अमृत वचन जीवन के सिद्ध सूत्र

हंस बनिये

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          अपने यहाँ गायत्री माता का प्रशिक्षण दिया जाता है। गायत्री की उपासना में भी लगे हुए हैं। लेकिन आप भूल जाते हैं, गायत्री किसके कंधे पर सवार होती है और कौन गायत्री को अपने इशारे पर नचाये- नचाये फिरता है। गायत्री माता की तसवीर का आप रोज ध्यान करते हैं। इस तसवीर में उसका वाहन देखा है न आपने। इस वाहन का नाम है- हंस। हंस के ऊपर गायत्री माता सवारी करती हैं, ये बात शायद आपको समझ में न आये। क्योंकि, इन्सान के बराबर शरीर जिसका है, वो एक जानवर पर, पशुओं पर तो सवारी कर सकते हैं, लेकिन पक्षियों पे सवारी नहीं कर सकते। घोड़े पे आप बैठ सकते हैं, गधे पे आप बैठ सकते हैं, हाथी पे बैठ सकते हैं, ऊँट पर बैठ सकते हैं, भैंसे पर बैठ सकते हैं। इन पे तो बैठ सकते हैं। लेकिन आप बताइये किसी पक्षी पे जिसका वजन बेचारे का नहीं के बराबर होता है, उसके ऊपर कैसे आदमी बैठ पायेगा।? 
 
          ये एक अलंकार है। इसमें यह बताया गया है कि हंस उस व्यक्ति का नाम है, जो उचित और अनुचित का फर्क करना जानता है। आपको उचित और अनुचित का फर्क करना चाहिए। लोगों के रास्ते पर चलने के बनिस्बत आपको अलग खड़े होकर देखना चाहिए कि मुनासिब रास्ता क्या है, मुनासिब तरीके क्या हैं, मुनासिब क्या है, लोग गलती करें तो आप क्या कर सकते हैं? आज तो गलतियों का ही जमाना है। आप पानी के बहाव में तिनके के तरीके से बहते हुए चले जायें। भला ये भी कोई समझदारी है? आप हवा में उड़ते हुए पत्तों के तरीके से उड़ते हुए चले जायें, भला ये भी कोई समझदारी हुई। आपको वजनदार होना चाहिए। आपको अपनी जिन्दगी के बारे में फैसले स्वयं करने चाहिए। अपने रास्ते का चुनाव करने वालों में आपकी हिम्मत, आपकी सहायक होनी चाहिए। 

          ईमान और भगवान् दो चीजें ऐसी हैं, जिनकी सहायता से आप बड़े से बड़े फैसले कर सकते हैं। दुनिया में तो आमतौर से गलत काम होते हैं। लोग आमतौर से अपने आपको शरीर समझते हैं और शरीर की खुशहाली के लिये जो भी बुरे से बुरा काम हो सकता है, सब करते हैं। लोग तो ऐसे बेअकल हैं कि लोगों को आज का फायदा दिखाई पड़ता है, कल का नुकसान कहाँ दिखाई पड़ता है। जितनी भी सामाजिक कुरीतियाँ हैं, इसमें क्या बात है, जरा आप बताइये। आज का फायदा, कल का नुकसान। आप भी यही करेंगे। ना, लोगों के रास्ते से हटिए। लोगों के रास्ते से हट करके अलग खड़े होकर के नये ढंग से विचार करना शुरू कीजिए कि क्या मुनासिब है और क्या मुनासिब नहीं है। आपका भविष्य किन बातों से बनता है और किन बातों से बनता नहीं है। अगर आप यह बात तय करने लगेंगे तो मैं आपको ज्ञानवान् कहूँगा। ज्ञानवानों की आपने तवारीख पढ़ी है न। 

          भगवान् बुद्ध का नाम सुना है। भगवान् बुद्ध में क्या विशेषता हुई, भगवान् से क्या वरदान मिला, इनको क्या विशेष सम्पदा मिली? आप उनके जीवन को पढ़िए। बोधि वृक्ष के नीचे, एक पेड़ के नीचे, जिसके नीचे उन्होंने तप किया था, उनको एक खास चीज मिल गई थी। उस खास चीज का नाम था- विवेक ।।दूर की बात समझने का उनको माद्दा मिल गया। उन्होंने कहा, ‘सारी दुनिया से प्रभावित होना नहीं है। हमको दूसरों को प्रभावित करना है। दूसरों की मुनासिब मान भी सकते हैं, लेकिन अधिकांश बातें खासतौर से जीवनयापन करने के सम्बन्ध में, जीवन की सम्पदाओं का उपयोग करने के सम्बन्ध में अधिकांश लोगों की राहें गलत हैं, लोगों के ढर्रे गलत हैं।’ अपने आपको भगवान् बुद्ध ने अलग से खड़ा करके देखना शुरू किया और जमाने की ओर से आँखें बन्द कर लीं और स्वयं अपने भीतर देखा और अपनी जिम्मेदारियों को देखा, अपने भविष्य को देखा, अपने कर्तव्यों को देखा और उन्होंने वो फैसले किये, जिसके आधार पर एक सामान्य राजकुमार भगवान् का अवतार कहलाने में समर्थ हुआ। 

          उस जमाने में क्या होता था, उन्होंने जरा भी विचार नहीं किया। उन्होंने यह कहा कि मुनासिब क्या है? जो मुनासिब था, वह इन लोगों से कहा। यज्ञों में हिंसा होती है, ना। हम हिंसा नहीं करेंगे। यज्ञ की बात वेदों में लिखी है तब। भगवान् बुद्ध वेदों के बारे में जानकार नहीं थे। तो उन्होंने कहा, ‘‘वेद में ऐसा लिखा है तो वेद को आपको नहीं मानना चाहिए।’’ फिर लोगों ने कहा, ‘वेद तो भगवान् ने बनाये हैं।’ तो उन्होंने ये कहा, ‘‘अगर भगवान् ने ऐसे वेद बनाये हैं, जिसमें कि नैतिक सिद्धान्तों का परिपालन नहीं हुआ है तो फिर ऐसे भगवान् को मानने की आवश्यकता क्या है? तो उन्होंने भगवान् को मानने से इन्कार कर दिया। कहने का अर्थ ये है कि उन्होंने विवेक को। बुद्ध का अर्थ है- विवेक ।।ठीक बात, वास्तविकता। वास्तविकता को उन्होंने अंगीकार कर लिया और उन्होंने यह फैसला कर लिया कि जो वास्तविकता होगी, सच्चाई होगी, हम सिर्फ उसी बात को मानेंगे। इसी का नाम है- आत्मज्ञान। इसी का नाम है- ब्रह्मविद्या। इसी का नाम है- प्रज्ञा। इसी का नाम है- ऋतम्भरा। 

           मैं आपसे यही निवेदन कर रहा था। गायत्री की महत्ता आपने जानी है तो उसका वाहन बनना शुरू कीजिए। उसके वाहन की दो ही तो विशेषता है, एक तो यह है कि नीर और क्षीर को अलग कर देता है। पानी और दूध को अलग कर देता है। इस दुनिया में जो कुछ भी मिला हुआ है, घपला है। सब गुड़- गोबर मिला हुआ है। कहीं सच्चाई की झलक दिखाई पड़ती है और उसी के साथ में झूठ और बेईमानी का कितना गहरा पुट दिखाई पड़ता है। आप अलग किस तरीके से करेंगे? आपकी विवेकशीलता के माध्यम  से यह सम्भव है कि आप दोनों को अलग कर दें। राजहंस के बारे में ये बताया गया है कि ‘‘या हंसा मोती चरे, या लंघन मर जाये’’। लंघन मरना ठीक है। 

          अगर आप ईमानदारी से नहीं कमा सकते। मुनासिब जिन्दगी नहीं जी सकते तो ऐसी जिन्दगी जीने से क्या फायदा? आप नहीं जीयें। नहीं जीने से मेरा मतलब ये है, आप  गरीबी में गुजारा कर लें। कंगाली में गुजारा कर लें। तकलीफ में गुजारा कर लें। तकलीफ में गुजारा ढेरों आदमी करते हैं। कोई हारी- बीमारी से मरता है। कोई जेल- खाने चला जाता है। किसी के बाल- बच्चे खराब हो जाते हैं। किसी के ऊपर और मुसीबतें आ जाती हैं। ढेरों आदमी इस दुनिया में ऐसे हैं, जो किसी तरह ऐसी मुसीबतें उठाते हैं। आप सच्चाई की वजह से, ईमानदारी की वजह से और दानतदारी की वजह से अगर मुसीबत उठा लें तो क्या हर्ज की बात है? सच्चाई की थोड़ी सी झलक और बेईमानी का  अधिक से अधिक माद्दा, यही तो लोक व्यवहार है। दुनिया यही तो है। आप अलग कीजिए और हंस बनने की कोशिश कीजिए। 

आज की बात समाप्त। 
॥ॐ शान्तिः॥ 
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