भक्ति पथ की जीवन ज्योति

भावनाओं को श्रेष्ठ आदर्श में नियोजित करने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व उसी आदर्श के अनुरूप विस्तृत विराट हो जाता है । वह सीमित-सकीर्ण या एकाकी-असहाय नहीं रह जाता । भले ही बाहरी तौर पर वह 'एकला चलो रे' की नीति का अनुसरण करता-एकाकी बढता दिखे किन्तु उसे आंतरिक अकेलेपन का अनुभव कभी भी नहीं होता । उसका जीवन आदर्श सदा ही उसका साथी, संबल एवं सहायक बना रहता है । उसी संबल से वह बडी-बडी बाधाओ को सहने तथा बडे-बडे कार्य करते चलने में समर्थ होता है, अन्यथा अकेले की क्या शक्ति ? एकाकी व्यक्ति की अपनी थोडी-सी सीमा मर्यादा है, अपने बलबूते पर भी कुछ कार्य तो हो ही सकता है पर वह होगा नगण्य ही । बडी प्रगति-बडी संभावना तो सम्मिलित शक्ति के द्वारा ही मूर्तिमान होती है । एक-एक सैनिक अलग-अलग फिरे, तो उनके छुट-पुट कार्य एक सुगठित सैन्य टोली जैसे नहीं हो सकते। कई तरह की योग्यताएँ मिल-जुलकर अपूर्णता को पूर्ण करती हैं । परिवार को ही लें उसमे कई स्तर के कई विशेषताओं के मनुष्य मिल-जुलकर रहते हैं तो एक अनोखे आनंद का सृजन करते हैं । पति-पत्नी की योग्यताएँ भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं, जब वे मिलकर एक हो जाते हैं तो दोनी को ही लाभ होता है दोनों ही अपने अभावों की पूर्ति करते है । वृद्धों का अनुभव बालकों का विनोद, उपार्जनकर्ताओं का धन आदि मिलकर एक ऐसा संतुलन बनता है जिसमें परिवार के सभी सदस्यों का हित साधन होता है ।

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