इक्कीसवीं सदी का संविधान

संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार

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            परमार्थ परायण जीवन जीना है तो उसके नाम पर कुछ भी करने लगना उचित नहीं। परमार्थ के नाम पर अपनी शक्ति ऐसे कार्यों में लगानी चाहिए जिनमें उसकी सर्वाधिक सार्थकता हो। स्वयं अपने अंदर से लेकर बाहर समाज में सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करना, बढ़ाना इस दृष्टि से सबसे अधिक उपयुक्त है। संसार में जितना कुछ सत्कार्य बन पड़ रहा है, उन सबके मूल में सत्प्रवृत्तियाँ ही काम करती हैं। लहलहाती हुई खेती तभी हो सकती है, जब बीज का अस्तित्व मौजूद हो। बीज के बिना पौधा कहाँ से उगेगा? भले या बुरे कार्य अनायास ही नहीं उपज पड़ते, उनके मूल में सद्विचारों और कुविचारों की जड़ जमी होती है। समय पाकर बीज जिस प्रकार अंकुरित होता और फलता- फूलता है, उसी प्रकार सत्प्रवृत्तियाँ भी अगणित प्रकार के पुण्य- परमार्थों के रूप में विकसित एवं परिलक्षित होती हैं। जिस शुष्क हृदय में सद्भावनाओं के लिए, सद्विचारों के लिए कोई स्थान नहीं मिला, उसके द्वारा जीवन में कोई श्रेष्ठ कार्य बन पड़े, यह लगभग असंभव ही मानना चाहिए। जिन लोगों ने कोई सत्कर्म किए हैं, आदर्श का अनुकरण किया है, उनमें से प्रत्येक को उससे पूर्व अपनी पाशविक वृत्तियों पर नियंत्रण कर सकने योग्य सद्विचारों का लाभ किसी न किसी प्रकार मिल चुका होता है। कुकर्मी और दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्यों के इस घृणित स्थिति में पड़े रहने की जिम्मेदारी उनकी उस भूल पर है, जिसके कारण वे सद्विचारों की आवश्यकता और उपयोगिता को समझने से वंचित रहे, जीवन के इस सर्वोपरि लाभ की उपेक्षा करते रहे, उसे व्यर्थ मानकर उससे बचते और कतराते रहे। मूलतः मनुष्य एक प्रकार का काला कुरूप लोहा मात्र है। सद्विचारों का पारस छूकर ही वह सोना बनता है। एक नगण्य तुच्छ प्राणी को मानवता का महान् गौरव दिला सकने की क्षमता केवल मात्र सद्विचारों में है। जिसे यह सौभाग्य नहीं मिल सका, वह बेचारा क्यों कर अपने जीवन- लक्ष्य को समझ सकेगा और क्यों कर उसके लिए कुछ प्रयत्न- पुरुषार्थ कर सकेगा?

      इस संसार में अनेक परमार्थ और उपकार के कार्य हैं, वे सब आवरण मात्र हैं, उनकी आत्मा में, सद्भावनाएँ सन्निहित हैं। सद्भावना सहित सत्कर्म भी केवल ढोंग मात्र बनकर रह जाते हैं। अनेक संस्थाएँ आज परमार्थ का आडम्बर करके सिंह की खाल ओढ़े फिरने वाले शृंगाल का उपहासास्पद उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। उनसे लाभ किसी का कुछ नहीं होता, विडम्बना बढ़ती है और पुरुषार्थ को भी लोग आशंका एवं संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं। प्राण रहित शरीर कितने ही सुंदर वस्त्र धारण किए हुए क्यों न हो, उसे कोई पसंद न करेगा, न उससे किसी का कोई भला होगा। इसी प्रकार सद्भावना रहित जो कुछ भी लोकहित, जनसेवा के प्रयास किए जाएँगे, वे भलाई नहीं, बुराई ही उत्पन्न करेंगे।
       
बुराइयाँ आज संसार में इसलिए बढ़ और फल- फूल रही हैं कि उनका अपने आचरण द्वारा प्रचार करने वाले पक्के प्रचारक, पूरी तरह मन, कर्म, वचन से बुराई फैलाने वाले लोग बहुसंख्या में मौजूद हैं। अच्छाइयों के प्रचारक आज निष्ठावान् नहीं, बातूनी लोग ही दिखाई पड़ते हैं, फलस्वरूप बुराइयों की तरह अच्छाइयों का प्रसार नहीं हो पाता और वे पोथी के वचनों की तरह केवल कहने- सुनने भर की बातें रह जाती हैं। कथा- वार्ताओं को लोग व्यवहार की नहीं कहने- सुनने की बात मानते हैं और इतने मात्र से ही पुण्य लाभ की संभावना मान लेते हैं।
       
  सत्प्रवृत्तियों को मनुष्य के हृदय में उतार देने से बढ़कर और कोई महत्त्वपूर्ण सेवा कार्य इस संसार में नहीं हो सकता। वस्तुओं की सहायता भी आवश्यकता के समय उपयोगी सिद्ध हो सकती है, पर उसका स्थाई महत्त्व नहीं है। आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य लोग ऐसी सेवा कर भी नहीं सकते। हर आदमी स्थायी रूप से अपनी समस्या, अपने पुरुषार्थ और विवेक से ही हल कर सकता है। दूसरों की सहायता पर जीवित रहना न तो किसी मनुष्य के गौरव के अनुकूल हे और न उससे स्थायी हल ही निकलता है। जितनी भी कठिनाइयाँ व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में दिखाई पड़ती हैं, उनका एकमात्र कारण कुबुद्धि है। यदि मनुष्य अपनी आदतों को सुधार ले, स्वभाव को सही बना ले और विचारों तथा कार्यों का ठीक तारतम्य बिठा ले तो बाहर से उत्पन्न होती दीखने वाली सभी कठिनाइयाँ बात की बात में हल हो सकती हैं। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी में है कि सत्प्रवृत्तियों को अधिकाधिक पनपने का अवसर मिले। इसी प्रयास में प्राचीनकाल में कुछ लोग अपने जीवन के उत्सर्ग करते थे, उन्हें बड़ा माना जाता था और ब्राह्मण के सम्मानसूचक पद पर प्रतिष्ठित किया जाता था। चूँकि सत्प्रवृत्तियों को पनपना संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है इसलिए उसमें लगे हुए व्यक्तियों को सम्मान भी मिलना चाहिए।

 

          दानों में सर्वोत्तम दान ब्रह्मदान कहा जाता है। ब्रह्मदान का अर्थ है- ज्ञान दान। ज्ञान का अर्थ है- वह भावना और निष्ठा जो मनुष्य के नैतिक स्तर को सुस्थिर बनाए रहती है। युग निर्माण सत्संकल्प में जिन सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार की प्रेरणा की गई है, वह यही ब्रह्मदान है। इस अमृत जल से सींचा जाने पर मुरझाता हुआ युग- मानस पुनः हरा- भरा पुष्प- पल्लवों से परिपूर्ण बन सकता है। इसी महान् कार्य को परमार्थ कहा जा सकता है, जिसको पूरा करने के लिए परमात्मा ने मनुष्य को विशेष क्षमता, सत्ता और महत्ता प्रदान की है।

       समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ और धन की पाँचों विभूतियों का अधिकाधिक भाग हमें परमार्थ के लिए लगाना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन की आवश्यकता पूर्ति में दिव्य- विभूतियों को पूरी तरह नष्ट न कर देना चाहिए, वरन् न्यूनाधिक मात्रा में कुछ न कुछ इनका अंश परमार्थ के लिए सत्प्रवृत्तियों के विकास के लिए सुरक्षित रख लेना चाहिए। दैनिक जीवन में जिस प्रकार अन्य अनेक आवश्यक कार्य नियत रहते हैं और उन्हें किसी न किसी प्रकार पूरा करते हैं, उसी प्रकार इस परमार्थ कार्य को भी एक नितांत आवश्यक और लोक- परलोक के लिए श्रेयस्कर महत्त्वपूर्ण कार्य मानना चाहिए। जिस कार्य को हम महत्त्वपूर्ण मान लेंगे, उसके लिए समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक नियमित अंश निरंतर लगाते रहना भार स्वरूप प्रतीत न होगा, वरन् उस मार्ग में किया हुआ प्रयत्न जीवन को धन्य बनाने वाला सर्वोत्तम सार्थक कार्य प्रतीत होने लगेगा।
          
सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए युग निर्माण अभियान के अंतर्गत अनेक कार्यक्रम सुझाए गए हैं। झोला पुस्तकालय हर एक के लिए सुलभ हैं। जिसके पास जो विभूति हो वह उसे उसके लिए नियोजित करते रहने का क्रम बना लें। समय और श्रम पुरुषार्थ तो हर व्यक्ति लगा ही सकता है। उसका सुनिश्चित अंश लगाने का नियम बना लेना चाहिए। प्रभावशाली व्यक्ति उसका समर्थन खुले रूप में करें, लोगों पर उसके लिए दबाव डालें तो काफी प्रगति हो सकती है। ज्ञानवान अपनी सूझबूझ एवं मार्गदर्शन से लेकर प्रेरणा देने तक का कार्य कर सकते हैं। धनवान उनके लिए आवश्यक साधन जुटाए रह सकते हैं। न्यूनतम एक घंटा समय एवं एक दिन की आय सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए लगाने का क्रम हर व्यक्ति बना ले तो इतना बड़ा कार्य हो सकता है कि इतिहास में उसे स्वर्णाक्षरों में लिखा जाए।   | |     |  

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