गुरु गोविन्द सिंह और रघु (Kahani)

February 1996

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गुरुगोविन्द सिंह निविड़ वन में बैठे एकान्त चिंतन में लीन थे। उनके मन में देश, समाज, संस्कृति के उत्थान और कल्याण के लिए विचारो की लहरे उठ रही थी। उनका प्रवाह नीचे वेगवती यमुना के प्रवाह से तेज था।

तभी गुरु ने देखा यमुना को पार कर उनका शिष्य उनकी ओर आ रहा है। निकट आने पर उसे पहचाना - उस शिष्य का नाम था रघुनाथ। काफी सम्पन्न और ऐश्वर्यशाली । उसे अपनी धन सम्पदा का भी अभिमान था। वह निकट आकर गुरु के पास बैठ गया। गुरु ने कहा - आओ रघु कैसे आये हो ?

रघुनाथ ने गुरु के चरणों में विनम्र प्रणाम किया और बोला - सुना था आप हम भक्तों को छोड़कर एकान्त वन में जा रहे है। सोचा आप का कुशल क्षेम पूछ आऊँ।

मेरी कुशल क्या जानना है रे रघु - गुरु ने बड़ी आत्मीयता से संबोधित करते हुए कहा- ‘कुशल तो मेरे उन बन्दों को पूछ जाकर, जो अपना सारा समय और समर्थ ग्रंथ साहिब का संदेश सुनकर जन चेतना को जाग्रत करने लगे है। इस कार्य में उन्हें मेरे से अधिक कष्ट कठिनाइयाँ सहन करनी पड़ रही है।

रघु ने उन्हें देखा और तुरंत कहा- ओ गुरु जी आप इन सूखे टुकड़ों पर अपना जीवन निर्वाह कर रहे है।

सूखे टुकड़े नहीं यह प्रेम का पकवान है। गुरु जी बोले इन्हें एक भाई दे दिया गया।

तो मैं भी उनकी सेवा में एक तुच्छ भेट अर्पित करता हूँ- रघु ने कहा उनसे अपने दो हाथों के हीरे जड़े कड़े उतारे और गुरु के समस्त रख दिये। फिर इन्हें स्वीकार की जिए।

रघु यह कहकर गर्व से देखने लगा। गुरु ने उसके चेहरे पर आते जाते भावों को देखा और कड़ों को एक ओर उपेक्षित झाड़ी में फेंक दिया।

गुरु पुनः चिंतन में लीन हो गये रघु ने सोचा गुरु कम मिलने के कारण उदास है।उसने कहा अभी मेरे पास बहुत संपत्ति है। इसे मैं आपको इच्छानुसार दे सकता हूँ। गुरु बोले मुझे संपत्ति की नहीं बन्दों की जरूरत है। जो पूर्णतया समर्पित होकर समाज के उत्थान में जुट सके ।

लेकिन संपत्ति से अनेकों व्यक्ति प्राप्त किये जा सकते हैं रघु का स्वर उभरा । गुरु ने उसे असमंजस से उबारते हुए कहा, मुझे नौकर नहीं देश, समाज संस्कृति के प्रति पूर्णतया समर्पित व्यक्ति चाहिए जो समाज विपत्तियों, परेशानियों, कठिनाइयों के बीच से अविचलित रह कर अपने साथ हेतु जुट रह सके। संपत्ति तो चोर भी दे सकते हैं लेकिन मुझे भाव पूर्ण व्यक्ति चाहिए।

रघुनाथ को यथार्थता का बोध हुआ। वह गुरु के चरणों में गिर पड़ा और बोला मुझे भ्रम से उबार लिया- आज से अपनी समूची जिन्दगी आपके चरणों में निवाहित करता हूँ। अतः इसका निःसंकोच उसी प्रकार उपयोग कर सकता है जैसे अपने हाथ के हथियारों का करते हैं।

गुरु गोविन्द सिंह ने उसे हृदय से लगाते हुए कहा अब तुमने समय की आवश्यकता को समझा हैं, सेवा का आधार, धन का मद नहीं, अपितु हृदय की उदात्त भावनाओं का पूर्णतया समर्पण एवं तद्नुरूप किया।


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