण दिए। बीतते वर्षों के साथ महाशक्ति के दिव्य साधना स्थल के रूप में शान्तिकुञ्ज की पृष्ठभूमि बनने लगी।


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