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युग गीता
मैं जानता हूँ कि तुम कौन हो और किसलिए आए हो?
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे
जन्म कर्म च मे दिव्यम्
वीतराग होने पर प्रभु के स्वरूप को प्राप्त होना
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्
कर्म, अकर्म तथा विकर्म
कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म का मर्म
गहना कर्मणोगति:
कैसे बनें दिव्यकर्मी और कैसे हों बन्धनमुक्त
कर्म में ब्रह्मदर्शन से ब्रह्म की ही प्राप्ति
हर श्वास में संपादित दिव्य कर्म ही है यज्ञ
यज्ञ बिना यह लोक नहीं तो परलोक कैसा?
यज्ञों में श्रेष्ठतम : ज्ञानयज्ञ
ज्ञान की नौका से भव-सागर को पार करें
पूर्ण तृप्त ज्ञानी की परिणति
उठो भारत स्वयं को योग में प्रतिष्ठित करो
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