आयुर्वेद का व्यापक क्षेत्र

सप्तधातु

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धातु शब्द की निरुक्ति

धारणात् धातवः- इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो शरीर का धारण करता है उसको धातु कहते हैं ।।
सामान्य रूप से तो मल और दोष भी शरीर को धारण करते हैं परन्तु धातुएँ शरीर को धारण करती हैं तथा पोषण भी करती हैं ।। जो धातुएँ शरीर को धारण करती हैं वे ही मुख्य रूप से शरीर का आधार होने के कारण अवलम्बन भी करती हैं ।।

अतः शरीर उन धातुओं पर ही टिका रहता है- अर्थात् धातुओं के बिना शरीर की कोई स्थिति नहीं है ।।
- धातुएँ शरीर को धारण करने का कार्य केवल स्थूल रूप से नहीं करती हैं, बल्कि अपने गुण व कर्मों के कारण शरीर को सतत पोषण प्रदान करती है तथा शरीर अवयवों एवं शरीरगत अन्य भावों की वृद्धि एवं शरीर का उपचय करने में समर्थ होती है ।।
धातु शब्द का जो केवल धारण करने वाला यह शब्दार्थ किया गया है, उससे केवल शरीर में आधार को ही ग्रहण न करके शरीर को बल, स्थिरता, दृढ़ता और पोषण प्रदान करना भी धातु शब्द से अभिप्रेत है ।।

धातुओं की संख्या
शरीर में धातुएँ सामान्यतः सात होती है- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र ।। ये सभी दोषों द्वारा दूषित की जाती है अतः दूष्य कहलाती हैं ।।

रसाऽसं सृङ्गमांसमेदो अस्थि मज्जा शुक्राणु धातवः सप्त दूष्याः मला (अ.द.सू.१)

यद्यपि इन सातों धातुओं के कार्य पृथक्- पृथक् रूप से भिन्न- भिन्न होते हैं, किन्तु धारण और पोषण का कार्य सामान्य होने से इन्हें धातु की संज्ञा दी है ।। ये सातों धातुएँ अपने- अपने भिन्न कर्मों के द्वारा शरीर का उपकार करती हुई शरीर को स्थिरता व दृढ़ता प्रदान करती है ।। भिन्न- भिन्न रूप से किये जाने वाले इन सातों धातुओं के सभी प्रकार के कार्यों का अंतिम परिणाम एक ही होता है, वह है शरीर को धारण व पोषण प्रदान करना ।। अतः इन सातों को धातु कहा गया है ।।

धातुओं के कार्य

प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारण पूरणे,
गर्भोत्पादश्च कर्माणि धातूनां क्रमशो विदुः ।। (अ.स.सू.१)

-रसादि धातुओं के क्रमशः
प्रीणन, रस का ग्रहण धारण विवेक कार्य रक्त का ।।
लेप मांस ।।
स्नेह मेद ।।
धारण अस्थि ।।
पूरण मज्जा ।।
‍गभोर्त्पादन शुक्र का मुख्य कर्म है ।।

''शरीरं धरयन्त्येते धात्वाहाराश्च सर्वदा ।'' (अ.स.सू.१)
ये पूर्वोक्त रस रक्तादि धातुएँ शरीर को धारण करते हैं और धातुओं के आहार हैं- अर्थात् जिस प्रकार प्राणियों की वृद्धि का कारण आहार है ।। ठीक उसी प्रकार धातुओं की वृद्धि का कारण 'धातु' ही है ।। पूर्व- पूर्व उत्तरोत्तर धातुओं के आहार हैं ।। जैसे रस से रक्त का, रक्त से मांस तथा मांस से मेद का इत्यादि ।।

धातुओं की उत्पत्ति
शरीर के समस्त भावों की उत्पत्ति में पंचमहाभूत मूल कारण है ।। समग्र सृष्टि अथवा सृष्टि के समस्त कार्य द्रव्वों की उत्पत्ति महाभूत से हुई है ।। अतः शरीर को धारण करने वाली धातुएँ भी पंच महाभूत से उत्पन्न होने के कारण अन्य द्रव्यों की भाँति भौतिक कहलाती है ।।

महाभूत के जो स्थूल गुण व कर्म होते हैं वे ही गुण कर्म धातुओं में भी संक्रमित होते हैं ।। इससे धातुओं का पंच भौतिकता स्वयंसिद्ध है ।।

१. रस धातु
सातों ही धातुओं में रस की गणना सबसे पहले की गई है, इस दृष्टि से यह सभी धातुओं में महत्त्वपूर्ण व अग्रणी माना जाता है ।। इसका एक कारण है कि रस के द्वारा ही समस्त धातुओं का पोषण होता है ।।
रस समस्त धातुओं के पोषण का माध्यम है ।। इसके अतिरिक्त शरीर को धारण करना तथा जीवन पर्यन्त शरीर का यापन करना ये दो इसके मुख्य कार्य हैं ।। इसके अतिरिक्त रस के माध्यम से ही सम्पूर्ण शरीर में रक्त का परिभ्रमण होता है ।।

''तत्र रस गतौ धातुः अहरहगछतीति रसः ।''
अर्थात् रस गत्यर्थक धातु में प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द है, जिसके अनुसार जो प्रतिक्षण अहः चलता रहता है, उसे रस कहते हैं
।।
अर्थात् पंचभौतिक, चतुर्विध, षडरसयुक्त दो प्रकार के अथवा आठ प्रकार के वीर्य वाले, अनेक गुण युक्त भलीभाँति परिणाम को प्राप्त हुए आहार का जो तेजोभूत सार भाग अत्यन्त सूक्ष्म होता है- वह रस कहलाता है ।।

विण्मूत्र आहारमले सारः प्रागीरितो रसः ।।
सः तु व्यानेन विक्षिप्तः सर्वान् धातूना प्रतपर्येत् ॥
अर्थात् पुरीष और मूत्र ये दोनों आहार के मल हैं और आहार का सार भाग रस कहलाता है । वह व्यान वायु के द्वारा सम्पूर्ण शरीर में भ्रमित होता है और सर्व शरीर में भ्रमण करता हुआ वह सभी धातुओं का तर्पण करता है ।।

शरीर में रस का परिमाण-
प्रत्येक मनुष्य का शरीर भिन्न- भिन्न आकार- प्रकार और भिन्न- भिन्न परिमाण वाला होता है ।। प्रत्येक मनुष्य की जठराग्नि और जरण शक्ति में भी भिन्नता पाई जाती है, अतः निश्चित रूप से कह सकना असम्भव है कि प्रत्येक शरीर में रस धातु का कितना प्रमाण है ।। रस धातु का निर्माण मुख्य रूप से उस आहार रस के द्वारा होता है, जो जठाराग्नि के द्वारा परिपक्व हुए आहार का परिणाम होता है ।।
परन्तु आयुर्वेदीय आचार्यों के द्वारा निरूपित मतानुसार रस का परिमाण प्रत्येक मनुष्य की अपनी अंजलि में नौ अंजलि होता है ।।

रस का मुख्य कर्म धारण करने के अलावा अवयवों को पोषण तत्त्व प्रदान करना है ।। मूल धातु होने के कारण शरीर के लिए आधारभूत है ।।

२. रक्त धातु
जिस प्रकार शरीर में समस्त धातुओं का मूल- रस धातु है, उसी प्रकार शरीर का मूल रक्त धातु है ।। आयुर्वेद के अनुसार रस का परिणाम ही रक्त है ।। रस धातु के सूक्ष्म भाग पर रक्त धात्वाग्नि की क्रिया के परिणाम स्वरूप ही रक्त का निर्माण होता है ।।

-रक्त धातु उष्ण और पित्त गुण प्रधान होता है ।। रक्त धातु का मल पित्त होता है ।।

देहस्थ रुधिर मूलं रुधिरेणेव धार्यते,
तस्माद्यप्नेन रक्तं जीव इति स्थिति ।( सुश्रुत)

अर्थात्- रक्त ही शरीर का मूल है और रक्त के द्वारा ही शरीर का धारण किया जाता है, इसलिए इस रक्त की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि रक्त ही प्राण होता है ।।

यद्यपि रक्त पित्तदोष एवं तेजो महाभूत प्रधान है, तथापि इसके भौतिक संगठन में पाँचों महाभूत के गुणों का संयोग रहता है ।। यथा-
विस्रता द्रवता रागः लघुता स्पन्दनं तथा ।।
भूम्यादीनां गुणा ह्येते दृश्यन्ते चात्रशोणिते ।।
अर्थात्- विस्रगन्धता, द्रवता, अरुणता, लघुता और स्पन्दन ये गुण क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, आकाश और वायु के रक्त में दिखाई पड़ते हैं ।।

रक्त का स्वरूप-
आयुवेर्द मतानुसार रक्त का वर्ण- तपाये हुए स्वर्ण, वीरबहूटी (लाल वर्ण का एक छोटा कृमि, वर्षा ऋतु में जो घास में होता है), रक्त कमल, गुंजाफल के समान, लाल वर्ण का विशुद्ध रक्त होता है ।

तपनीयेन्द्रगोपाभं पद्मालक्तसंतिभम्
गुञ्जाफल सवर्णं च विशुद्ध विद्वि शोणितम् (च. सू. २४/२२)
शुद्ध रक्त का वर्ण लाल होता है, जो समप्रकृति पुरुषों में होता है ।

स्वाभाविक रूप से रक्त में पिच्छिलता और सान्द्रता गुण होने के कारण वह एकदम पतला नहीं होता है, अपितु कुछ गाढ़ापन लिये होता है ।


रक्त का परिमाण-
''अष्टौ शोणितस्य'' (च. शा. ७/१५)
अपने हाथ की आठ अंजली प्रमाण होता है । जिसकी उत्पत्ति आयुवेर्द मत से यकृत, प्लीहा और आमाशय में कही गई है ।

रक्त के कार्य-
रक्तं वर्ण प्रसादं मांसपुष्टि जीवयति च (सु. सू. १५.५)
अर्थात् रक्त धातु वर्ण की प्रसन्नता या निमर्लता, अग्रिम मांसधातु की पुष्टि और शरीर को जीवित रखता है । इस प्रकार मुख्य तीन कार्य होते हैं, परन्तु सभी धातुओं का क्षय और वृद्धि होना रक्त के अधीन है

यथा-
तेषां (धातुनां) क्षयवृद्धौशोणितनिमित्ते ।

३. मांस धातु
शरीर में सबसे अधिक अंश मांस धातु का होता है और यह शरीर की स्थिरता, दृढ़ता और स्थिति के लिए महत्त्वपूर्ण होता है । मांस धातु के द्वारा शरीर के आकार निर्माण में सहायता प्राप्त होती है । शरीर का गठन, पुष्टता और सुविभक्त गात्रता मांस धातु के द्वारा ही होती है । मांस धातु अस्थियों को भी आधार प्रदान करता है ।

मांसपेशी के अभाव में अस्थि अथवा अस्थि संधि क्रियाशील नहीं हो सकती । अतः सभी सचल सन्धियों को क्रियाशीलता प्रदान करना मांसपेशियों के ही अधीन है । इसके अतिरिक्त अवयवों का निमार्ण मांसपेशियों के द्वारा ही होता है ।

शरीर के कुल भार का ४१ % मांस धातु है- इसमें २१% प्रोटीन तथा ५% जल होता है । यह पेशियों का उपादान धातु है । यह लोहित तंतुमय होता है तथा जोंक के शरीर की तरह सकुंचन प्रसरणशील होता है ।

पेशीनामुपादान धातुर्मृदुलोहित तन्तुमयो
जलौक शरीरवत् संकोचप्रसरण शीलः । (प्र.शा. अ. २)

मांसधातु का परिमाण-

शरीर में मांस धातु का परिमाण अन्य धातुओं की अपेक्षा सबसे अधिक होता है । आयुवेर्द में इसका निश्चित प्रमाण नहीं मिला; परन्तु आधुनिक मतानुसार सम्पूर्ण शरीर के भार का ४१ % भाग मांस का होता है ।

मांस धातु का भौतिक संगठन-
शरीर में मांस धातु का आधार मांसपेशी निरुपित किया गया है । यह एक पांचभौतिक द्रव्य है और विभिन्न महाभूतों के गुण इसमें पाये जाते हैं । यही कारण है कि पाँच भौतिक आहार के द्वारा उसका पोषण और वृद्धि होती है; तथापि सबसे अधिक पृथ्वी और जल महाभूतों का अंश मांस में पाया जाता है । मांस सवोर्त्तम मांसवद्धर्क होता है-

१. मांसमात्यायते मांसेन(च.शा.६/१०)
२. शरीरवृहणे नान्पत खाद्यं मांसाद्विशिष्यते (च.सू. २७/२८)
३. शुष्यतां क्षीणमांसनां कल्पितानि विधानवित् दद्यात्मांसादमांसनि वृहणानि विशेषतः (चि.चि. ९/४९)

मांस धात्वाग्नि की रक्त धातु के अणु भाग पर क्रिया होने के पश्चात् मांस धातु का निमार्ण होता है । मांस धात्वाग्नि की क्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ मांस धातु तीन भागों में विभक्त होता है । अणु, स्थूल और मल भाग- इसमें स्थूल भाग के द्वारा मांस धातु का पोषण होता है ।

मांस धातु के कार्य-
मांस का कार्य चेष्टा करना है-
''मांसं शरीर पुष्टिं मेदसश्च ।'' (पुष्टिं करोति) (सु.सु. १५/५)

शरीर की विभिन्न क्रियाओं का संचालन यथा चलना- फिरना, उठना-बैठना आदि सभी कार्य मांस धातु के संकोच एवं प्रसरण के कारण ही सम्पन्न होते हैं । बिना मांस धातु के चल कार्य नहीं हो सकता ।

४. मेदधातु
मांस धातु के पोषण अंश या अणु भाग से मेद धातु की उत्पत्ति होती है । उस अंश पर मेदोधात्वाग्नि की क्रिया के परिणामस्वरूप जो अणु, स्थूल और मल इन तीन भागों का विभाजन होता है उसमें स्थूल भाग मेद धातु का पोषक होता है और वही मेद धातु की उत्पत्ति करने वाला होता है ।

मेद सान्द्र (घना) घी की तरह होता है और शरीर का स्नेह धातु है । मेद का अधिकांश स्थूलास्थियों (नलकास्थियों) में मज्जा नामक होता है । त्वचा के नीचे और मांस धरा कला के ऊपर मेदोधरा कला होती है । उदर में विशेष रूप से मेद का संग्रह होता है ।

सान्द्रसपस्तुल्यः स्नेहधातुः शरीरस्थ, तस्य स्थानमुदरान्तः त्वचामधश्च (प्र.शा.प्र.ख.अ. २)

मेद धातु का परिमाण के सम्बन्ध में कहीं विशेष विवरण नहीं है, क्योंकि भिन्न-भिन्न शरीर की भिन्न-भिन्न आकृति और प्रकृति होने के कारण मेदो धातु का परिमाण भी अलग-अलग होता है । अतः शारीरिक भिन्नता के कारण मेद धातु की निश्चित मात्रा बताना सम्भव नहीं है ।

मेद धातु के कार्य- मेद शरीर में स्नेह एवं स्वेद उत्पन्न करता है, शरीर को दृढ़ता प्रदान करता है तथा शरीर की अस्थियों को पुष्ट करता है । मेद का कार्य शरीर में स्नेह को उत्पन्न कर सम्पूर्ण अंगों को स्निग्धता प्रदान करना है ।

''मेदः स्नेहस्वेदौ दृढ़त्वं पुष्टिमस्थ्नां च''(सु.सु. १५/५)

धातुओं के सामान्य कार्य के अनुसार शरीर धारण के अतिरिक्त पोषण कार्य भी मेद करता है । मेद स्वभावतः स्नेह प्रधान होने के कारण शरीर तथा विभिन्न अवयवों का पोषण करता है ।
मेदो धातु में स्थित स्नेहांश सन्धियों के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि वह स्नेहांश ही सन्धियों को संशलिष्ट रखता है और सन्धियों में स्थित शैष्मिक कला के निमार्ण में सहायक होता है । जो हमारी सन्धियों को यथाशक्य स्नेहन कर गति प्रदान करने में सहायक बना रहता है ।

५. अस्थि धातु
शरीर की स्थिति एवं स्थिरता अस्थि संस्थान पर अवलम्बित है । अस्थि पंजर ही शरीर का सुदृढ़, ढाँचा तैयार करता है । जिससे मानव आकृति का निमार्ण होता है । शरीर में यदि अस्थियाँ न हों तो सम्पूर्ण शरीर एक लचीला मांस पिण्ड बनकर ही रह जायेगा, शरीर को अस्थियों के द्वारा ही दृढ़ता और आधार प्राप्त होता है ।

अस्थि में पृथ्वी, आकाश एवं वायु महाभूत की अधिकता होती है । अस्थि में स्थूलता और उसमें प्रतीत होने वाली गंध पृथ्वी महाभूत की स्थिति को बतलाती है । लघुता और सुषिरता आकाश महाभूत तथा रुक्षता वायु महाभूत के कारण होती है-

आकार विशेषतः तेजस महाभूत के कारण होता है । अस्थियाँ स्थिर, कठिन एवं शरीर की अवलम्बक धातु है जो मांसपेशियाँ स्नायुयों द्वारा अस्थियों पर निबद्ध होती है, जिनके समागम स्थल को सन्धि कहते हैं ।

ये संधियाँ दो प्रकार की होती हैं- चल सन्धि और स्थिर सन्धि शाखाओं हनु, कटि, ग्रीवा में चल तथा स्थिर सन्धियाँ होती हैं ।

अस्थिनि नाम स्थिर कठिनावलम्बनोधातुः
कायस्य यमाश्रित्य समग्रं शरीरमवतिष्ठते(प्र.शा.ख. अ. २)

अस्थियों का ही सजातीय रूप तरुणास्थि है । स्थिति स्थापक और नम्र-लचीली होती हुई भी यह सुदृढ़ होती है-

ये प्रायः समस्त अस्थियों का पूवर्रूप होती है- क्लोम तथा कण्ठ (स्वरयंत्र) तरुणास्थि से ही बने होते हैं ।
पर्शुकाओं का उरः फलक से संधान तरुणास्थि से ही होता है । नासिका का अग्रभाग, कणर्शष्कुली तथा अधिजिह्विका तरुणास्थि से ही बने होते हैं । अस्थियों के सिरे तरुणास्थियों से ही बने होते हैं ।

अस्थियों के कार्य- मूल रूप से दो ही कार्य हैं- देह को धारण करना और मज्जा की पुष्टि करना । शरीर को आधार प्रदान करना और अपने सामान्तर अवयव को पुष्टि करना । शरीर के विभिन्न भागों में स्थित मृदु और आघात असहिष्णु अवयवों की रक्षा करना है ।

मस्तिष्क, हृदय और फुफ्फुस की रक्षा का दायित्व मुख्य रूप से अस्थियों पर ही निभर्र है ।

६ मज्जा धातु
मज्जा धातु मुख्य रूप से स्नेहांश प्रधान द्रवरूप में होता है । यह कुछ पीलापन लिए हुए होता है । यह धातु विशेष रूप से बड़ी अस्थियों में उनके मध्य में पाया जाता है । छोटी अस्थियों में पाई जाने वाली मज्जा का वर्ण कुछ रक्ताभ लिये हुए होता है ।

अस्थि धातु के अणु भाग से मज्जा धातु की उत्पत्ति होती है । इसमें स्नेहांश और द्रवांश की अधिकता के कारण जल महाभूत की अधिकता लक्षित होती है ।

मज्जा के कर्म- शरीर में त्वचा की स्निग्धता मज्जा धातु के ही अधीन है । शरीर में बल उत्पन्न करने का महत्त्वपूर्ण कार्य मज्जा के द्वारा सम्पन्न होता है । मज्जा का अग्रिम धातु शुक्र होती है, अतः उसकी पुष्टि करना भी मज्जा का ही कार्य है । शुक्र की पुष्टि करना, अस्थियों के सुषिर भाग की पूरण करना आदि मज्जा के प्रमुख कार्य हैं ।

यह विशेष रूप से शुक्र धातु का पोषण, शरीर का स्नेहन तथा शरीर में बल सम्पादन का कार्य करता है । मज्जा शरीर के विभिन्न अवयवों को पोषण प्रदान करती है, यह पोषण का कार्य मुख्य रूप से इसके स्नेहांश के द्वारा किया जाता है ।

मज्जा के कारण शरीर और अस्थि दोनों को बल प्राप्त होता है । इस प्रकार यह स्वयं तथा अस्थियों के माध्यम से शरीर को धारण करती है ।

७. शुक्र धातु
शरीर में ऐसा कोई स्थान विशेष नियत नहीं है जहाँ शुक्र विशेष रूप से विद्यमान रहता हो । शुक्र सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है तथा शरीर को बल प्रदान करता है । इसके लिए कहा गया है, जिस प्रकार दूध में घी और गन्ने में गुड़ व्याप्त रहता है, उसी प्रकार शरीर में शुक्र व्याप्त रहता है । महर्षि चरक के अनुसार शुक्र का आधार मनुष्य का ज्ञानवान शरीर है ।

शुक्र का स्वरूप-
स्फटिकामं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धिच ।
शुक्रमिच्छन्ति केचित्तुु तेलक्षौद्रनिमं तथा॥ (सुश्रुत)

स्फटिक के समान श्वेत वर्ण वाला द्रव स्निग्ध, मधुर और मधु के समान गन्धवाला शुक्र होता है । कुछ विद्वानों के अनुसार तैल या मधु के समान शुक्र होता है ।

शुक्र की उत्पत्ति मज्जा धातु के अणु भाग पर शुक्र धात्वाग्नि की क्रिया के परिणाम स्वरूप होता है । शुक्र की उत्पत्ति का कार्य दोनों वृषण करते हैं । शुक्र सवर्शरीस्थ है । जिस प्रकार ईख में रस, दूध या दही में घी या तिल में तेल अदृश्य रूप में सर्वांश में ओत-प्रोत होता है वैसे ही शुक्र मनुष्य के सर्वांग में व्याप्त होता है । यथा-यथा पयसि सपस्तु गूढ़श्चेक्षौ रसो यथा

शरीरेषु तथा शुक्र नृणां विद्यद्भिषग्वरः(सु.शा. ४/२१)
रस इक्षौ यथा दहिन सपस्तैलं तिले यथा ।
सवर्त्रानुगतं देहे शुक्रं संस्पशर्ने तथा॥(च. चि. ४/४६)

शुक्र के कार्य- धैर्य- अथार्त् सुख, दुःखादि से विचलित न होना, शूरता, निभर्यता, शरीर में बल उत्साह, पुष्टि, गभोर्त्पत्ति के लिए बीज प्रदान तथा शरीर को धारण करना, इन्द्रिय हर्ष, उत्तेजना, प्रसन्नता आदि कार्य शुक्र के द्वारा होते हैं । इस प्रकार शुक्र धातु शरीर के साथ-साथ मन के लिए भी महत्त्वपूर्ण है । इन सबके अतिरिक्त सबसे मुख्य कार्य सन्तानोत्पत्ति है ।



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