इक्कीसवीं सदी का संविधान

हम बदलेंगे, युग बदलेगा, हम सुधरेंगे

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          युग निर्माण की योजना का श्री गणेश हमें अपने आप से आरंभ करना चाहिए। वर्तमान नारकीय परिस्थितियों को भावी सुख- शान्तिमयी स्वर्गीय वातावरण में बदलने के लिए चिंतन ही एकमात्र वह केन्द्र बिन्दु है, जिसके आधार पर व्यक्ति की दिशा, प्रतिभा, क्रिया, स्थिति एवं प्रगति पूर्णतया निर्भर है। चिंतन की उत्कृष्टता, निकृष्टता के आधार पर व्यक्ति, देव और असुर बनता है। स्वर्ग और नरक का सृजन पूर्णतया मनुष्य के अपने हाथ में है। अपने भाग्य और भविष्य का निर्माण हर कोई स्वयं ही करता है। उत्थान एवं पतन की कुँजी चिंतन की दिशा को ही माना गया ह। हमें अपनी परिस्थितियाँ यदि उत्कृष्ट स्तर की अभीष्ट हों तो इसके लिए एक अनिवार्य शर्त यह है कि अपने चिंतन की धारा निकृष्टता की दिशा में प्रवाहित होने से रोककर उसे उत्कृष्टता की ओर मोड़ दें। यह मोड़ ही हमारे स्तर, स्वरूप और परिस्थितियों को बदलने में समर्थ हो सकता है। चिंतन निकृष्ट स्तर का हो और हम महानता वरण कर सकें, यह संभव नहीं। संकीर्ण और स्वार्थी लोग अनीति से कुछ पैसे भले ही इकट्ठे कर लें, पर उन विभूतियों से सर्वथा वंचित ही बने रहेंगे, जो व्यक्तित्व को प्रखर और परिस्थितियों को सुख- शांति से भरी संतोषजनक बना सकती है।

       समाज व्यक्तियों के समूह का नाम है। व्यक्ति जैसे होंगे समाज वैसा ही बन जाएगा। लोग जैसे होंगे वैसा ही समाज एवं राष्ट्र बनेगा। दीन दुर्बल स्तर की जनता कभी समर्थ और स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती। धर्म, शासन, व्यवसाय, उद्योग, चिकित्सा, शिक्षा, कला आदि सभी क्षेत्रों का नेतृत्व जनता के ही आदमी करते हैं। जन- मानस का उत्तर गिरा हुआ हो तो ऊँचे, अच्छे, समर्थ और सजीव व्यक्तित्व नेतृत्व के लिए कहाँ से आएँगे?

    व्यक्ति और समाज की समग्र प्रगति के लिए चिंतन की स्वस्थ दिशा एवं उत्कृष्टता दृष्टिकोण का होना अनिवार्य एवं आवश्यक है। इसकी पूर्ति चाहे आज की जाए चाहे से हजार वर्ष बाद। प्रगति का प्रभाव उसी दिन उदय होगा, जिस दिन यह भली- भाँति अनुभव कर लिया जाएगा कि दुर्दशा से छुटकारा पाने के लिए दुर्बुद्धि का परित्याग आवश्यक है। आज की स्थिति में सबसे बड़ा शौर्य, साहस, पराक्रम और पुरुषार्थ यह है कि हम पूरा मनोबल इकट्ठा करके अपनी और अपने सगे संबंधित व्यक्तियों की विचार शैली में ऐसा प्रखर परिवर्तन प्रस्तुत करें, जिसमें विवेक की प्रतिष्ठापना हो और अविवेकपूर्ण दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों को पैरों तले कुचल कर रख दिया जाए।

    मूढ़ता और दुष्टता के प्रति व्यामोह ने हमें असहाय और कायर बना दिया है। जिसे अनुचित अवांछनीय समझते हैं, उसे बदलने सुधारने का साहस कर नहीं पाते। न तो सत्य को अपनाने का साहस है और न असत्य को त्यागने का। कुड़- कुड़ाते भर जरूर हैं कि हम अनुपयुक्त विचारणा एवं परिस्थितियों से ग्रस्त हैं, पर जब सुधार और बदलाव का प्रश्न आता है, तो पैर थर- थर कर काँपने लगते हैं और जी काँपने लगता है। कायरता नस- नस में रम कर बैठ गई है। अपनी अवांछनीय मान्यताओं से जो नहीं लड़ सकता, वह आक्रमणकारियों से क्या लड़ेगा? जो अपनी विचारणा को नहीं सुधार सकता, वह परिस्थितियों को क्या सुधारेगा?

        युग परिवर्तन का शुभारंभ अपनी मनोभूमि के परिवर्तन के साथ आरंभ करना होगा। हम लोग नव निर्माण के संदेशवाहक एवं अग्रदूत हैं। परिवर्तन की प्रक्रिया हमें अपनी चिंतन दिशा अविवेक से विलग कर विवेक के आधार पर विनिर्मित करनी चाहिए। जो असत्य है, अवांछनीय है, अनुपयोगी है, उसे छोड़कर हम साहस दिखाएँ। अब बहादुरी का मुकुट उनके सिर बाँधा जाएगा, जो अपनी दुर्बलताओं से लड़ सकें और अवांछनीयता को स्वीकार करने से इंकार कर सकें। नव निर्माण के अग्रदूतों की साहसिकता इसी स्तर की होनी चाहिए। उनका प्रथम चरण अपनी अवांछनीय मान्यताओं को बदल डालने और अपने क्रिया- कलाप में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए एक बार पूरा मनोबल इकट्ठा कर लेना चाहिए और बिना दूसरों की निंदा- स्तुति की, विरोध- समर्थन की चिंता किए निर्दिष्ट पथ पर एकाकी चल देना चाहिए। ऐसे बड़े कदम जो उठा सकते हों, उन्हीं से यह आशा की जाएगी कि युग परिवर्तन के महान् अभियान में वास्तविकता योगदान दे सकेंगे।

        जानकारियाँ देने और ग्रहण करने भर की आवश्यकता वाणी और लेखनी द्वारा सम्पन्न की जा सकती है। तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करके विचार बदले जा सकते हैं, पर अंतराल में जमी हुई आस्थाओं तथा चिर अभ्यस्त गतिविधियों को बदलने के लिए समझाने- बुझाने से भी बड़ा आधार प्रस्तुत करना पड़ेगा और यह है- ‘‘अपना आदर्श एवं उदाहरण प्रस्तुत करना।’’ अनुकरण की प्रेरणा इसी से उत्पन्न होती है। दूसरों को इस सीमा तक प्रभावित करना कि वे भी अवांछनीयता को छोड़ने का साहस दिखा सकें, तभी संभव है, जब वैसे ही साहसी लोगों के अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किए जा सकें। आज आदर्शवादिता की बढ़- चढ़कर अपना उदाहरण प्रस्तुत कर सकें, ऐसे निष्ठावान् देखने को नहीं मिलते। यही कारण है कि उपदेशों पर किया श्रम व्यर्थ सिद्ध होता चला जा रहा है और सुधार की अभीष्ट आवश्यकता पूरी हो सकने का सुयोग नहीं बन पा रहा है।

 

       जन- मानस के परिवर्तन की महती आवश्यकता को यदि सचमुच पूरा किया जाना है, तो उसका रास्ता एक ही है कि आदर्शों को जीवन में उतार सकने वाले साहसी लोगों का एक ऐसा दल प्रकट हो, जो अपने आचरणों द्वारा यह सिद्ध करे कि आदर्शवादिता केवल एक- दूसरे को उपदेश करने भर की विडंबना नहीं है वरन् उसे कार्य रूप में परिणत भी किया जा सकता है। इस प्रतिपादन का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए हमें अपने को ही आगे करना होगा। दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर गोली नहीं चलाई जा सकती। आदर्श कोई और प्रस्तुत करे और नेतृत्व हम करें, अब यह बात नहीं चलेगी। हमें अपनी आस्था की प्रामाणिकता अपने आचरण द्वारा सिद्ध करनी होगी। आचरण ही सदा से प्रामाणिक रहा है, उसी से लोगों को अनुकरण की प्रेरणा मिलती है।

     आज जन मानस में यह भय और गहराई तक घुस गया है कि आदर्शवादी जीवन में कष्ट और कठिनाइयाँ भरी पड़ी हैं। उत्कृष्ट विचारणा केवल कहने- सुनने भर का मनोरथ करने के लिए है। उसे व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित नहीं किया जा सकता। प्राचीनकाल के महापुरुषों के उदाहरण प्रस्तुत करना काफी नहीं, उत्साह तो प्रत्यक्ष से ही उत्पन्न होता है। जो सामने है, उसी से अनुकरण की प्रेरणा उपज सकती है। जो इस अभाव एवं आवश्यकता की पूर्ति किसी न किसी को तो पूरी करनी हो होगी। इसके बिना विकृतियों और विपत्तियों के वर्तमान संकट से छुटकारा पाया न जा सकेगा।

    यह आवश्यकता हम लोगों को ही पूरी करनी होगी। दूसरों लोग इस मोर्चे से पीछे हट रहे हैं। उन्हें नेतागिरी यश, प्रशंसा और मान प्राप्त करने की ललक तो है, पर अपने को आदर्शवाद की प्रतीक प्रतिमा के रूप में प्रस्तुत करने का साहस नहीं हो रहा है। आज के अगणित तथाकथित लोकसेवी अवांछनीय लोकमान्यताओं के ही अनुगामी बने हुए हैं। धार्मिक क्षेत्र के अधिकांश नेता, संत- महंत जनता की रूढ़ियों, मूढ़ताओं और अंध- परम्पराओं का पोषण उनकी अवांछनीयताओं को समझते हुए भी करते रहते हैं। राजनैतिक नेता अपना चुनाव जीतने के लिए वोटरों की अनुचित माँगें पूरी करने के लिए भी सिर झुकाए रहते हैं।

     इस स्थिति में पड़े हुए लोग जनमानस के परिष्कार जैसी लोकमंगल की मूलभूत आवश्यकता पूर्ण कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते। इस प्रयोजन की पूर्ति वे करेंगे, जिनमें लोकरंजन की अपेक्षा लोकमंगल के लिए आगे बढ़ने का, निंदा, अपयश और विरोध सहने का साहस हो। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने बंदूक की गोलियाँ खाई थीं। बौद्धिक पराधीनता के विरुद्ध छेड़े हुए अपने विचार क्रांति संग्राम में भाग लेने वाले सेनानियों को कम से कम गाली खाने के लिए तैयार रहना ही होगा, जो गाली खाने से डरेगा, वह अवांछनीयता के विरुद्ध आवाज कैसे उठा सकेगा? अनुचित से लड़ कैसे सकेगा? इसलिए युग परिवर्तन के महान् अभियान का नेतृत्व कर सकने की आवश्यकता शर्त यह है कि इस क्षेत्र में कोई यश और मान पाने के लिए नहीं विरोध, निंदा और तिरस्कार पाने की हिम्मत लेकर आगे आए। नव निर्माण का सुधारात्मक अभियान गतिशील बनाने में मिलने वाले विरोध और तिरस्कार को सहने के लिए आगे कौन आए? इसके लिए प्रखर मनोबल और प्रचंड साहस की आवश्यकता होती है। इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मूर्धन्य स्तर के लोग भी साहस विहीन लुंज- पुंज दिखाई दे रहे हैं और शौर्य पराक्रम के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों से डरकर आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

    आज सच्चे अध्यात्म को कल्पना लोक से उतार कर व्यावहारिक जीवन में उतारे जाने की नितांत आवश्यकता है। इसके बिना हम आत्मिक प्रगति न कर सकेंगे। अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित न कर सकेंगे और यदि यह न किया जा सका, तो समाज के नव निर्माण का, धरती पर स्वर्ग के अवतरण का प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपना समस्त साहस बटोर कर अपनी वासनाओं, तृष्णाओं,

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