स्वाध्याय और सत्संग

स्वाध्याय और सत्संग

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गायत्री का बाईसवाँ अक्षर 'चो' सत्संग और स्वाध्याय के लाभों को बतलाता है-
चोदयत्येव सत्संगो धियमस्य फलं महत । स्वमतो सज्जै विद्वान् कुर्यात पर्यावृतं सदा ।।

अर्थात-'सत्संग से बृद्धि का विकास होता है इसलिये सदैव सत्पुरुषों का संग करे । सत्संग का फल महान् है ।'

मनुष्य के मस्तिष्क पर वातावरण, स्थान, परिस्थिति और व्यक्तियों का निश्चित रुप से भारी प्रभाव पडता है । जो लोग अच्छाई की दिशा में अपनी उन्नति करना चाहते हैं उन्हें उचित है कि अपने को अच्छे वातावरण में रखें, अच्छे लोगों को अपना मित्र बनावें उन्हीं से अपना व्यापार व्यवहार और सम्बन्ध रखें । जहाँ तक सम्भव हो परामर्श उपदेश और मार्ग-प्रदर्शन भी उन्हीं से प्राप्त करें ।

यथासाध्य अच्छे व्यक्तियों का सम्पर्क बढ़ाने के अतिरिक्त अच्छी पुस्तकों का स्वाध्याय भी ऐसा ही उपयोगी है । जिन जीवित या स्वर्गीय महापुरुषों से प्रत्यक्ष सत्संग सम्भव नहीं उनकी पुस्तकें पढ़कर सत्संग का लाभ उठाया जा सकता है । एकान्त में स्वयं भी अच्छे विचारों का चिन्तन और मनन करके तथा अपने मस्तिष्क को उसी दिशा में लगाये रहने से भी आत्म-सत्संग होता है । ये सभी प्रकार के सत्संग आत्मोन्नति के लिये आवश्यक हैं ।

शरीर, वस्त्र, मकान, वर्तन आदि की सफाई नित्य करनी पडती है, क्योंकि नित्य ही उन पर मैल जमता रहता है । इसी प्रकार मन पर भी संसार के बुरे वातावरण का मैल और कुप्रभाव निरंतर पड़ता रहता है, उसकी सफाई के लिये सत्संग और स्वाध्याय की बुहारी लगाने को शास्त्रों में नित्यकर्म बताया गया है । 'शतपथ ब्राह्मण में कहा है कि जिस दिन भी स्वाध्याय न किया जाया उसी दिन मनुष्य की स्थिति शूद्र जैसी हो जाती है । इस नित्य-कर्म में मनुष्य को कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए ।

अच्छे विचारों के धारण करने से ही कुविचार दूर होते हैं । कटोरे में पानी भर देने से उसमें जो हवा पहले भरी हुई थी वह निकल जाती है । इसी प्रकार कुविचारों से सत्यानाशी शत्रुओं से पीछा छुड़ाना हो और परम कल्पाणकारी सद्विचारों को अपनाना हो तो यह आवश्यक है कि स्वाध्याय और सत्संग के लिये सदैव प्रयत्न करके अवसर निकालते रहें ।


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