ऋषि युग्म का उद्बोधन

लोक मानस को आदर्शोन्मुख बनाने के लिये उपयुक्त कविताओं-गीतों का प्रयोग जादू जैसा प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। इसके लिये प्रेरक, उद्बोधक गेय-गीत लिखे और प्रकाशित किये जाना बड़ा उपयोगी और आवश्यक है। अपने देश में आज भी कवियों की कमी नहीं है, पर खेद की बात है कि उनका ध्यान इस ओर बहुत ही कम गया है। इसी प्रकार पुस्तक-प्रकाशकों ने भी इस दिशा में उत्साह नहीं दिखाया। सम्भवतः दोनों ही यह सोचते रहें कि सस्ती लोक-रुचि के अनुरूप लिखने छापने में ही वे लाभ में रहेंगे। जो हो इस प्रकार के गीत ढूंढ़ने पर बहुत कम मिलते हैं, जो जन-मानस के युग के अनुरूप ढालने में सहायक हों, साथ ही लयबद्ध गाये भी जा सकें।

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