अमृत वचन जीवन के सिद्ध सूत्र

पूजा-उपासना के लाभ

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     अब मैंने लोगों को बताया कि भगवान् की पूजा-उपासना करने की प्रक्रिया अगर सही हो तो आदमी के पास वो सारे चमत्कार आ जायेंगे और सारी सिद्धियाँ आ जायेंगी, सारा प्रभाव उत्पन्न हो जायेगा, जो पुराणों में-ब्रह्मग्रन्थों में लिखा हुआ है। शर्त केवल एक ही है कि पूजा-उपासना सही हो। सही किस तरीके से हो, ये मैंने उदाहरण बताकर के लोगों को दिखाया। दिखाया कि हमारा दैनिक जीवन तपस्वी का जीवन होना चाहिए और साधक का जीवन होना चाहिए। हम काम-धंधा करें, व्यापार करें, उसमें हमारी ईमानदारी जुड़ी रहनी चाहिए। पूजा-उपासना मैंने की और पूजा-उपासना जो मैंने की, अपने आप में साबुन लगाने के लिये की। अपनी-अपनी मर्जी का हमें साबुन जिस तरीके से बराबर घिसा जाता है, उस तरीके से मैंने बार-बार राम का नाम लिया साबुन के तरीके से।

     भगवान् की खुशामद करने के लिये मुझे कोई खुशामद नहीं करनी है। मुझे खुशामद से बहुत नफरत है। मैं खुशामद भगवान् की भी नहीं करूँगा। क्यों करूँ मैं भगवान् की खुशामद? नाक मैं किसी के सामने भी नहीं रगड़ सकता। भगवान् के सामने भी नहीं। भगवान् अपने घर के हैं, तो मैं अपने घर का हूँ। मैं नाक रगड़ूँ, क्यों रगड़ूँ भगवान् के सामने नाक ?मैं गिड़गिड़ाऊँ, क्यों गिड़गिड़ाऊँ भगवान् के सामने? मैं किसी के सामने नहीं गिड़गिड़ा सकता। मैं गिड़गिड़ाऊँगा, तो अपनी आत्मा के सामने गिड़गिड़ाऊँगा और अपने मन के सामने गिड़गिड़ाऊँगा, अपने पुरुषार्थ के सामने गिड़गिड़ाऊँगा। मैं कहूँगा कि मेरे पुरुषार्थ, मैं तेरे सामने गिड़गिड़ाता हूँ, तू अपने रास्ते चला जा और मैं अपने मन के सामने गिड़गिड़ाऊँगा; अभागे, तू मेरा सत्यानाश करने के लिये जा रहा है। तू कहाँ भटकता है, जो तेरा सही रास्ता है, वहाँ चल न। भटकता क्यों है? मुझे गिड़गिड़ाना होगा, तो वहाँ गिड़गिड़ाऊँगा। मुझे गिड़गिड़ाना होगा तो मेरी आत्मा के सामने गिड़गिड़ाऊँगा और मैं यह कहूँगा कि ‘तू है शक्ति की पुञ्ज और मुझे अशक्त बनाये क्यों फिर रही है? मुझे दरवाजे-दरवाजे भटकने के लिये कह रही है और मुझे पत्थरों के टुकड़ों के सामने नाक रगड़ने के लिये क्यों मजबूर करती है। तेरे पास सब कुछ है और मैं बाहर किससे माँगने जाऊँ, किसके सामने हाथ पसारूँ, तेरे पास सब कुछ है। तू मुझे देती नहीं है।’ मैं लड़ूँगा तो अपनी आत्मा से लड़ूँगा। मैं खुशामद करूँगा तो अपनी आत्मा की करूँगा। मैं भीख माँगूँगा तो अपनी आत्मा से माँगूँगा।

     पूजा-उपासना मैंने की, इस तरह की भावना के साथ। जैसे आम तौर से लोगों में पाई जाती है, गरीब और भिखमंगे लोगों की मनोवृत्ति के साथ, मैं गरीब और भिखमंगे के तरीके से कभी नहीं गया, भगवान् के पास। आज तक मैंने अपने साबुन के तरीके से अपने राम का नाम लिया और मैंने बुहारी के तरीके से राम का नाम लिया। अपने मकान को साफ करने के लिये और मैंने धोबी के पत्थर के तरीके से राम का नाम लिया, अपनी पिटाई करने के लिये और मैंने रूई धुनने वाले धुनिये के रूप में राम का नाम लिया, अपने आपकी धुनाई करने के लिये। बार-बार रूई को धुनिया धुनता है न। एक ही पात्र के ऊपर बार-बार मारता है चोट, तो जैसे धुनिये के हाथ में हथौड़ी लगी रहती है, जो टाट के ऊपर बजाता है। मैंने राम के नाम को धुनिये के तरीके से काम में लिया और जो आदमी भिखमंगे के तरीके से केवल गिड़गिड़ाते हुए, अपनी मनोकामना पूरी करने के तरीके से काहिलों, बुजदिलों, कमीनों के तरीके से, छोटी हरकत की वजह से भगवान् के सामने जायें। क्या भगवान् का प्यार पायेगा? क्या भगवान् के सामने उसकी इज्जत रह जायेगी? कोई नहीं रह जायेगी।

     मैं एक इज्जतदार आदमी हूँ अपने भगवान् के सामने। और उसने मेरी इज्जत को रखा है और मैंने भगवान् की इज्जत को रखा है। मैंने कहा-तेरी इज्जत और तेरी शान, इस बात में है, तेरा बेटा और तेरा बच्चा, शान की जिन्दगी जीये। मेरी शान के साथ तेरी शान जुड़ी हुई है। मैंने भगवान् की शान को रखा और ये बताया कि इन्सान का जीवन देकर के मुझे, कोई गलती भगवान् ने नहीं की। इसका प्रतिफल मिलकर के रह गया। भगवान् की शान और मेरी शान को भगवान् ने रखा। भगवान् ने कहा कि जा, तेरी शान में कोई बट्टा आने वाला नहीं है। मैं एक शानदार आदमी हूँ। मेरी शान में कोई बट्टा नहीं लग सकता और किसी ने बट्टा नहीं लगाया। किसी ने ऊँगली नहीं उठाई और मैंने कोई दाग-धब्बा लगने नहीं दिया।

     न जाने मैं क्या से क्या सिखाता रहा लोगों को, आध्यात्मिकता की शिक्षा और प्रक्रिया के द्वारा और लोगों को ये बताता रहा कि शान और इज्जत के साथ में अगर कोई आदमी उपासना करने के लिये, भगवान् का पल्ला पकड़ने के लिये खड़ा हो जाये तो किसी बात की कमी नहीं रहेगी। तब कोई काम रुका नहीं रह सकता।

     इतने बड़े-बड़े काम मैंने किये हैं-कोई काम रुका रहा क्या? भगवान् ने मुझे कहा-साहित्य के माध्यम से लोगों के दिलों और दिमागों को बदल। मैंने कहा-मेरे पास सामर्थ्य कहाँ है? उसने कहा-‘‘बेटा! सामर्थ्य तो आत्मा के भीतर रहती है’’। बस मैंने आत्मा की सामर्थ्य को तलाश किया और न जाने क्या से क्या, कितना बड़ा साहित्य भण्डार दिया, जो दुनिया को बदल डालने के लिये काफी होना चाहिए और इसकी वजह से लाखों मनुष्यों के दिलों और दिमागों में छाया हुआ हूँ मैं। पचास लाख मनुष्यों को दीक्षा दे चुका हूँ और करोड़ों मनुष्यों के दिल और दिमाग के ऊपर सारे विश्व भर में छाया हुआ हूँ, ये चमत्कार नहीं है, क्या?

     हाँ, मुझ जैसा साधनहीन व्यक्ति जिसके पास कोई पैसे की सहायता करने वाला नहीं, जिसको कोई समर्थन देने वाला नहीं, जिसको कोई सहयोग देने वाला नहीं था। अकेला आदमी, अकेला हूँ, ऐसा करता रहता है। अकेला आदमी दुनिया को किस तरीके से हिलाता है और अभी मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। जरा ठहरिए तो सही। जब मूल्यांकन किया जायेगा कि किस तरीके से मैंने समाज को हिला करके रखा, साहित्य के द्वारा, शिक्षण के द्वारा, वाणी के द्वारा। वाणी को जब मैंने खोला मुँह में से, तो लोगों के दिलों को चीरती और कलेजों को फाड़ करके और लोगों के दिमागों को फोड़ती पार निकल गई, जिस तरीके से बंदूक की गोलियाँ पार सीने में से निकल जाती हैं, उस तरीके से मेरे हलूक और मेरे शब्द जो मुँह में से निकलते ही वो लोगों को छेदती रही है और छेदती रहेगी। अभी मैं जा रहा हूँ क्या? हाँ। अभी मैं बैखरी वाणी को बन्द कर रहा हूँ और परा, पश्यन्ति और मध्यमा वाणी को फिर काम में ला रहा हूँ। लोगों के दिलों को चीरूँगा और लोगों के कलेजों को हिलाऊँगा और आदमी के दिमागों को कूटकर के, तोड़कर के जगाऊँगा।

     इस तरह की सामर्थ्य लोगों में दिखनी ही चाहिए। हाँ। ये प्रभाव किसका है? ये प्रभाव विशुद्ध आध्यात्मिकता का है। मेरे जैसे छोटे और मामूली और साधनहीन व्यक्ति का नहीं है। मैंने लोगों को ये बताया और दिखाया जीवन के क्रिया-कलाप के द्वारा और मैंने अपने जीवन के क्रिया-कलाप के द्वारा सर्वसाधारण को यह समझाया कि जब कोई आदमी आध्यात्मिकता का सही रास्ता जान सकता हो और सही रास्ते से उसको पकड़ सकता हो तो उसमें से हर आदमी को वही लाभ उठाने की गुंजाइश है, जो मेरे लिये लाभ उठाने की गुंजाइश थी। 

आज की बात समाप्त।
।।ॐ शान्तिः।।
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