मानसिक संतुलन

संतुलित जीवन की विघातक प्रवृत्तियाँ

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संतुलित जीवन के शत्रु हमारे आन्तरिक मनोविकार ही होते हैं । ये शत्रु हमारे मन के विभिन्न स्तरों में निवास करते हैं । और प्रत्येक व्यक्ति में थोड़ी बहुत मात्रा में विद्यमान रहते हैं । जो मनुष्य इनसे जितने अंशों में मुक्ति पा जाता है वह उतना ही सभ्य और सुसंस्कृत समझा जा सकता है । इसलिए मनुष्य का कर्तव्य है कि इन शत्रुओं-मन की कुप्रवृत्तियों को जहाँ तक संभव हो नियंत्रण में रखें ।

ये शत्रु हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, घृणा, द्वेष । इन दुर्गुणों को स्वच्छन्दता देने से मानसिक विष सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो जाता है, बुद्धि में तमोगुण का प्राचुर्य होता है । और मनुष्य भ्रम वश सत् असत् का विवेक नहीं कर पाता । इन शत्रुओं में कोई एक भी यदि बढ़ जाय तो सर्वनाश करने में पूर्ण समर्थ है । ये मानसिक विष यदि वहिर्गत न किये गये तो आयु पर्यन्त मनुष्य के साथ रहेंगे, सदा उसे आन्तरिक ज्वाला में दग्ध करते रहेंगे और न जाने कितनी बार जन्म मरण की मार्मिक पीड़ा देंगे । मनुष्य की नाना प्रवृत्तियों के नीचे ये विकार पाये जाते हैं । ये मानसिक विष प्राय: दुर्भावनाओं की जटिल ग्रंथियाँ बन जाते हैं, मस्तिष्क में संघर्ष उत्पन्न कर देते हैं और अनेक व्याधियों के रूप में प्रगट होते हैं ।

प्राय: इन मानसिक शत्रुओं से ग्रसित व्यक्ति को यह ज्ञान नहीं रहता कि वह उनके पंजे में है या नहीं । क्रोधी स्वयं नहीं जानता कि वह ईर्ष्या की मिट्टी में जल रहा है कभी नहीं समझता कि वीर्य नाश द्वारा वह अपने स्वास्थ्य आयु और शरीर को जर-जर बना रहा है। कंजूस माया के मोह में फँस कर विवेक बुद्धि को शून्य बना लेता है । कभी-कभी तमो गुण के अधिकार में रहने के कारण मनुष्य इन दुर्गुणों में ही सुख और संतोष की भावना करने लगता है । मनुष्य  भ्रम वश व्यक्ति से समाज से जाति और राष्ट्र से असूया, घृणा करने में अपनी प्रतिष्ठा कीं गणना होते देखता है । कामनाओं के पोषण करने का नाम प्रगति रखता है। अन्दर बसी हुई क्रोध की वृत्ति को तेज मानने लगता है मान का नाम आत्म सम्मान रखकर उसकी रक्षा करना अपना कर्तव्य समझने लगता  है । लोभ को अपनी उन्नति का साधन समझता है मोह का नाम प्रेम रखकर जीवन को बर्बाद कर देना आदर्श मानता है । इसलिए ये दुर्गुण ऐसे मनुष्यों में बढ़ते चले जाते हैं।

इन मानसिक शत्रुओं की पारस्परिक घनिष्ठता है, एक के आने पर दूसरा स्वयं आता है । एक दूसरे के लिए मैदान तैयार करता है । मोह से ईर्ष्या और डाह उत्पन्न होते हैं । द्वेष से बैर की सृष्टि होती है, क्रोध, भय और अभिमान उत्पन्न करता है । घृणा से द्वेष का दुर्भाव पैदा होता है । इन मनोविकारों का द्वन्द नाना विषयों के अनुसार अनेक रूपों में प्रकट होता है । विचार की मूल अनुभूति ही विषय भेद के अनुसार क्रोध, भय, घृणा, मद, लोभ, मोह, मात्सर्य आदि मनोविकारों का जटिल रूप धारण करती है ।' क्रोध पतन की ओर ढकेलता है क्रोध का संबंध मन के अन्य विकारों से घनिष्ठ है । क्रोध के वशीभूत होकर हमें उचित-अनुचित का विवेक नहीं रहता और हम हाथापाई कर बैठते हैं । बातों-बातों ही में उखड़ पड़ना, लड़ाई-झगड़ा करना साधारण सी बात है । यदि तुरंत क्रोध का प्रकाशन हो जाए, तब तो मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है, पर यदि वह अंत: प्रदेश में पहुँचकर एक भावना ग्रंथि बन जाए तो बड़ी दुःखदायी होती है । बहुत दिनों तक टिका हुआ क्रोध बैर कहलाता है । बैर एक ऐसी मानसिक बीमारी है, जिसका कुफल मनुष्य को दैनिक जीवन में भुगतना पड़ता है । वह अपने आप को संतुलित नहीं रख पाता, जिससे उसे बैर है, उसके उत्तम गुण, भलाई, पुराना प्रेम, उच्च संस्कार आदि सब विस्मृत कर बैठता है । स्थाई रूप से एक भावना ग्रंथि बन जाने से क्रोध का वेग तो धीमा पड़ जाता है, किंतु दूसरे व्यक्ति को सजा देने, नुकसान पहुँचाने या पीड़ित करने की कुत्सित भावना निरंतर मन को दग्ध किया करती है ।

बैर पुरानी जीर्ण मानसिक बीमारी है, क्रोध तात्कालिक और क्षणिक प्रमाद है । क्रोध में पागल होकर हम सोचने का समय नहीं देखते बैर उसके लिए बहुत समय लेता है । क्रोध में अस्थिरता, क्षणिकता, तत्कालीनता, बुद्धि का कुंठित हो जाना, उद्विग्नता, आत्मरक्षा, अहंकार की पुष्टि, असहिष्णुता, दूसरे को दंडित करने की भावनाएँ संयुक्त हैं ।

क्रोध मन को एक उत्तेजित और खिंची हुई स्थिति में रख देता है, जिसके परिणामस्वरूप मन दूषित विकारों से भर जाता है । क्रोध से प्रथम तो उद्वेग उत्पन्न होता है । मन एक गुप्त किंतु तीव्र पीड़ा से दग्ध होने लगता है । रक्त में गरमी आ जाती है और उसका प्रवाह बड़ा तेज हो जाता है । इस गरमी में मनुष्य के शुभ्र भाव, दया, प्रेम, सत्य, न्याय, विवेक, बुद्धि जल जाते हैं । क्रोध एक प्रकार का भूत है, जिसके सवार होते ही मनुष्य आपे में नहीं रहता । उस पर किसी दूसरी सत्ता का प्रभाव हों जाता है । मन की निंद्य वृत्तियों उस पर अपनी राक्षसी माया चढ़ा देती हैं, वह बेचारा इतना हतबुद्धि हो जाता है कि उसे यह ज्ञान नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है ? आधुनिक मनुष्य का आंतरिक जीवन और मानसिक अवस्था अत्यंत विक्षुब्ध है, दूसरों में वह अनिष्ट देखता है, उससे हानि होने की कुकल्पना में डूबा रहता है । जीवनपर्यन्त इधर-उधर लुढ़कता, ठुकराया जाता रहता है, शोक, दु:ख, चिंता, अविश्वास, उद्वेग, व्याकुलता आदि विकारों के वशीभूत होता रहता है । ये क्रोधजन्य मनोविकार अपना विष फैलाकर मनुष्य का जीवन विषैला बना रहे हैं । उसकी आध्यात्मिक शक्तियों का शोषण कर रहे हैं । साधना का सबसे बड़ा विघ्न क्रोध नाम का राक्षस ही है । क्रोध शांति भंग करने वाला मनोविकार है । एक बार क्रोध आते ही मन की अवस्था विचलित हो उठती है । श्वासोच्छवास तीव्र हो उठता है, हृदय विक्षुब्ध हो उठता है । यह अवस्था आत्मिक विकास के विपरीत है । आत्मिक उन्नति के लिए शांति, प्रसन्नता, प्रेम और सद्भाव चाहिए । जो व्यक्ति क्रोध के वश में है, वह एक ऐसे दैत्य के वश में है जो न जाने कब मनुष्य को पतन के मार्ग में धकेल दे । क्रोध तथा आवेश के विचार आत्मबल का ह्रास करते हैं । ईर्ष्या की आंतरिक अग्नि ईर्ष्या वह आंतरिक अग्नि है जो अंदर ही अंदर दूसरे की उन्नति या बढ़ती प्रगति देखकर हमें भस्मीभूत किया करती है । दूसरे की भलाई या सुख देखकर मन में जो एक प्रकार की पीड़ा का प्रादुर्भाव होता है, उसे ईर्ष्या कहते हैं । ईर्ष्या एक संकर मनोविकार है, जिसकी संप्राप्ति आलस्य, अभिमान और नैराश्य के संयोग या जोड़ से होती है । अपने आप को दूसरे से ऊँचा मानने की भावना अर्थात मनुष्य का "अहं" इसके साथ संयुक्त होता है ।

ईर्ष्या मनुष्य की हीनत्व भावना से संयुक्त है । अपनी हीनत्व भावना ग्रंथि के कारण हम किसी उद्देश्य या फल के लिए पूरा प्रयत्न तो कर नहीं पाते, उसकी उत्तेजित इच्छा करते रहते हैं । हम सोचते हैं- ''क्या करें हमारे पास अमुक वस्तु या चीज होती, हाय! वह चीज तो उसके पास है, हमारे पास नहीं, वह वस्तु यदि हमारे पास नहीं है तो उसके पास भी न रहे ।"  ईर्ष्या व्यक्तिगत होती है । इसमें मनुष्य दूसरे की बुराई, अपकर्ष, पतन, त्रुटि की भावनाएँ मन में लाता है । स्पर्द्धा ईर्ष्या की पहली मानसिक अवस्था है । स्पर्द्धा की अवस्था में किसी सुख, ऐश्वर्य, गुण या मान से किसी व्यक्ति विशेष को संपन्न देख, अपनी स्थिति पर दु :ख होता है, फिर उसकी प्राप्ति की एक प्रकार की उद्वेगपूर्ण इच्छा उत्पन्न होती है । स्पर्द्धा वह वेगपूर्ण इच्छा या उत्तेजना है जो दूसरे से अपने आप को बढ़ाने में हमें प्रेरणा देती है । स्पर्द्धा बुरी भावना नहीं, यह वस्तुगत है । इसमें हमें अपनी कमजोरियों पर दु:ख होता है । हम आगे बढ़कर अपनी निर्बलता को दूर करना चाहते हैं । स्पर्द्धा व्यक्ति विशेष से होती है, ईर्ष्या उन्हीं से होती है, जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि उन पर अवश्य पड़ेगी या पड़ती होगी । ईर्ष्या के संचार के लिए पात्र के अतिरिक्त समाज की भी आवश्यकता है । समाज में उच्च स्थिति- दूसरों के सम्मुख अपनी नाक ऊँची रखने के लिए ईर्ष्या का जन्म होता है । हमारे पास वह वस्तु न देखकर भी मनोविकार का संचार हो जाता है । ईर्ष्या में क्रोध का भाव किसी न किसी प्रकार मिश्रित रहता है, ईर्ष्या के लिए कहा भी जाता है, ''अमुक व्यक्ति ईर्ष्या से जल रहा है ।'' साहित्य में ईर्ष्या को संचारी रूप में समय-समय पर व्यक्त किया जाता है, पर क्रोध बिलकुल जड़ भाव है । जिसके प्रति हम क्रोध करते हैं, उसके मानसिक उद्देश्य पर ध्यान नहीं देते । असंपन्न ईर्ष्या वाला केवल अपने को नीचा समझे जाने से बचने के लिए आकुल रहता है । धनी व्यक्ति दूसरे को नीचा देखना चाहता है । ईर्ष्या दूसरे की संपन्नता की इच्छा की आपूर्ति से उत्पन्न होती है या ईर्ष्या तुलनात्मक रूप से दूसरे के संपन्न होने से उत्पन्न होती है । यह अभिमान को जन्म देगी, अहंकार की अभिवृद्धि करेगी और कुढ़न का ताना-बाना बुनेगी । अहंकार से आहत होकर हम दूसरे की भलाई न देख सकेंगे । अभिमान में मनुष्य को अपनी कमजोरियाँ नहीं दीखतीं । 

अभिमान का कारण अपने विषय में बहुत ऊँची मान्यता धारण कर लेना है । ईर्ष्या उसी की सहगामिनी है । ईर्ष्या द्वारा हम मन ही मन दूसरे की उन्नति देखकर मानसिक दु:ख का अनुभव किया करते हैं । अमुक मनुष्य ऊँचा उठता चला जा रहा है । हम यों ही पड़े हैं, उन्नति नहीं कर पा रहे हैं । फिर वह भी क्यों इस प्रकार उन्नति करे । उसका कुछ बुरा होना चाहिए, उसे कोई दु:ख, रोग, शोक, कठिनाई अवश्य पड़नी चाहिए । उसकी बुराई हमें करनी चाहिए । यह करने से उसे अमुक प्रकार से चोट लगेगी । इस प्रकार की विचारधारा से ईर्ष्या निरंतर मन को क्षति पहुँचाती है । अशुभ विचार करने से सत्प्रवृत्तियों तथा प्राणशक्ति का क्रमश: ह्रास होने लगता है । ईर्ष्या से उन्मत्त हो मनुष्य धर्म, नीति तथा विवेक का मार्ग त्याग देता है । उन्मादावस्था सी उसकी साधारण अवस्था हो जाती है और दूसरे लोगों की उन्माद और साधारण अवस्था उसे अपवाद के सदृश प्रतीत होती है । मस्तिष्क में नाना प्रकार की विकृत मानसिक अवस्थाओं की उत्पत्ति होती है । भय, घबराहट, भ्रम ये सब मनुष्य की ईर्ष्या और विवेकबुद्धि के अपकर्ष से उत्पन्न होते हैं । प्रत्येक क्रिया से प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होती है, ईर्ष्या की क्रिया से मन के वाह्य वातावरण में जो प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होती हैं, वे विषैली होती हैं । अपनी अपवित्र भावनाएँ इर्द-गिर्द के वातावरण को दूषित कर देती हैं । वातावरण विषैला होने से सबका अपकार होता है । जो ईर्ष्या की भावनाएँ आपने दूसरों के विषय में निर्धारित की हैं, संभव है दूसरे भी प्रतिक्रिया स्वरूप वैसी ही धारणाएँ आपके लिए मन में लाएँ ।           

निराशा हमारी महान शत्रु है निराशावाद उस महा भयंकर राक्षस के समान है जो मुँह फाड़े हमारे इस परम आनंदमय जीवन के सर्वनाश के चक्कर में रहता है, जो हमारी समस्त शक्तियों का ह्रास किया करता है । जो हमें आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर नहीं होने देता और जीवन के अंधकारमय अंश हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया करता है । हमें पग-पग पर असफलता ही असफलता दिखाता है और विजय द्वार में प्रविष्ट नहीं होने देता । इस बीमारी से ग्रस्त लोग उदास, खिन्न मुद्रा लिए घरों के कोने में पड़े दिन-रात मक्खियाँ मारा करते हैं । ये व्यक्ति ऐसे चुंबक हैं जो उदासी के विचारों को निरंतर अपनी ओर आकर्षित करते हैं और दुर्भाग्य की कुत्सित डरपोक विचारधारा में निमग्न रहा करते हैं । उन्हें चारों ओर कष्ट ही कष्ट दीखते हैं । कभी यह, कभी वह, एक न एक भयंकर विपत्ति आती हुई दृष्टिगोचर होती है । वे जब बातें करते हैं तो अपनी यंत्रणाओं, विपत्तियों के क्लेशपूर्ण अभद्र प्रसंग छेड़ा करते हैं । हर व्यक्ति से वह यही कहा करते हैं कि भाई हम क्या करें, हम बदनसीब हैं, हमारा भाग्य फूटा हुआ है, देव हमारे विपरीत हैं, हमारी किस्मत में विधि ने ठोकरों का ही विधान रखा है, तभी तो हमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर लज्जित और परेशान होना पड़ता है । उनकी चिंतित मुद्रा देखने से यही विदित होता है, मानो उन्होंने उस भाव से गहरा संबंध स्थिर कर लिया हो, जो जीवन की सब मधुरता नष्ट कर रहा हो, उनके सोने जैसे जीवन का समस्त आनंद छीन रहा हो, उन्नति के मार्ग को कंटकाकीर्ण कर रहा हो, मानो समस्त संसार की दु:ख-विपत्ति उन्हीं के सर पर आ पड़ी हो और उदासी की अंधकारमय छाया ने उनके हृदय पटल को काला बना दिया हो । इसके विपरीत आशावाद मनुष्य के लिए अमृत तुल्य है । जैसे तृषित को शीतल जल से, रोगी को औषधि से, अंधकार को प्रकाश से, वनस्पति को सूर्य से लाभ होता है, उसी भाँति आशावाद की संजीवनी बूटी से मृतप्राय मनुष्य में जीवनीशक्ति का प्रादुर्भाव होता है ।

आशावाद वह दिव्य प्रकाश है जो हमारे जीवन को उत्तरोत्तर परिपुष्ट, समृद्धशाली और प्रगतिशील बनाता है । सुख-सौंदर्य एवं अलौकिक छटा से उसे विभूषित कर उसका पूर्ण विकास करता है । उसमें माधुर्य का संचार कर विघ्न-बाधा, दु:ख, क्लेशों और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने वाली गुप्त मन: शक्ति जाग्रत करता है । आत्मा की शक्ति से देदीप्यमान आशावादी उम्मीद का पल्ला पकड़े प्रलोभनों को रौंदता हुआ अग्रसर होता है । वह पग-पग पर विचलित नहीं होता, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता, संसार की कोई शक्ति उसे नहीं दबा सकती, क्योंकि सब शक्तियों का विकास करने वाली ''आशा'' की शक्ति सदैव उसकी आत्मा को तेजोमय करती है । संसार के कितने ही व्यक्ति अपने जीवन को उचित, श्रेष्ठ और श्रेय के मार्ग पर नहीं लगाते । वे किसी एक उद्देश्य को स्थिर नहीं करते, न वे अपने-अपने मानसिक संकल्प को इतना दृढ़ ही बनाते हैं कि निज प्रयत्नों में सफल हो सकें । सोचते कुछ और हैं । काम किसी एक पदार्थ के लिए करते हैं, आशा किसी दूसरे की ही करते हैं । करील के वृक्ष बोकर आम खाने की अभिलाषा रखते हैं । हाथ में लिए हुए कार्य के विपरीत मानसिक भाव रखने से हमें अपनी निर्दिष्ट वस्तु कदापि प्राप्त नहीं हो सकती । बल्कि हम इच्छित वस्तु से और भी दूर जा पड़ते हैं । तभी तो नाकामयाबी, लाचारी, तंगी, क्षुद्रता प्राप्त होती है । अपने को भाग्यहीन समझ लेना, बेबसी की बातों को लेकर झींकना और दूसरों की इष्ट सिद्धि पर कुढ़ना हमें सफलता से दूर ले जाता है । विरोधी भाव रखने से मनुष्य उन्नत अवस्था में कदापि नहीं पहुँच सकता । संसार के साथ अविरोधी रहो, क्योंकि विरोध संसार की उत्कृष्ट वस्तुओं को अपने निकट नहीं आने देता और अविरोध उत्कृष्ट वस्तुओं का आकर्षक बिंदु है ।

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