इक्कीसवीं सदी का संविधान

अपना मूल्यांकन भी करते रहें

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    यह निर्विवाद सत्य है कि धर्म और सदाचार के आदर्शवादी सिद्धांतों का प्रशिक्षण भाषणों और लेखों से पूरा नहीं हो सकता। ये दोनों माध्यम महत्त्वपूर्ण तो हैं, पर इनका उपयोग इतना ही है कि वातावरण तैयार कर सकें। वास्तविक प्रभाव तो तभी पड़ता है, जब अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करके किसी को प्रभावित किया जाए। चूँकि हमें नए समाज की, नए आदर्शों, जनमानस में प्रतिष्ठापना करनी है, इसलिए यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि युग निर्माण परिवार के सदस्य दूसरों के सामने अपना अनुकरणीय आदर्श रखें। प्रचार का यही श्रेष्ठ तरीका है। इस पद्धति को अपनाए बिना जनमानस को उत्कृष्टता की दिशा में प्रभावित एवं प्रेरित किया जाना संभव नहीं। इसलिए सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य इस बात की चेष्टा करे कि उसके जीवन में आलस्य, प्रमाद, अव्यवस्था एवं अनैतिकता की जो दुर्बलताएँ समाई हुई हों, उनका गंभीरतापूर्वक निरीक्षण करे और इस आत्म- चिंतन में जो- जो दोष दृष्टिगोचर हों, उन्हें सुधारने के लिए एक क्रमबद्ध योजना बनाकर आगे बढ़ चले।

     आत्म चिंतन के लिए हम में से हर एक हो अपने से निम्न प्रश्न पूछने चाहिए और उनके उत्तरों को नोट करना चाहिए।

    () समय जैसी जीवन की बहुमूल्य निधि का हम ठीक प्रकार सदुपयोग करते हैं या नहीं? आलस्य और प्रमाद में उसकी बरबादी तो नहीं होती?

     () जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का हमें ध्यान है या नहीं? शरीर सज्जा में ही इस अमूल्य अवसर को नष्ट तो नहीं कर रहे? देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के पुनीत कर्तव्य की उपेक्षा तो नहीं करते?

     () अपने विचारधारा एवं गतिविधियों को हमने अंधानुकरण के आधार पर बनाया है या विवेक, दूरदर्शिता एवं आदर्शवादिता के अनुसार उनका निर्धारण किया है?

     () मनोविकारों और कुसंस्कारों के शमन करने के लिए हम संघर्षशील रहते हैं या नहीं? छोटे- छोटे कारणों को लेकर हम अपनी मानसिक शांति से हाथ धो बैठने और प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध करने की भूल तो नहीं करते।

     () कटु भाषण, छिद्रान्वेषण एवं अशुभ कल्पनाएँ करते रहने की आदतें छोड़कर सदा संतुष्ट, प्रयत्नशील एवं हँसमुख रहने की आदत हम डाल रहे हैं या नहीं?

    () शरीर, वस्त्र, घर तथा वस्तुओं को स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित रखने का अभ्यास आरंभ किया या नहीं? श्रम से घृणा तो नहीं करते?

   () परिवार को सुसंस्कारी बनाने के लिए आवश्यक ध्यान एवं समय लगाते हैं या नहीं?

     () आहार सात्विकता प्रधान होता है न? चटोरपन की आदत छोड़ी जा रही है न? सप्ताह में एक समय उपवास, जल्दी सोना, जल्दी उठना, आवश्यक ब्रह्मचर्य का नियम पालते हैं या नहीं?

  () ईश्वर उपासना, आत्मचिंतन एवं स्वाध्याय को अपने नित्य- नियम में स्थान दे रखा है या नहीं?

 (१०) आमदनी से अधिक खर्च तो नहीं करते? कोई दुर्व्यसन तो नहीं? बचत करते हैं न?

    उपरोक्त दस प्रश्न नित्य अपने आपसे पूछते रहने वाले को जो उत्तर आत्मा दे, उन पर विचार करना चाहिए और जो त्रुटियाँ दृष्टिगोचर हों, उन्हें सुधारने का नित्य ही प्रयत्न करना चाहिए।

    आत्म सुधार के लिए क्रमिक परिष्कार की पद्धति को अपनाने से भी काम चल सकता है। अपने सारे दोष- दुर्गुणों को एक ही दिन में त्याग देने का उत्साह तो लोगों में आता है, पर संकल्प शक्ति के अभाव में बहुधा वह प्रतिज्ञा निभ नहीं पाती, थोड़े समय में वही पुराना कुसंस्कारी ढर्रा आरंभ हो जाता है। प्रतिज्ञाएँ करने और उन्हें न निभा सकने से अपना संकल्प बल घटता है और फिर छोटी- छोटी प्रतिज्ञाओं को निभाना भी कठिन हो जाता है। यह क्रम कई बार चलाने पर तो मनुष्य का आत्मविश्वास ही हिल उठता है और वह सोचता है कि हमारे कुसंस्कार इतने प्रबल हैं कि जीवनोत्कर्ष की दिशा में बदल सकना अपने लिए संभव ही न होगा। यह निराशाजनक स्थिति तभी आती है जब कोई व्यक्ति आवेश और उत्साह में अपने समस्त दोष- दुर्गुणों को तुरंत त्याग देने की प्रतिज्ञा करता है और मनोबल की न्यूनता के कारण चिर- संचित कुसंस्कारों से लड़ नहीं सकता।

     आत्मशोधन का कार्य एक प्रकार का देवासुर संग्राम है। कुसंस्कारों की आसुरी वृत्तियाँ अपना मोर्चा जमाए बैठी रहती हैं और वे सुसंस्कार धारण के प्रयत्नों को निष्फल बनाने के लिए अनेकों छल- बल करती रहती हैं। इसलिए क्रमशः आगे बढ़ने और मंथर किंतु सुव्यवस्थित रीति से अपने दोष- दुर्गुणों को परास्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। सही तरीका यह है कि अपनी सभी बुराइयों एवं दुर्बलताओं को एक कागज पर नोट कर लेना चाहिए और प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर उसी दिन का ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए कि आज अपनी अमुक दुर्बलता को इतने अंशों में तो घटा ही देना है। उस दिन को जो कार्यक्रम बनाया जाए, उसके संबंध में विचार कर लेना चाहिए कि इनमें कब, कहाँ, कितने, किन कुसंस्कारों के प्रबल होने की संभावना है। उन संभावनाओं के सामने आने पर हमें कम से कम कितनी आदर्शवादिता दिखानी चाहिए, यह निर्णय पहले ही कर लेना चाहिए और फिर सारे दिन प्रातःकाल की हुई प्रतिज्ञा के निबाहने का दृढ़तापूर्वक प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार प्रतिदिन थोड़ी- थोड़ी सफलता भी आत्म- सुधार की दिशा में प्राप्त होती चले तो अपना साहस बढ़ेगा और धीरे- धीरे सभी दोष- दुर्गुणों को छोड़ सकना संभव हो जाएगा।

 छोटे संकल्प- बड़ी सफलताएँ

     आज इतनी मात्रा में ही भोजन करेंगे, इतनी दूर टहलने जाएँगे, इतना व्यायाम करेंगे, आज तो ब्रह्मचर्य रखेंगे ही, बीड़ी पीने आदि का कोई व्यसन हो तो रोज जितना बीड़ी पीते थे, उसमें एक कम कर देंगे, इतने समय तो भजन या स्वाध्याय करेंगे ही, सफर एवं व्यवस्था में आज इतनी देर का अमुक समय तो लगाएँगे ही, इस प्रकार की छोटी- छोटी प्रतिज्ञाएँ नित्य लेनी चाहिए और उन्हें अत्यंत कड़ाई के साथ उस दिन तो पालन कर ही लेना चाहिए। दूसरे दिन की स्थिति समझते हुए फिर दूसरे दिन की सुधरी दिनचर्या बनाई जाए। इसमें शारीरिक क्रियाओं का ही नहीं, मानसिक गतिविधियों का सुधार करने का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। प्रतिदिन छोटी- छोटी सफलताएँ प्राप्त करते चलने से अपना मनोबल निरंतर बढ़ता है और फिर एक दिन साहस एवं संकल्प बल इतना प्रबल हो जाता है कि आत्मशोधन की किसी कठोर प्रतिज्ञा को कुछ दिन ही नहीं वरन् आजीवन निबाहते रहना सरल हो जाता है।

     दैनिक आत्मचिंतन एवं दिनचर्या निर्धारण के लिए एक समय निर्धारित किया जाए। दिनचर्या निर्धारण के लिए, प्रातः सोकर उठते ही जब तक शय्या त्याग न किया जाए, वह समय सर्वोत्तम है। आमतौर से नींद खुलने के कुछ देर बाद ही लोग शय्या त्यागते हैं, कुछ समय तो ऐसे ही आलस में पड़े रहते हैं। यह समय दैनिक कार्यक्रम बनाने के लिए सर्वोत्तम है। शय्या पर जाते समय ही किसी को नींद नहीं आ जाती, इसमें कुछ देर लगती है। इस अवसर को आत्म- चिंतन में, अपने आपसे १० प्रश्न पूछने और उनके उत्तर प्राप्त करने में लगाया जा सकता है। जिनके पास अन्य सुविधा के समय मौजूद हैं, पर उपरोक्त दो समय व्यस्त से व्यस्त सज्जनों के लिए भी सुविधाजनक रह सकते हैं। इन दोनों प्रक्रियाओं को अपनाकर हम आसानी से आत्मिक प्रगति के पथ पर बहुत आगे बढ़ सकते हैं।

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