अमृत वचन जीवन के सिद्ध सूत्र

साधक कैसे बनें?

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साधक कैसे बनें?

साधकों में से कई व्यक्ति हमसे ये पूछते रहते हैं-क्या करें? क्या करें? मैं उनमें से हरेक से ये कहता हूँ, ये मत पूछो, बल्कि ये पूछो कि क्या बनें? क्या बनें? अगर आप कुछ बन जाते हैं तो करने से भी ज्यादा कीमती है, पर जो कुछ भी आप कर रहे होंगे, वो सब सही हो रहा होगा। आप साँचा बनने की कोशिश करें। अगर आप साँचा बनेंगे, तो जो भी गीली मिट्टी आपके सम्पर्क में आयेगी, आपके तरीके से आपके ढंग की शकल के खिलौने बनते हुए चले जायेंगे। आप सूरज बनें। आप चमकेंगे और चलेंगे। उसका परिणाम क्या होगा? जिन लोगों के लिये आप करना चाहते हैं वो आपके साथ-साथ चलेंगे और चमकेंगे। सूरज के साथ में नवग्रह और बत्तीस उपग्रह हैं, ये सबके सब लोग चमकते हैं और साथ-साथ चलते हैं, क्योंकि सूरज चलता है। हम चलें।  

    हम प्रकाशवान् हों। हम देखेंगे, जिस जनता के लिये हम चाहते थे कि ये हमारा अनुगामी बने और हमारी ये नकल करे, आप देखेंगे कि आप चलते हैं तो दूसरे लोग भी चलते हैं। आप स्वयं भी नहीं चलेंगे और ये अपेक्षा करेंगे कि दूसरे आदमी हमारा कहना मानें, ये मुश्किल बात है। आप गलें और वृक्ष बनें और वृक्ष बनकर के अपने जैसे असंख्य बीज आप पायें, अपने भीतर से आप पैदा कर डालें। हमको बीज की जरूरत है, बीज लाइये, बीज बनिए, कहाँ से बीज लायेंगे? आप गलिए, वृक्ष बनिए और अपने भीतर से ही फल पैदा कीजिए और प्रत्येक फल में से ढेरों के ढेरों बीज पैदा कीजिए, लीजिए बन गये तैयार। अपने भीतर से ही क्यों न बीज बनायें?

    मित्रो! जिन लोगों ने अपने आपको बनाया है, उनको ये पूछने की जरूरत न पड़ी ‘क्या करेंगे?’, उनकी प्रत्येक क्रिया इस लायक बन गई, कि वो सब कुछ कर सकने में समर्थ हो गई। उनका व्यक्तित्व ही इतना आकर्षक रहा कि प्रत्येक सफलता को और प्रत्येक महानता को सम्पन्न करने के लिये काफी था। अर्जुनदेव जी थाली, बरतन साफ करते थे। उन्होंने अपने आपको गुरु के अनुशासन में ढालने का प्रयत्न किया था और जब उनके गुरु तलाश करने लगे कि कौन-से शिष्य को उत्तराधिकारी बनाया जाय? सारे विद्वानों की अपेक्षा, सारे नेता और दूसरे गुण वालों की अपेक्षा उन्होंने अर्जुनदेव को चुना। उनके गुरु रामदास जी ने ये कहा, कि अर्जुनदेव ने अपने आपको बनाया है और बाकी आदमी इस कोशिश में लगे रहे कि हम दूसरों से क्या करायें और स्वयं क्या करें, बल्कि होना ये चाहिए था कि अपने आपको बनाना चाहिए था।

    अर्जुनदेव ने न कुछ किया था, न कराया था, केवल अपने आपको बना लिया था। इसीलिये उनके गुरु ने ये माना कि ये सबसे अच्छा आदमी है। सप्तऋषियों ने अपने आपको बनाया। उनके अन्दर तप की सम्पदा थी, ज्ञान की सम्पदा थी। हरिद्वार या जहाँ कहीं भी रहते चले, जो कुछ भी काम उन्होंने कर लिया, वो एक महानतम श्रेणी का उच्चस्तरीय काम कहलाया। अगर उनका व्यक्तित्व घटिया होता तो फिर बात कैसे बनती?

गाँधीजी ने अपने आपको बनाया, हजारों आदमी उनके पीछे चले। बुद्ध ने अपने आपको बनाया, हजारों आदमी उनके पीछे चले। हम अपने भीतर चुम्बकत्व पैदा करें। खदानों के अन्दर जो लोहे के कण, धातु के कण जमा हो जाते हैं, उसका कारण ये है कि जहाँ कहीं भी खदान होती है, वहाँ चुम्बकत्व रहता है। चुम्बकत्व से खदान छोटी-छोटी चीजों को खींचता रहता है। हम अपनी क्वॉलिटी बढ़ायें। हम अपना चुम्बकत्व बढ़ायें। हम अपना व्यक्तित्व बढ़ायें; चूँकि ये सबसे बड़ा करने के लिये काम है।

    समाज की सेवा करें। हाँ! ठीक है। वो भी आपको करनी चाहिए, पर मैं ये कहता हूँ समाज सेवा से भी पहले ज्यादा महत्त्वपूर्ण इस बात को समझें कि हमको अपनी क्वॉलिटी बढ़ानी चाहिये। खनिज में से जो धातु निकलती हैं, वो कच्ची होती हैं, लेकिन जब पकाकर के ठीक कर ली जाती हैं, साफ-सुथरी बना दी जाती हैं, तो उन्हीं धातुओं का नाम-स्वर्ण, शुद्ध स्वर्ण हो जाता है। उसी का नाम फौलाद हो जाता है। हम अपने आपको फौलाद बनायें। अपने आपकी सफाई करें, अपने आपको धोयें, अपने आपको परिष्कृत करें। इतना कर सकना, अगर हमारे लिये सम्भव हो जाये तो समझना चाहिए आपका ये सवाल पूरा हो गया, अब हम क्या करें? नहीं ये करें कि हम अच्छे बनें। समाज सेवा भी करना, पर समाज सेवा करने से पहले आवश्यक है कि समाज सेवा के लायक हथियार अपने आपको बना लें। ये ज्यादा अच्छा है। हम अपने आपकी सफाई करें। समाज सेवा भी करें, पर अपने आपकी सफाई को भूल नहीं जायें। मित्रो! एक और बात कह करके हम अपनी बात समाप्त करना चाहते हैं।

    एक हमारा आमंत्रण अगर आप स्वीकार कर सकें तो बड़ी मजेदार बात होगी। आप हमारी दुकान में शामिल हो जायें। आप दुकान में शामिल हो जायें। हमारी दुकान में बहुत फायदा है। इसमें से हर आदमी को मुनाफेदार शेयर मिल सकता है। माँगने से तो हम थोड़ा सा ही दें पायेंगे। ज्यादा हम कहाँ तक दे पायेंगे? भीख माँगने वाले को कहाँ, किसी ने क्या, कितना दिया है? थोड़ा सा ही दे पाते हैं। लेकिन आप हिस्सेदार क्यों नहीं बन जाते हमारी दुकान में? अन्धे और पंगे का योग क्यों नहीं बना लेते। हमारे गुरु और हमने साझेदारी की है। शंकराचार्य ने और मान्धाता ने साझेदारी की थी। सम्राट अशोक और बुद्ध ने साझेदारी की थी। समर्थ गुरु रामदास और शिवाजी ने साझेदारी की थी। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द ने साझेदारी की थी। क्या आप ऐसा नहीं कर सकते? आप हमारे साथ शामिल हो जायें और हम और आप मिलकर के बड़ा काम करें। उसमें से जो मुनाफा आये, वो बाँट लें। अगर आप इतनी हिम्मत कर सकते हों और ये विश्वास कर सकते हों कि हम प्रामाणिक आदमी हैं तो जिस तरीके से हमने अपने गुरु की दुकान में साझा कर लिया है, आप आयें और हमारे साथ साझा करने की कोशिश करें। अपनी पूँजी उसमें लगायें। समय की पूँजी, श्रम की पूँजी, बुद्धि की पूँजी हमारी दुकान में शामिल करें और इतना मुनाफा कमायें जिससे कि आप निहाल हो जायें।

    हमारी जिन्दगी के मुनाफे का यही तरीका है कि हमने अपनी पूँजी को अपने गुरुदेव के साथ में मिला दिया और उनकी कम्पनी में शामिल हो गये। हमारे गुरुदेव हमारे भगवान् की कम्पनी में शामिल हैं। हम अपने गुरुदेव की कम्पनी में शामिल हैं। आप में से हरेक को आवाहन करते हैं कि अगर आपकी हिम्मत है तो आप आयें और हमारे साथ जुड़ जायें और जुड़ करके हम जो लाभ कमायेंगे, भौतिक और आध्यात्मिक ,, उनका इतना हिस्सा आपके हिस्से में मिलेगा कि आप धन्य हो सकते हैं और निहाल हो सकते हैं, उसी तरीके से जैसे कि हम धन्य हो गये, निहाल हो गये। यही है साधकों से हमारा विनम्र अनुरोध। आज की बात समाप्त।

आज की बात समाप्त।
।।ॐ शान्तिः।।

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