समाज निर्माण के कुछ शाश्वत सिद्धांत

अंधानुकरण करना एक बात है और प्रगति के लिए परिस्थितियों के अनुरूप दूरदर्शी योजना बनाकर चलना सर्वथा दूसरी । किस व्यक्ति अथवा समाज की प्रगति कैसे हुई, कौन राष्ट्र कैसे समृद्ध बना, उनके अध्ययन विश्लेषण से उपयोगी प्रेरणाएँ ली जा सकती हैं। साथ ही मूलभूत विशेषताओं, प्रामाणिकता आदि को अपनाकर प्रगतिपथ पर अग्रसर हो सकना संभव है । पर यह सोचना दूरदर्शिता युक्त है कि किसी राष्ट्र विशेष की योजनाओं का अंधानुकरण करके अभीष्ट उद्देश्य की आपूर्ति हो सकती है । कारण स्पष्ट है कि हर देश की परिस्थितियाँ अलग- अलग हैं । उनकी समस्याएँ भी भिन्न-भिन्न हैं । भौगोलिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी भिन्नता दिखाई पड़ती है । अतएव यह आवश्यक नहीं है कि एक देश जिन योजनाओं तथा कार्य-प्रणाली को अपनाकर समृद्ध बना है, दूसरा भी ठीक उसी पद्धति का अनुकरण कर भौतिक दृष्टि से संपन्न बन जाए।

उदाहरणार्थ व्यापक औद्योगीकरण से यूरोप तथा एशिया के कितने ही देशों ने अपनी समृद्धि बढ़ाई है । विशालकाय उद्योगों से संपन्न देशों की प्रदूषणजन्य एवं यांत्रिक जीवन की हानियों को नजर-अंदाज कर दिया जाए तो इतना तो कहना ही पड़ेगा कि वे एकाकी भौतिक सफलताएँ अर्जित करने में सफल रहे हैं । जापान, फ्रांस, अमेरिका, पश्चिम जर्मनी, इंगलैंड, कनाडा आदि देशों में विशालकाय औद्योगीकरण सफल रहा है, पर यह सफलता मात्र अस्थिर समृद्धि बढ़ने तक ही परिसीमित है। सर्वागीण विकास की बात तो उनके लिए भी अभी लाखों मील दूर है, तो भी भौतिक सफलताओं के लिए इन देशों ने जिस कर्मनिष्ठा, श्रमशीलता का परिचय दिया, वह प्रशंसनीय है ।

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