प्रज्ञावतार का स्वरूप और क्रिया-कलाप

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि, मथुरा ३

उत्थान और पतन सृष्टि प्रवाह के यद्यपि इसमें प्रधानता सृजन की ही है, पर बीच-बीच में पतन और पराभव का सामना भी करना पड़ता है । विश्व के इतिहास में ऐसी घड़ियाँ अनेक बार आई हैं, जब विनाश का तांडव अपनी पूरी गति से नृत्य करता रहा है । उस समय जन-जन सर्वनाश की आशंका से काँप रहा था । पर स्त्रष्टा अपनी कृति को इतने सहज में प्रलय के मुख में नहीं जाने दे सकता । यह समय एक चमत्कार जैसा होता है जिससे नाश के गर्त में गिरता हुआ संसार -गति में जरा सा परिवर्तन हो जाने से बच जाता है । उसी को दैव की अवतार लीला कहा जाता है । ….

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