गौ संरक्षण एवं संवर्द्धन एक राष्‍ट्रीय कर्तव्‍य

गौपालन हमारी अर्थ नीति का अंग बने

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विश्व में अभी तक विज्ञान द्वारा कोई ऐसा विकल्प नहीं विकसित किया जा सका, जो आहार के रूप में अमृत तुल्य सभी पौष्टिक गुणों से परिपूर्ण गौ-दुग्ध के समतुल्य हो। भारतीयों ने गाय के महत्व को विज्ञान और अर्थशास्त्र की दृष्टि से हजारों वर्ष पूर्व ही परख लिया था। इसीलिए गाय को भारतीय संस्कृति में मां का स्थान प्राप्त है। वर्तमान भारतीय गायों की दयनीय दशा पर खेद व्यक्त करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था—‘‘गौ-हत्या जब तक होती है तब तक मुझे लगता है कि मेरी खुद की हत्या की जा रही है। आज तो गाय मृत्यु के किनारे खड़ी है और मुझे विश्वास नहीं है कि हमारे प्रयास इसे बचा सकेंगे। लेकिन यदि यह नष्ट हो गई तो हम भी यानी हमारी सभ्यता भी नष्ट हो जाएगी। मेरा तात्पर्य हमारी अहिंसा प्रधान ग्रामीण संस्कृति से है।’’ 
महात्मा गांधी ने गौरक्षा के कार्य की जांच करते समय इसके आर्थिक पहलू पर भी विचार किया था। इनका कहना था—‘‘अगर गौरक्षा विशुद्धतः धन की विरोधी मानी जाती है तो हमें अर्थ नीति को ही आमूल चूल बदलना होगा। गौरक्षा अनिवार्य है, अर्थनीति को उसके अनुरूप बनाया जा सकता है।’’ 
गाय के आर्थिक महत्व पर विचार किया जाय तो हम देखेंगे कि हमारी समस्त कृषि का आधार गौ वंश ही है। सड़क परिवहन का एक बड़ा भाग आज भी बैलगाड़ी पर निर्भर है। देहाती ईंधन का अधिकांश भाग तथा शहरी ईंधन का लगभग 20 प्रतिशत भाग गोबर का होता है। गौ-दुग्ध में समस्त पोषक तत्व पाए जाते हैं। हरिजनों, पिछड़े वर्ग के लोगों और वनवासियों की आय का साधन भी गौ-वंश है। गाय से प्राप्त ऊर्जा पर्यावरण प्रदूषण फैलाने की जगह उसे रोकती है तथा दुग्ध पाउडर व रासायनिक खादों के रूप में देश से बाहर जाने वाली देशी मुद्रा की बचत करती है। 
कृषि कार्यों में यदि हम बैलों की जगह ट्रैक्टरों का उपयोग करें तो 1 करोड़ 30 लाख ट्रैक्टरों की हमें आवश्यकता होगी जिसका मूल्य कई हजार करोड़ रुपये होगा। इसमें से बहुत बड़ा भाग विदेशी मुद्रा के रूप में हमें विदेश भेजना पड़ेगा। उसके बाद उसके चलाने में हमें प्रतिवर्ष अरबों रुपयों का डीजल विदेशों से मंगाना पड़ेगा, सो अलग। बैल भूसा खाकर गोबर करते हैं, जिससे ईंधन व खाद प्राप्त होती है जबकि ट्रैक्टरों से निकली कार्बनडाई ऑक्साइड प्रदूषण का खतरा बढ़ाती है। 
उन स्थानों में सड़क परिवहन का 80-90 प्रतिशत भाग बैलों से ढोया जाता है, जहां पर ट्रक या रेलों की व्यवस्था करना असंभव है अथवा आर्थिक दृष्टि से महंगी है। बूढ़े गाय-बैल जिन्हें हम अनुपयोगी मानते हैं उनके गोबर से ही हमें पूरा लाभ मिल जाता है। मिट्टी का तेल खाना बनाने में लगाया जाय एवं मात्र 2 व्यक्तियों के परिवार में ही आधा लीटर प्रतिदिन भी लगाया जाय तो लगभग 400 रुपये विदेशी मुद्रा के रूप में गये जबकि मात्र एक बूढ़ी गाय या बैल के गोबर से 3 से 5 व्यक्तियों के परिवार का भोजन पकाने की ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है, खर्च के नाम पर मात्र भूसा, घास या रूखी-सूखी पत्ती ही पर्याप्त होंगी। 
आज पाश्चात्य राष्ट्रों में 1-2 किलो तक प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दुग्ध की खपत है जबकि भारत वर्ष में मात्र 100 ग्राम तक प्रति व्यक्ति के हिस्से में दूध नहीं आता जबकि स्वस्थ शरीर के लिए लगभग 300 ग्राम दुग्ध प्रतिदिन अनिवार्य है। इस कमी की पूर्ति हम विदेशों से दुग्ध पाउडर मंगाकर या कृत्रिम खाद्य पदार्थ बनाकर करते हैं। 1950 ई. में 3 करोड़ रुपये का दुग्ध पाउडर आयात किया गया जबकि 1972 में यह बढ़कर 12 करोड़ रुपये वार्षिक हो गया। इस प्रकार दिन प्रतिदिन बढ़ती दूध की मांग की आपूर्ति गौ संरक्षण द्वारा ही संभव है। हमारे यहां प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता का पिछला रिकार्ड निम्न प्रकार है—1950 में प्रति व्यक्ति 150 ग्राम थी जो 1960 में 125 ग्राम ही रह गई तथा 1971 में यह घटकर मात्र 100 ग्राम ही रह गई। 1981 के आंकड़ों के अनुसार प्रति व्यक्ति औसत दुग्ध 122 ग्राम रहा, 1991 तक 150 ग्राम का लक्ष्य रखा गया है, जो कि बहुत कम है। हमारे देश में दुधारू पशुओं का औसत दूध प्रति वर्ष मात्र 750 किलोग्राम वार्षिक प्रति दुधारू पशु पड़ता है जबकि सारे विश्व का दुग्ध उत्पादन 2000 किलो ग्राम वार्षिक प्रति दुधारू पशु है। विकसित राष्ट्रों में यह औसत 5000 किलो ग्राम प्रति दुधारू पशु पड़ता है। इस पर भी हमारे देश में गायों की अपेक्षा भैंस में दूध की मात्रा ज्यादा पाई जाती है जबकि विदेशों में गायों में दूध ज्यादा होता है। हमारे देश में सबसे ज्यादा दुधारू पशु उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र में हैं। किन्तु प्रति दुधारू पशु औसत सबसे ज्यादा मणिपुर में 4.40 किलो लीटर पंजाब में 4.15 लीटर, त्रिपुरा में 3.75 लीटर एवं हरियाणा में 3.45 लीटर है। कहा जाता है कि दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने हेतु विदेशों से आयातित सांड़ों द्वारा शंकर वर्ण की बछिया से दूध की मात्रा ज्यादा ली जा सकती है। किन्तु इसके पीछे सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इस नस्ल के बैल भारतीय कृषि हेतु पूर्णतया अयोग्य सिद्ध हुए हैं। अस्तु दुग्ध का व्यापारिक उत्पादन करने वाले पूंजीपति अथवा डेरियां तो इनका उपयोग कर सकते हैं। भारतीय कृषक इस शंकर जाति के प्रजनन से अपनी कृषि के लिए बैलों को तरसने लगेगा। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हमारे ही देश में साहीवाल, सिंधी व हरियाणा नस्ल के सांड़ों को तैयार कर उनसे ही गायों का गर्भाधान कराया जाय जिससे दुग्ध व कृषि दोनों की आवश्यकता पूर्ति हो सके। 
भारत में जितने पशु हैं, बिजली घरों से अधिक ऊर्जा प्रदान करने की क्षमता रखते हैं। बिजली घरों की कुल क्षमता मात्र 2 हजार मेगावाट प्रतिदिन है जबकि पशुओं से प्राप्त ऊर्जा उससे बहुत अधिक है। पशुओं को हटाने से हमें मात्र विद्युत उत्पादन के लिए 300 खरब रुपये खर्च करने पड़ेंगे। किसानों को सस्ती खाद व ईंधन की आपूर्ति की समस्या अलग से खड़ी हो जाएगी। 
एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि एक बूढ़ी गाय पर भूसा-घास का वार्षिक खर्च मात्र 150-200 रुपये बैठता है जबकि उससे प्राप्ति हमें 300-500 रुपये के बीच होती है। अतः बूढ़े पशु किसी भी दृष्टि से भी अनार्थिक नहीं होते। 
आज अपने राष्ट्र के पशु भरपेट भोजन को तरसते हैं। दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के लिए जितना जोर दबाव विदेशी सांड़ों से शंकर जाति की बछिया पैदा कराने में दिया जाता है यदि उतना प्रयास यहीं के पशुओं को पर्याप्त चारा देने के लिए ही किया जाय तो दो गुना दुग्ध उत्पादन तो बड़ी ही आसानी से बढ़ाया जा सकता है। एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में पाया गया कि 1 गाय के मांस से मात्र 80 व्यक्ति ही भोजन एक बार कर सकते हैं जबकि उसका पालन कर उससे 25740 व्यक्तियों को 1 बार भोजन दिया जा सकता है। एक गाय अपनी पीढ़ी में कम से कम 12 बछिया या 12 बछड़े जनती है इसे मात्र 6 ही माना जाय तो उससे अन्नोत्पादन के साथ-साथ दूध का भी उत्पादन बढ़ेगा। बढ़ती आबादी के स्वास्थ्य संरक्षण हेतु गौ दुग्ध का उत्पादन बढ़ाना अनिवार्य है। गायों से प्राप्त गोबर की जीवाणु वाली खाद रासायनिक खादों की अपेक्षा कृषि को 5 गुना ज्यादा लाभ पहुंचाती है और इससे भूमि भी खराब नहीं होती जबकि रासायनिक खादों के लगातार प्रयोग से भूमि क्षारीय होती जाती है और उसके ऊसर होने की संभावना बढ़ जाती है। 
हर दृष्टि से देखा जाय तो हमारी परिस्थितियां ग्रामीण अर्थशास्त्र को बल देने की ओर ही इंगित करती हैं। औद्योगीकरण एक सीमा तक हो तो ठीक भी है एवं कुछ हद तक अनिवार्य भी, पर प्रगति की दौड़ इतनी अन्धी न हो कि अर्थ नीति के प्राण हमारे राष्ट्र के गौधन की उपेक्षा कर सुनियोजित ढंग से उसके विनाश का क्रम चलाया जाता रहे। परन्तु दुर्भाग्य से हो यही रहा है। आशा की जानी चाहिए कि सत्ताधीशों को समय रहते समझ आएगी व वे पुनः ग्रामीण संस्कृति को पोषण देने वाली अर्थ नीति को बढ़ावा देंगे। 

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