इंद्रिय संयम

इंद्रिय संयम का महत्त्व गायत्री का ग्यारहवाँ अक्षर 'दे' हमको इंद्रियों पर नियंत्रण रखने की शिक्षा देता है- देयानि स्ववशे पुंसा स्वेन्द्रियाण्यखिलानि वै । असंयतानि खादन्तीन्द्रियाण्येतानि स्थामिनम् ।। अर्थात- "अपनी इंद्रियों को वश में रखना चाहिए । असंयत इंद्रियाँ स्वामी का नाश कर देती हैं ।'' इंद्रियाँ आत्मा के औजार हैं, सेवक हैं । परमात्मा ने इन्हें इसलिए प्रदान किया है कि इनकी सहायता से आत्मा की आवश्यकताएं पूरी हों और सुख मिले । सभी इंद्रियाँ बड़ी उपयोगी हैं । सभी का कार्य जीव को उत्कर्ष और आनंद प्राप्त कराना है । यदि उनका सदुपयोग किया जाए तो मनुष्य निरंतर जीवन का मधुर रस चखता हुआ जन्म को सफल बना सकता है । किसी भी इंद्रिय का उपयोग पाप नहीं है । सच तो यह है कि अंतःकरण की विविध क्षुधाओं को, तृषाओं को तृप्त करने का इंद्रियाँ एक उत्तम माध्यम हैं, जैसे-पेट की भूख-प्यास को न बुझाने से शरीर का स्वास्थ्य और संतुलन बिगड़ जाता है, वैसे ही सूक्ष्मशरीर की ज्ञानेंद्रियों की क्षुधा उचित रीति से तृप्त नहीं की जाती तो आतंरिक क्षेत्र का संतुलन बिगड़ जाता है और अनेक प्रकार की मानसिक गड़बड़ी पैदा होने लगती है । इंद्रिय भोगों की बहुधा निंदा की जाती है । उसका वास्तविक तात्पर्य यह है कि अनियंत्रित इंद्रियां

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