अमृत वचन जीवन के सिद्ध सूत्र

उपासना का महत्त्व

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          व्यक्ति की उन्नति वास्तव में बाहर से नहीं होती है। जड़ें पेड़ की जमीन के नीचे होती हैं, दिखाई नहीं पड़तीं। जड़ अगर छोटी है, तो पेड़ बढ़ नहीं सकता। आदमी का जितना विस्तार आपको दिखाई पड़ता है, वास्तव में उसके शरीर का विस्तार नहीं है। वास्तव में उसके पैसे का विस्तार नहीं है। वास्तव में उसकी अकल का विस्तार नहीं है। पर आदमी का विस्तार है, आदमी की अंतःचेतना का विस्तार। अंतःचेतना जिसकी छोटे स्तर की हो गई तो आदमी घटिया का घटिया ही रह जायेगा। कमीने का कमीना ही रह जायेगा। छोटे का छोटा ही रह जायेगा। कोई और आदमी, दूर से उसकी सहायता भी करना चाहे तो कर नहीं सकेगा, अगर भीतर वाला अंतरंग आदमी का विकसित न हो सका तो। 

          गायत्री मंत्र के चार चरणों में इसी रहस्य का उद्घाटन किया गया है कि हमारी अन्तःचेतना विकसित होनी चाहिए। उपासना का अर्थ मैं आपको समझा चुका, पास बैठ जाना, किसके पास बैठ जाना? जिसके हम पास हम बैठ जाते हैं, उसके रंग में हम रंग जाते हैं। खराब लोगों की संगति में हम बैठते हैं, खराब लोगों के रंग में रंग जाते हैं। हमारे बच्चे वाहियात और निकम्मे हो जाते हैं। पड़ोस के लड़के, वाहियात लड़के हमारे भोले- भाले लड़के को बहका ले जाते हैं। सिनेमा दिखाते हैं, बीड़ी पिलाते हैं, और थोड़े दिनों बाद ऐसा बना देते हैं कि सबसे वाहियात और सबसे निकम्मा लड़का हो जाता है हमारा। संगति का प्रभाव! हाँ, संगति का प्रभाव होता है। बुरी संगति का भी प्रभाव हो सकता है और अच्छी संगति का भी। रामायण में एक चौपाई आती है- 

‘‘काक होहिं पिक बकहु मराला।’’ 

          संगति का प्रभाव देखिए- कौआ कोयल हो जाते हैं, और बगुले मराल- हंस हो जाते हैं। उपासना मीन्स संगति। किसकी संगति, भगवान् की संगति। भगवान् की कैसी संगति? भगवान् की ऐसी संगति कि भगवान् की विशेषताएँ, हमारे जीवन में आयें। भगवान् की अगर विशेषताएँ हमारे जीवन में न आ सकीं और हमने ये कोशिश न की, कि भगवान् की विशेषताएँ हमारे भीतर में आयें और हमने उल्टी कोशिश की। क्या उल्टी कोशिश? जैसे कि हम और आप करते हैं। हमारा कमीनापन, हमारा घटियापन, भगवान् पर हावी जो जाए। जैसा हम चाहते हैं, वैसा ही भगवान् बन जाए। जैसे निकम्मे हम हैं, जैसे पाजी हम हैं, जैसे दुष्ट हम हैं, जैसे अनाचारी हम हैं, ठीक उसी तरह का भगवान् बन जाए और जो हम चाहते हैं, वो पूरा करे। आप ये चाहते हैं? भगवान् पूरा करे आपकी मर्जी। आप इसी लायक हैं, कि आपकी मर्जी भगवान् को पूरा करनी चाहिए। 

          आप धूप बत्ती खिलाते हैं, इसके बदले में ये हिमाकत करेंगे कि भगवान् को हमारी मर्जी पर चलना चाहिए। आप धूप बत्ती की रिश्वत देकर के जैसा भी मर्जी चाहे, वैसा भगवान् को चलाना चाहते हैं। ये नहीं हो सकता। ये गलतफहमी है। लोगों के दिमाग पर न जाने कहाँ से यह गलतफहमी हो गयी कि बच्चे के तरीके से भगवान् को बहकाया जा सकता है और बच्चे के तरीके से भगवान् को फुसलाया जा सकता है। जो भी हम चाहते हैं, अपनी मर्जी की बात कराने के लिये रजामन्द कराया जा सकता है। ये सम्भव है? ये बेटे, सम्भव नहीं है। मान लीजिए, हम सब हनुमान् जी के भक्त हैं, और हम ये हनुमान् जी से प्रार्थना करते हैं कि हमारा पड़ोसी मर जाये, ये हमको बहुत दुःख देता है और दूसरा पड़ोसी कहे, ये हमारा पड़ोसी मर जाये, क्योंकि हमको बहुत दुःख देता है। दोनों भगत हैं न। हनुमान् को तो इस बात की तमीज नहीं है कि हमको मनोकामना पूरी करते समय पे ये विचार करना चाहिए कि कौन मुनासिब माँग रहा है, कौन गैर मुनासिब माँग रहा है? कौन ड्यू माँग रहा है, कौन अन्ड्यू माँग रहा है? अब बताइये। हमारी मनोकामना पूरी करके पड़ोसी को मारेगा कि पड़ोसी की मनोकामना पूरी करके हमको मारेगा। क्या करेगा हनुमान्? बताइये आप। परेशान करते हैं हनुमान् को आप? ऐसा नहीं हो सकता। मनोकामना के लिये पूजा नहीं, बेटे। अगर मनोकामना के लिये पूजा है तो बन्द कीजिए। 

          मित्रो! सारे के सारे देश में अज्ञान? अध्यात्म के नाम पर अज्ञान? अध्यात्म तो अज्ञान के निवारण करने के लिये बनाया गया था। ये क्या आफत आ गई, ये क्या हो गया? उलटा अज्ञान! उलटा अज्ञान अध्यात्म में समाविष्ट हो गया। ऐसा नहीं होना चाहिए था। तो क्या होना चाहिए? 

          मित्रो! पानी बरसता है, हर चीज मुलायम हो जाती है और गीली हो जाती है, तो मैं ये पूछता हूँ कि चट्टान गीला होता है कि नहीं होता? नहीं साहब, नहीं होता और चट्टान में से पत्ता पैदा होता है? नहीं होता। उनको पानी से फायदा उठाने के लिये अपने आपको अनुकूल बनाना पड़ेगा। ये सिद्धान्त अगर समझ में आ गया तो बात आगे बढ़े और अगर आपने ये ख्याल कर रखा है कि हम जैसे भी कुछ हैं, उसी तरह से बने रहना चाहते हैं और हमको अपने आप में बदलने की कोई जरूरत नहीं है। भगवान् को बदलना  चाहिए। भगवान् को अपने कायदे बदलने चाहिए। भगवान् को अपने कानून बदलने चाहिए। भगवान् को अपने नियम बदलने चाहिए। भगवान् को अपनी मर्यादा बदलनी चाहिए। क्यों? क्योंकि हम चलाते हैं- हुकुम। 

          हुकुम मीन्स मनोकामना। मनोकामना मीन्स हुकुम। आप हुकुम चलाते हैं? आप भगवान् के बॉस हैं? आप भगवान् पर हुकुम चलाना चाहते हैं? आप भगवान् को अपनी मर्जी पर चलाना चाहते हैं? क्योंकि आप हनुमान् चालीसा का पाठ करते हैं और आप धूप बत्ती दिखाते हैं। इसीलिये आप चाहते हैं कि भगवान् को आपकी मर्जी पर चलना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता। अध्यात्म क्या है? अध्यात्म ये है कि भगवान् की मर्जी के मुताबिक़ हमको ढलने के लिये कोशिश करनी चाहिए। हमको अपने आपकी पात्रता का ऐसा विकास करना चाहिए ताकि भगवान् का अनुग्रह, भगवान् की कृपा प्राप्त करने में हम समर्थ हो सकें। 


आज की बात समाप्त। 
॥ॐ शान्तिः॥ 
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