ध्यान योग और उसकी पृष्ठभूमि

December 1976

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मानवी सत्ता को सुविस्तृत भूखण्ड की तरह समझा जा सकता है। इस धरती पर बहुत कुछ खोजने योग्य, जानने योग्य और पाने योग्य है। उस शोध प्रयास में जिसने जितना प्रयास किया है उसने उतना ही वैभव एवं वर्चस्व प्राप्त किया है। खनिज सम्पदा, वनस्पति सम्पदा वैज्ञानिक उपलब्धियाँ शोध प्रयासों के ही सत्परिणाम हैं। समुद्र किसी समय एक निरर्थक व्यवधान मात्र था। उसकी खोजें हुईं तो उस क्षेत्र से भी बहुत कुछ खोज निकाला गया। अन्तरिक्षीय खोज-बीन ने उस शून्य निस्तब्ध समझे जाने वाले क्षेत्र को शक्तियों और उपलब्धियों का केन्द्र सिद्ध किया है। आतुरतापूर्वक उसकी खोज में प्रचुर धनराशि इसीलिए बोई जा रही है कि इस खेत में जो बोया जा रहा है वह असंख्य गुना लाभ प्रस्तुत करेगा।

स्थूल जगत के थल, जल और नभ क्षेत्र में जो कुछ वैभव भरा पड़ा है। उससे असंख्य गुना वर्चस्व सूक्ष्म जगत में विद्यमान है। पर यह सूक्ष्म जगत इतना व्यापक है कि समूचा ब्रह्माण्ड उसकी परिधि में आता है। इतने विस्तृत क्षेत्र की खोज कैसे की जाय? इस प्रश्न का उत्तर हमें पिण्ड सत्ता में सन्निहित सूक्ष्म की खोज-बीन करने के रूप में तत्वदर्शियों ने दिया है। सौरमण्डल गतिविधियों का समूचा परिचय एक अणु का समग्र विश्लेषण करके प्राप्त किया जा सकता है। सूर्य बड़ा और अणु आकार में छोटा है, पर इससे क्या, एक ही क्रम व्यवस्था दोनों के भीतर समान रूप से काम कर रही है। अस्तु अणु विज्ञान की आरम्भिक स्थिति से उठ कर जब कभी हम उसका उच्चस्तरीय ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे तो सूर्य-विज्ञान के सभी सूत्र अनायास ही करतलगत हो जायेंगे। परमाणु एक सौर मण्डल है और उसका ‘नाभिक’ सूर्य की तरह अपना प्रभाव विस्तार करता है।

अपने भीतर क्या है? यह देखने, खोजने के लिए अन्तर्मुखी होना पड़ता है। समुद्र तल में बिखरे-मोती समेटने के लिए गहरे पानी में उतरने की-गोताखोर स्तर की प्रवीणता प्राप्त करनी पड़ती है। इन्द्रियों की बनावट कुछ विचित्र है उनके छेद बाहर की ओर हैं इसलिए बहिरंग को ही देख पाती है और बिखरी हुई पदार्थ सम्पदा के सान्निध्य से जो रसानुभूति होती है उसी का लाभ ले पाती है। अन्तः क्षेत्र में जो अपार वर्चस्व भरा पड़ा है उसे जानने-खोजने के लिए न तो इन्द्रिय शक्ति काम देती है और न मस्तिष्क ही कुछ पुरुषार्थ दिखा पाता है। शरीर के भीतर क्या हो रहा है उसकी रक्त संचार प्रक्रिया, पाचन पद्धति, रोग विकृति, मस्तिष्कीय गतिविधि तक को हम जान नहीं पाते। अपनी शारीरिक स्थिति का पता लगाने के लिए ‘पैथालॉजी’ विशेषज्ञ से खोज-बीन कराते हैं।

मानसिक रुग्णता का पता लगाने के लिए ‘न्यूरोलॉजिस्ट’ का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। भावनात्मक और चारित्रिक विश्लेषण के लिए आत्मवेत्ता गुरुजनों के सामने अपना जी खोलकर रखना पड़ता है। यदि सामान्य साधनों से अपनी भीतरी सूक्ष्म स्थिति की जाँच करना सम्भव रहा होता तो गुत्थियों को समझने और सुलझाने में हम सहज ही सफल हो सकते थे। पर ईश्वर की लीला कितनी विचित्र है। उसने न केवल अपना विशाल ब्रह्माण्ड वरन् हमारे हिस्से का ‘पिण्ड’ भी रहस्य भरे गोरखधन्धों से जकड़ दिया है। पहेलियाँ सुलझाने जैसी परख प्रक्रिया हमारे सामने रच कर खड़ी कर दी है। ताकि अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देकर अविज्ञात को जानें और अनुपलब्ध को उपलब्ध करें।

योग साधना में ‘ध्यान’ का महत्व सर्वोपरि है। विश्व के कोने-कोने में प्रचलित अनेकानेक साधना-विधानों की ध्यान प्रक्रिया अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उसके बिना आत्मिक प्रगति का एक चरण भी आगे नहीं बढ़ता। ध्यान के आधार और प्रकरण तो अनेक हैं, पर उसका मूल स्वरूप एक ही है कि हम अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्ति को समेटने और अन्तर्मुखी बनाने का प्रयास करें। भीतर देखें और अन्तरंग को खोजें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न स्तर की ध्यान-साधनाएँ विनिर्मित की गई हैं। नादयोग, बिन्दुयोग, लययोग यह तीनों ही ध्यान प्रधान हैं और उनमें अपनी मस्तिष्कीय चेतना को श्रद्धासिक्त बना कर अन्तरंग खोजने के लिए अन्तरंग में उतरना पड़ता है।

भक्तियोग का इतना ही लाभ है कि उसमें स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म को जानने, समझने का अवसर मिलता है और यह अनुभूति होती है कि प्रकृति, पदार्थों और प्राणधारियों से आगे भी कोई सूक्ष्म-लोक है और उसमें निवास करने वाली दिव्यसत्ताएँ व्यवहार सम्पर्क में आने वाले ज्ञात साधनों की अपेक्षा अधिक सामर्थ्यवान तथा अधिक उपयोगी हैं। स्थूल की तुलना से सूक्ष्म की गरिमा समझ ली जाए तो यह भी एक बहुत बड़ी बात है। इतने में भी आत्मिक प्रगति का एक अध्याय हृदयंगम करने का अवसर मिलता है। पर बात तो और भी आगे चलने की है। खोजना तो अन्तर को है। क्योंकि शक्तियों के स्रोत विराट् का निकटतम केन्द्रबिन्दु आत्मचेतना में ही सन्निहित है। ईश्वर समेत प्रत्यक्ष या परोक्ष लोक की दिव्यसत्ताओं का अवतरण प्रखर व्यक्तियों के अतिरिक्त अन्य कहीं भी नहीं हो सकता। आत्म-निर्माण के बिना आत्मिक प्रगति की गाड़ी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ती।

फूल खिलता है तो उसकी विरुदावली गाने के लिए भौंरे आते हैं- मधुमक्खियाँ अनुदान पाने के लिए मनुहार करती हैं- तितलियाँ शृंगार सजाने आती हैं। हर कोई उसे ललचाई आँखें से देखता है। मुंदी कली पर इसमें से किसी की कृपा नहीं होती। जब फूल सूख जाता है तो भी इन प्रशंसा करने वाले और मित्रता दिखाने वालों में से हर कोई मुँह मोड़ लेता है। व्यक्तित्व की आन्तरिक गरिमा ही वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द भौतिक सफलताओं और दिव्य अनुदानों का प्रगतिचक्र परिभ्रमण करता रहता है गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए विवश करना भागीरथ जैसे तपस्वी के लिए ही सम्भव हो सकता है। ऐसे ही लोगों को समर्थ शक्तियों का सहयोग मिलता है। गंगावतरण के समय स्वर्ग से धरती पर गिरने के समय धरती में छेद हो जाने की कठिनाई का हल निकालने के लिए शिवजी ने अपनी जटाएँ फैला देने का सहयोग किया था। इस आयोजित सहयोग को भागीरथ की प्रखरता ही घसीट कर लाई थी। समुद्र पीकर अण्डे वापिस दिलाने का सहयोग महर्षि अगस्त्य ने अयाचित रूप से दिया था। इसके लिए वे टिटहरी के प्रबल पुरुषार्थ से प्रभावित होकर ही आगे आये थे। ऐसी पौराणिक एवं ऐतिहासिक गाथाओं के अगणित उदाहरण भूतकाल पर दृष्टि डालते ही सामने आ खड़े होते हैं। वर्तमान में भी हम अपने आस-पास नजर दौड़ाएं तो इन प्रत्यक्ष को प्रमाणों समेत आसानी से चरितार्थ होते हुए देख सकते हैं। आध्यात्मिक उपलब्धियों के सम्बन्ध में भी यही तथ्य है कि साधक की आन्तरिक उत्कृष्टता जिस प्रकार निखरती जाती है उसी अनुपात से ऋद्धि-सिद्धियों की वर्षा दिव्य-लोकों से होने लगती है। ओछे,दुष्ट और स्वार्थी प्रकृति के मनुष्य देवी-देवताओं की मनुहार और मन्त्र-तन्त्रों के चित्र-विचित्र कला कौतुक करने पर भी पूरी तरह खाली हाथ रहते हैं। दिव्य-शक्तियाँ कर्मकाण्डों को नहीं, साधक के स्तर को देखती हैं और कुछ देखने की उन्हें फुरसत ही नहीं होती।

यह तथ्य जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है कि आत्म परिष्कार ही वह दूरदर्शिता भरा पुरुषार्थ है जिसके आधार पर भौतिक और आत्मिक प्रगति का उभय-पक्षीय द्वार खुलता है। इस एक ही अभाव के बने रहने पर सर्वत्र गुड़-गोबर होता रहता है।

आत्मिक प्रगति की दिशा में प्रथम चरण बढ़ाते हुए हमें अन्तर्मुखी बनना पड़ता है। कुछ समय के लिए बाहर की ओर से आँखें बन्द करके भीतर क्या है? यह देखना समझाना पड़ता है। ध्यान इसी प्रक्रिया का नाम है। उसका एकमात्र प्रयोजन भीतरी सत्ता को-उसके वैभव को समझना है। साथ ही वह परखना भी है कि इस क्षेत्र में भरी हुई विकृतियों के दलदल में प्रगति का रथ कैसी बुरी तरह फँसा और रुका पड़ा है। आन्तरिक दोष दुर्गुण ही बाह्य जीवन में शोक-सन्ताप बन कर प्रतिफलित होते हैं।

बोल -चाल की भाषा में किसी भूली हुई बात या खोई हुई वस्तु का स्मरण करने की मानसिक प्रक्रिया को ध्यान करना कहते हैं। अध्यात्म दर्शन में भी यही तथ्य सामने आता है हम अपने को अपने वर्चस्व को-लक्ष्य को पूरी तरह भूल बैठे हैं। मेले में ललचाई आँखों से भटकने वाले बच्चों जैसी हमारी मनोदशा है। न अभिभावकों का पता है न गन्तव्य स्थान का। भटकाव ने कुछ ऐसा जादू डाला है कि मेले की चमक-दमक ही सब कुछ दीखती है। ईश्वर ने मनुष्य जीवन जैसी अपनी बहुमूल्य कलाकृति जीवात्मा को निष्प्रयोजन नहीं सौंपी है। जो अन्य प्राणियों को नहीं दिया जा सका वह मनुष्य को मिला। इसमें पक्षपात नहीं वरन् विशिष्ट उद्देश्य सन्निहित है। अनुदान के साथ उत्तरदायित्व भी कन्धे पर आया है। यह बात एक प्रकार से हम भूल ही गये हैं और मौज-मजा लूटने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। ध्यानयोग का तात्पर्य अपने मूलस्वरूप को-अपने कण-कण में समाये हुए प्रसुप्त वैभव को- लक्ष्य को समझने के लिए अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करना है।

‘आत्मबोध’ जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। भगवान बुद्ध का जिस वट वृक्ष के नीचे ‘आत्मबोध’ हुआ उसे भी सौभाग्यवान माना गया और उसकी टहनियाँ भक्तजनों ने अपने-अपने देशों में ले जाकर उगाईं और उन बोधिवृक्षों को देव तुल्य मानकर पूजा संस्थान के रूप में प्रतिष्ठित किया। ब्रह्मविद्या में आत्मज्ञान की महिमा का सर्वोपरि बखान है। ‘आत्मावारे ज्ञातव्य।’ श्रुति वचन में मनुष्य को आत्मसत्ता के सम्बन्ध में अधिकाधिक जानने का निर्देश किया गया है। जानने के बाद ही उपयोग की बात बनती है। ध्यानयोग में अन्तर्मुखी होकर अपने सम्बन्ध में अधिक जानने, देखने, समझने का प्रयास किया जाता है। इसी उद्देश्य के लिए अनेक प्रकार के शब्द, रूप, रस, ग्रन्थ, स्पर्श के माध्यम से चेतना पर छाप-छोड़ने वाले ध्यानों का विधि-विधान तत्वदर्शियों ने बनाया है।

प्रत्यक्ष से- भौतिक से कुछ समय तक चित्त को पूरी तरह हटा लिया जाय और उतनी अवधि तक परोक्ष से अभौतिक से रिश्ता जोड़ लिया जाय तो समझना चाहिए कि ध्यान का उद्देश्य समझ लिया गया है। हम निरन्तर लोभ और मोह के जंजाल में जकड़े रहते हैं। भगवान का भजन पूजन करते हैं तो उसके फलस्वरूप धन वैभव की लिप्सा पूरी करने की ही ललक संजोये रहते हैं। आत्मा की बात तो कभी सूझ ही नहीं पड़ती। बहुत हुआ तो पूजा पत्री की थोड़ी सी टन्ट-घन्ट को ही लोक-परलोक सुधारने का अमोघ अस्त्र मान लिया। आत्मा की इस प्रकार तृष्णा वासना ही दलदल में फँसी हुई दुर्गति दयनीय ही कही जा सकती है। इससे छुटकारे के लिए उपाय सोचने एवं योजना बनाने की तैयारी ही ध्यान-धारणा की आधारशिला कही जा सकती है।

छान्दोग्य उपनिषद् में महर्षि सनत्कुमार नारद से कहते हैं-

‘येऽल्या क्लहिनः पिशुना उपवा दिनस्तेऽथ ये प्रभवो ध्याना पदांशा इवैव ते भवन्ति।’

अर्थात्- नीच प्रकृति के लोग कलह, बकवास, निन्दा और चुगली में अपनी सामर्थ्य का अपव्यय करते रहते हैं। किन्तु विवेकवान लोग ध्यान को अपनाकर लाभ उठाते हैं। अतः हे नारद! तुम ध्यान की उपासना में लग जाओ-

‘ध्यानमुपास्विति।’

ध्यान में दो वर्ग हैं-एक आत्मशोधन। दूसरा प्रभु समर्पण। आत्मशोधन में अपने आपको शरीर से, प्रवृत्तियों से ऊपर साथी, दृष्टा माना जाता है। आत्म-निरीक्षण आत्मचिन्तन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की सुनियोजित रीति-नीति का निर्धारण ध्यानयोग का एक महत्वपूर्ण विषय है।

‘रागोपहन्तिर्ध्यानम्।’

रागों का निराकरण ही ध्यान है। अपने को दोष दुर्गुणों से रहित मानना तथा उस पवित्र और उत्कृष्ट स्तर के अनुरूप बनने के प्रबल प्रयास हेतु प्रचण्ड संकल्प उभारना ध्यानयोग के ही अन्तर्गत आता है।

‘ध्यानम् निर्विषयं मनः।’ (साँख्य दर्शन)

मन का विषय, विकारों से रहित होना ही ध्यान है।

ध्यान का दूसरा वर्ग है- प्रभु परायणता।

‘रुयो ध्यान ब्रह्मत्युपास्ते, यावद् ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथा कामाचारो भवति, यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति।

-छांदोग्योपनिषद्

अर्थात्- जो यह मानकर उपासना करता है कि ‘ध्यान ही ब्रह्म है,’ उसके ध्यान की गति ब्रह्म जैसी ही विस्तृत हो जाती है।

इष्ट की तादात्म्यता आत्मा की पवित्रता और सूक्ष्मता को विकसित करते हुए उसे ब्रह्म-स्तर तक ही पहुँचा देती है।

प्रभु-परायणता-याने ईश्वर को आत्मसमर्पण। जीव और ब्रह्म की सत्ता का सान्निध्य एवं एकीकरण।

भगवान के किसी रूप का ध्यान करते हुए उससे अपनी सघन आत्मीयता का आरोपण साकार ध्यान-साधना कहा जाता है।

निराकार ध्यान साधना में सविता-देवता का -ज्योति पुँज का ध्यान किया जाता है। निराकारवादी साधना सम्प्रदाय, प्रकाश के ध्यान का निर्देश करते हैं। योग शास्त्र के नाटक एवं बिन्दुयोग के सुविस्तृत विधान इसी आधार पर बने हैं उपनिषदों में विशेष रूप से प्रकाश ध्यान पर ही जोर दिया है-

“युजानं प्रथमं मनस्तत्वाम सविता धियः। अग्ने ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत।”

अर्थात्- मन एवं प्राण को सविता-देवता की ज्योति में लगावे। अग्नि की ज्योति का अवलोकन करें। उसे सूक्ष्म शरीर के क्षेत्र में स्थापित करे।

बाइबिल ने परमेश्वर को ‘ज्योति’ माना है। गुरुग्रन्थ साहिब में उसे ‘चाँदना’ कहा है। हजरत मूसा को कोहेनूर पर ‘जलवा’ दिखाई दिया था। उपनिषद् उसे ही परम ज्योति कहते हैं। अध्यात्म-शास्त्र में इसे ही दिव्य आलोक, ‘डिवाइन लाइट’ कहा जाता है। सूर्य को इसी परमतेजस् की प्रतीक प्रतिमा माना जाता है।

भ्रूमध्य भाग में अवस्थित आज्ञाचक्र में प्रकाश- ज्योति की स्थापना आन्तरिक ध्यान है। बहिरंग ध्यान-धारणा में आकाशस्थ सूर्य की नेत्र बन्द करके धारणा की जाती है और यह भावना की जाती है कि भगवान सविता देवता की दिव्य किरणें शरीर और मन में सभी स्थानों में गहराई तक प्रवेश कर अक्षयतेज-ब्रह्मवर्चस् के द्वारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व को परम तेजस्वी बना रही हैं।

भ्रूमध्य भाग में आज्ञाचक्र अवस्थित है। यही तीसरा नेत्र अथवा दिव्य नेत्र कहलाता है। शरीर-शास्त्रीय शब्दावली में इसे पिट्यूटरी ग्रन्थि कहते हैं। इसकी संरचना नेत्र के ही सूक्ष्म रूप की तरह है।

सूक्ष्म शरीर की दृष्टि से तो यह केन्द्र दिव्य नेत्र ही है। क्ष-किरणों द्वारा शरीर की भीतरी टूट-फूट अथवा किसी सन्दूक में सुरक्षित गहनों का चित्र खींचा जा सकता है। यह सूक्ष्म शरीरस्थ दिव्य नेत्र प्रदीप्त हो उठे, तो वे हलचलें दिखाई पड़ सकती हैं, जो गतिमान तो हैं, पर स्थूल दृष्टि से अदृश्य है। इन दिव्य नेत्रों में प्रचण्ड तेजस् भी होता है। शंकर द्वारा इन्हीं के द्वारा कामदेव को भस्मसात् कर देने की पुराण कथा प्रसिद्ध है। प्रदीप्त दिव्य नेत्रों द्वारा अपने मनोविकारों को उन्नति पथ के अवरोधों को उसी तरह भस्मीभूत किया जा सकता है। यह वस्तुतः विवेक एवं दूरदृष्टि का जागरण है। जहाँ यह सूक्ष्म, पैनी प्रखर और सशक्त अन्तर्दृष्टि जग पाये, तो सहज ही लोभ, मोह, वासना, तृष्णा अहंता जैसे मनोविकार और इनसे उत्पन्न नानाविधि शोक-सन्ताप, विप्लव-विक्षोभ, शमिति शिथिल किए जा सकते हैं।

बिन्दुयोग की साधना इस तृतीय नेत्र को प्रदीप्त करने की विधि है। इसमें साधक अपने हृदय, फुफ्फुस, आँतें, आमाशय, वृक्क आदि अंगों-प्रत्यंगों तथा मस्तिष्क में एक प्रखर ज्योति को प्रज्वलित अनुभव करता है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार सभी इस ज्योति से जगमगा रहे हैं। सत्ता का एक-एक अणु भ्रूमध्य केन्द्र से निकलने वाले प्रखर प्रकाश के दिव्य प्रवाह से आलोकित है और आलस्य, जड़ता, प्रमाद, अन्धकार इस अरुणोदय से दूर भाग गया है। अदम्य स्फूर्ति, अविकल उल्लास उद्याम सक्रियता तथा उत्कृष्ट आह्लाद से सम्पूर्ण सत्ता समुद्र भासित हो उठी है। उससे चेतना के प्रसुप्त केंद्रों में भी गति आ गई है और कतिपय दिव्य हलचलें उभर रही हैं।


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