मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष

जो चाहें सो सहज ही पायें

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अलाबामा (अमरीका) राज्य के गाड़स डेन नगर के पास एक गांव में रहने वाले एक हाई स्कूल के विद्यार्थी को अपने मित्र को चिढ़ाने की सूझी। कोयल बोलती है तो उसको चिढ़ाने के लिये गांवों के बच्चे उसी की ध्वनि और लहजे में जब वह कुहू करती है तो वे स्वयं भी कुहू करते और बड़े प्रसन्न होते हैं इसी विनोद के भाव में इस विद्यार्थी ने भी अपने मित्र को चिढ़ाना प्रारम्भ किया। पर उसकी प्रक्रिया अन्य लोगों से न केवल भिन्न थी अपितु विलक्षण भी थी जिसे अतीन्द्रिय क्षमता ही कहा जा सकता है। फ्रैंक रेन्स नामक इस विद्यार्थी की विशेषता यह थी कि वह अपने साथी के कुछ भी बोलने के साथ ही हूबहू वही शब्द उसी लहजे में और बिना एक क्षण का विलम्ब किये उसके अक्षरों की ताल बैठाते हुये मानो उसके मन में भी उस समय वही भाव उठ रहे हों जो वह दूसरा साथी व्यक्त कर रहा था। बोलने लगता था।

अतीन्द्रिय क्षमताओं की जांच करने वाले कई विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों ने उनकी जांच की तो वह यह नहीं बता पाये कि इसका रहस्य क्या है, स्वयं फ्रैंक रेन्स भी नहीं जानता था। उनकी एक विशेषता यह भी थी वह जब पढ़ते थे तभी एक बार के अध्ययन से पूरी पुस्तक अक्षरशः कंठस्थ कर लेते थे। एक बार परीक्षा में एक ऐसा प्रश्न आया जिसे वह नहीं जानते थे उस यम इसी क्षमता ने साथ दिया। एक दूसरे विद्यार्थी के मुख की भावभंगिमा को देख-देख कर उन्होंने उसने जो कुछ लिखा था वही स्वयं भी पुस्तक में परीक्षा-पुस्तिका में लिख दिया।

विद्यार्थी जीवन से ही उन्हें अपनी इस अतीन्द्रिय क्षमता का सार्वजनिक प्रदर्शन करना पड़ा और शीघ्र ही वह अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति तक पहुंच गये। जिसने भी उनका कार्यक्रम देखा वह आश्चर्य चकित रह गया।

फ्रैंक रेन्स की विशेषता यह है कि वह केवल अमरीकी भाषा जानते हुये भी दुनिया भर की तमाम भाषाओं में बोलने वाले के साथ वही अक्षर बिलकुल वैसे ही उच्चारण और भावभंगिमा के साथ दोहरा देते हैं एक बार प्रसिद्ध हास्य अभिनेता जेरी ल्यूविर ने एक कार्यक्रम रखा। इसमें जिना लोलो ब्रिगिडा नामक एक स्त्री ने भाग लिया। ब्रिगिडा विश्व की अनेक भाषायें बोल लेती हैं उन्होंने पहले तो एक-एक भाषा के वाक्य बोले जिन्हें रेन्स ने उनके उच्चारण के साथ ही दोहरा दिया। तब फिर वे खिचड़ी बोलने लगीं जिसमें थोड़ी इंग्लिश भी थी हिन्दी रशियन जर्मन और फ्रेंच भी, आश्चर्य कि खिचड़ी भाषा के खिचड़ी वाक्य-विन्यास को भी उन्होंने ज्यों का त्यों दोहरा दिया।

एक बार किसी दर्शन ने कह दिया कि रेन्स बोलने वाले के ओठों की हरकत से बोले जाने वाले शब्द का अनुमान करके उच्चारण करता है। यद्यपि रेन्स बोलने वाले के इतना साथ बोलता है कि अनुमान की कल्पना ही नहीं की जा सकती फिर भी उन्होंने तब से अपना मुंह उल्टी दिशा में करके बोलना प्रारम्भ कर दिया।

फ्रैंक रेन्स का आहार-विहार बहुत शुद्ध, प्रकृति सात्विक और विचार बड़े धार्मिक हैं वे स्वयं यह बात मानते हैं कि यह सब जो वह दिखा देते हैं वह एकाएक नहीं हो जाता वरन् पहले मैं उसकी तैयारी करता हूं। यदि मेरा आहार-विहार कभी अशुद्ध हो गया तो मैं इस तरह का प्रदर्शन करने से आवश्यक शुद्धि के लिए साधना करता हूं।

एक बार न्यूयार्क में उनकी अद्भुत परीक्षा ली गई। एक डॉक्टर नियुक्त किया गया। उसने लगभग 20 पेज का एक वैज्ञानिक लेख तैयार किया जिसमें चिकित्सा शास्त्र के ऐसे कठिन शब्दों का बहुतायत से प्रयोग किया गया था जिनकी सर्वसाधारण को जानकारी तो दूर बड़े-बड़े डॉक्टर तक शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकते थे। डॉक्टर एक कोने में खड़े हुये और फ्रैंक रेन्स दूसरे कोने में। रेन्स के सामने टेप रिकॉर्डर था और मुंह डॉक्टर से उल्टी दिशा में, अर्थात् वह डॉक्टर स्पीच पढ़ता गया रेन्स साथ-साथ दोहराते गये पीछे टेप रिकॉर्डर सुना गया तो लोग आश्चर्य चकित रह गये कि साधारण शिक्षा वाले रेन्स ने वह कठिन उच्चारण भी कितने साफ स्पष्ट ढंग से कर दिये हैं। लोग मनुष्य ‘‘मन’’ की इस विलक्षण शक्ति पर आश्चर्य चकित रह गये।

टेलीफोन और टेलीविजन पर भी अपने कार्यक्रम प्रदर्शित करके फ्रेंक रेन्स ने उपरोक्त बातों की सत्यता प्रमाणित कर दी। टेलीफोन पर चाहे कितनी दूर कोई व्यक्ति खड़ा हो, चाहे जिस भाषा में बोलता जाये हाथ में टेलीफोन पकड़े फ्रैंक रेन्स भी उसके साथ ही वही उच्चारण दोहराते चले जाते हैं यहां तो ओंठ क्या उस व्यक्ति का शरीर ही हजारों मील दूर होता है। यही बात टेलीविजन पर भी होती है। अब तक उनके टेलीविजन पर लगभग 25 कार्यक्रम हो चुके हैं। जेरी ल्यूविस जॉनसन और जैक पार के साथ उन्होंने ‘‘आई हैव गाट ए सीक्रेट’’ और ‘‘टु नाइट’’ कार्यक्रमों में भी भाग लेकर लोगों को आश्चर्य चकित किया है पर उनकी इस आश्चर्य जनक क्षमता का उपयोग मात्र मनोरंजन रह गया है। उसका उपयोग किसी बड़े कार्य में होना चाहिये था जैसा कि फ्रैंक रेन्स स्वयं कहते हैं कि—मेरे भीतर ऐसी आवाज आया करती है कि आगे एक ऐसा युग आ रहा है जब लोगों में इस तरह की अतीन्द्रिय क्षमताएं सामान्य हो जावेंगी। मुझे ऐसा लगता है कि मुझे उसी दिशा में काम करना चाहिये यह प्रेरणा क्यों उठती है कहां से आती है यह वे स्वयं नहीं जानते।

इस तरह की क्षमतायें मानसिक शक्तियों को विकास से ही प्राप्त करली है। साधना, तप, अनुष्ठान आदि द्वारा मनश्चेतना को उसी स्तर पर पहुंचाया जाता है जहां से कि वह इस तरह की अतीन्द्रिय कही जाने वाली क्षमतायें प्राप्त कर सके पर वे वस्तुतः होती ही मन की शक्तियां हैं।

सामान्यतः यह समझा जाता है कि—मस्तिष्क सोचने का कार्य करता है। निर्वाह की आवश्यकताएं जुटाने तथा प्रस्तुत कठिनाइयों का समाधान ढूंढ़ना ही उसका काम है। उसकी ज्ञान आकांक्षा इसी प्रयोजन के लिए उपयोगी जानकारी प्राप्त करने तक सीमित हो सकती है।

उसके पीछे अचेतन मन की परत है वह रक्त संचार हृदय की धड़कन, श्वास-प्रश्वास, आकुञ्चन-प्रकुञ्चन, निमेष-उन्मेश, ग्रहण-विसर्जन, निद्रा-जागृति जैसी अनवरत शारीरिक क्रिया-प्रक्रियाओं का स्वसंचालित विधि-विधान बनाये रहता है।

आदतें अचेतन मनमें जमा रहती हैं और आवश्यकता पूर्ति के लिए चेतन मन काम करता रहता है। मोटे तौर पर मस्तिष्क का कार्य क्षेत्र यहीं समाप्त हो जाना चाहिए। इससे आगे जादू से बने संसार का अस्तित्व सामने आता है। जिसकी अनुभूति तो होती है, पर कारण और सिद्धान्त समझ में नहीं आता। इस प्रकार की अनुभूतियां प्रायः अतीन्द्रिय मनःचेतना की होती है। भूतकाल की अविज्ञात घटनाओं का परिचय, भविष्य का पूर्वाभास दूरवर्ती लोगों के साथ वैचारिक आदान-प्रदान, अदृश्य आत्माओं के साथ सम्बन्ध, पूर्वजन्मों की स्मृति, चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियां, शाप वरदान, जैसी घटनाएं अतीन्द्रिय अनुभूतियां मानी जाती हैं। व्यक्तित्व का स्तर भी इसी उपचेतना की परतों में अन्तर्निहित होता है विज्ञानी इसे पैरा साइकिक तत्व कहते हैं। इसके सम्बन्ध में इन दिनों जिस जिस आधार पर शोध कार्य चल रहा है, उसे परामनोविज्ञान—पैरा साइकोलॉजी नाम दिया गया है।

स्थूल और कारण शरीरों के बीच एक सूक्ष्म शरीर भी है। त्रिविधि शरीरों में एक स्थूल है जिसमें ज्ञानेन्द्रियों का, कर्मेन्द्रियों का समावेश है। सूक्ष्म को मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को चार परतों में विभक्त किया गया है। मनोविज्ञानी इसे चेतन और अचेतन मन में विभक्त करते हैं और उसके कई-कई खण्ड करके कई-कई तरह से उस क्षेत्र की स्थिति को समझाने का प्रयत्न करते हैं। कारण शरीर को अन्तरात्मा कहा जाता है संवेदनाएं एवं आस्थाएं उसी क्षेत्र में जमी होती हैं। योगी लोग प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि द्वारा इसी क्षेत्र को जागृति एवं परिष्कृत करने का प्रयास करते हैं।

अतीन्द्रिय क्षमता सूक्ष्म शरीर का—मस्तिष्कीय चेतना का विषय है। इन्द्रिय शक्ति के आधार पर ही प्रायः मनुष्य अपनी जानकारियां प्राप्त करता है और उस प्रयास में जितना कुछ मिल पाता है उसी से काम चलाता है। मस्तिष्क ब्रह्माण्डीय चेतना से सम्पर्क बना सकने और उस क्षेत्र की जानकारियां प्राप्त कर सकने में समर्थ है। अविकसित स्थिति में उसे ज्ञान सम्पादन के लिए इन्द्रिय उपकरणों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वे जितनी जानकारियां दे पाती हैं उतना ही व्यक्ति का ज्ञान-वैभव सम्भव होता है, पर जब मस्तिष्कीय चेतना का अब के अथवा पिछले प्रयत्नों से अपेक्षाकृत अधिक विकास हो जाता है तो फिर बिना इन्द्रियों की सहायता के ही समीपवर्ती एवं दूरवर्ती घटनाक्रम की जानकारी होने लगती है। इतना ही नहीं ब्रह्माण्ड-व्यापी ज्ञान-विज्ञान की असंख्य धाराओं से अपना सम्पर्क बन जाता है। प्रयत्न पूर्वक थोड़ा-सा धीरे-धीरे ही कमाया जा सकता है, पर यदि किसी अक्षय रत्न भण्डार पर अधिकार प्राप्त हो जाय तो अनायास ही धन कुबेर बना जा सकता है। अन्तरिक्ष के अन्तराल में असंख्य मनीषियों की ज्ञान सम्पदा बिखरी पड़ी है विकसित सूक्ष्म शरीर उस ज्ञान भण्डार से सम्बन्ध मिला सकता है और अपनी जानकारियों का इतना विस्तार स्वल्प समय में ही कर सकता है जितना सामान्य प्रयत्नों में सम्भव नहीं हो सकता।

मनुष्य के उपचेतन मन का पक्षी मस्तिष्क के घोंसले में रहता भर है, पर वह उतने में ही आबद्ध रहने के लिए विवश नहीं है। वह देश और काल का—मर्यादाओं का अतिक्रमण करके हजारों वर्ष पूर्व का—अथवा हजारों मील दूर की घटनाओं को उसी प्रकार देख सकता है मानो वे उसके ठीक सामने घटित हो रहा है। मानसोपचार विज्ञानी डा. थेमला मौस ने ठीक ही कहा है कि चेतन मस्तिष्क का दबाव यदि उपचेतन पर से हट जाय और वह स्वच्छन्दता पूर्वक विचरण कर सकने की सुविधा प्राप्त कर सके तो उसके ज्ञान की ओर गति की क्षमता असीमित बन सकती है।

कई प्राणियों में जो यह क्षमता जन्म-जाति ही होती है। अब ऐसे प्राणियों की इन क्षमताओं का उपयोग वैज्ञानिक प्रयोजनों के लिए भी किया जाने लगा है। रेडियो सक्रियता की माप के लिए फ्रेन्च वैज्ञानिकों ने ‘‘गाहगर-बाउन्टर’’ यन्त्र बनाया जिसकी कीमत लाखों डालर पड़ती थी। इस बीच कुछ जीव शास्त्रियों ने जब यह संकेत दिया कि चींटियों में यह सूक्ष्म संवेदना तो जन्म जात होती है तब से इस यन्त्र का निर्माण बन्द कर दिया गया और अब इस कार्य के लिए वहां विधिवत चींटियों की ही सेवा ली जाती है।

बांस में कभी फूल नहीं देखे जाते इनकी जड़े ही वंशवृद्धि करती रहती हैं। किन्तु 50 वर्ष बाद प्रायः बांस में फूल आते और उनमें से फल भी निकलते हैं। 50 वर्ष की अवधि में यदि एक चूहे की वंशवृद्धि प्रारम्भ हो तो उस समय तक 50 पड़पोते पहुंच जायेंगे जिन्हें यह पता भी नहीं होगा कि बांस में भी फल होते हैं; किन्तु चूहे अपनी सुगन्ध विश्लेषण की सूक्ष्म बुद्धि से इस फल की उपयोगिता ताड़ कर उसे खूब खाते हैं यह फल उनकी प्रजनन क्षमता को कई गुना अधिक बढ़ा देता है। यह ज्ञान उन्हें किस तरह मिलता है। इस गुत्थी को जीवशास्त्री सुलझा नहीं पाये।

भूटान नरेश वांगचुक जिग्मेदोरगी पर किसी ने बम फेंका। बात 1965 की है। आक्रमणकारियों का बहुतेरा पता लगाया गया किन्तु अच्छे जासूस असफल रहे। अन्ततः कार्य सेना को सौंपा गया और सेनाधिकारियों ने अपने प्रशिक्षित कुत्ते अलेकसी को इस बात के लिए चुना। कुत्ते ने हथगोले के टुकड़े सूंघे। यह एक विलक्षण बात है कि उन टुकड़ों में बारूद के अतिरिक्त और कोई गन्ध आये किन्तु इसे कुत्ते की घ्राण शक्ति को चमत्कार ही कहना चाहिए कि उसने उन टुकड़ों में लिपटी हुई मानव गन्ध को पहिचान लिया और महल से एक ओर चल पड़ा। घटना को काफी समय हो गया था तब स्थान की गन्ध सौ बार धुल चुकी होती है। किन्तु कुत्ता वहां से चलकर तीन मील दूर एक मकान में रुका फिर वहां से भी आगे चलकर एक बौद्ध मन्दिर में जा घुसा जहां एक आदमी छुपा बैठा था। कुत्ते के संकेत पर उसे पकड़ लिया गया उसने न केवल अपराध स्वीकार किया अपितु यह भी पता चला कि वह मकान भी उसी का था जहां वे गोले फेंकने के बाद कुछ देर रुका।

कई बार ऐसा होता है कि जंगल में शेर बैठा होता है। तथा हिरण उसके समीप ही घास चर रहा होता है। फिर भी वह न तो भयभीत होता है, न आतंकित। क्योंकि उसे ज्ञात रहता है कि शेर भूखा होने पर ही शिकार करता है और इस समय उसे ऐसी कोई परेशानी नहीं है। हिरण मन की बात कैसे जान लेता है। जीव वैज्ञानिक इस आश्चर्यजनक तथ्य की शोध में लगे हुए हैं, पर अभी तक कुछ जानकारी मिली नहीं।

शेरनी जब किसी ऐसे युद्ध के लिए चलती है, जिसमें शत्रु समान शक्ति का हो तो वह अपने बच्चों को किसी सुरक्षित स्थान पर बैठा जाती है। युद्ध बच्चों की आंखों से ओझल चलता है। बच्चे इसी स्थान पर बैठे रहते हैं किन्तु इस बात की अनुभूति उन्हें न जाने कैसे हो जाती है कि अब युद्ध समाप्त हो गया और मां की विजय हुई वे शेरनी के पास विजय के बाद बिना बुलाये चले जाते हैं।

आधुनिक परामनोविज्ञान पूर्वाभास दूर संचार तथा स्वप्नों में होने वाले भविष्य दर्शन को पांच ज्ञानेन्द्रियों से भिन्न व अतीत-छठवीं संवेदना (सिक्स्थ सेन्स) की संज्ञा दी है। इस छठवीं संवेदना को आज बड़ी जिज्ञासापूर्ण दृष्टि से देखा और खोजा जा रहा है।

न केवल मनुष्य अपितु जीवों में इस तरह की सूक्ष्म क्षमतायें पाई गईं तो आश्चर्य होना स्वाभाविक ही था। आज भी समुद्रों में चलने वाले जहाजों से यदि चूहे निकल कर स्वेच्छा से भाग निकलें तो नाविक आने वाले संकट का अनुमान कर लेते हैं। जब कि अनेक बार अत्यधिक आधुनिक किस्म के यन्त्र भी सही जानकारी देने में असमर्थ रहते हैं।

वर्मा की कलादान घाटी में एक बिल्ली की एक विचित्र समाधि बनी है। इसके चारों और लिखा है—‘‘रैडी की यह बिल्ली हमारी समय पर सहायता न करती तो हम मारे जाते और पराजित होते’’—इन शब्दों में वास्तव में जीवों में अद्भुत अतीन्द्रिय क्षमता का इतिहास अंकित है। बात उन दिनों की है जब बर्मा में अंग्रेजों और जापानियों के बीच युद्ध चल रहा था। एक दिन अंग्रेजों की टुकड़ी ने एक जापानी टुकड़ी पर आक्रमण कर दिया। जापानियों ने पीछे हटने का नाटक खेला वास्तव में वे पीछे नहीं हटे वरन् खंदकों में छिप गये मानो वे सचमुच भाग गये हों। एक मेज पर वे ताजा पका पकाया खाना भी छोड़ गये उसे देखते ही अंग्रेज सैनिक उस खाने पर टूट पड़े किन्तु अभी वे प्लेटो तक नहीं पहुंच पाये थे उनमें से एक सर्जेंट रैंडी की काली बिल्ली उस खाने पर जा टूटी और बुरी तरह गुर्राकर अंग्रेज सैनिकों को पीछे हटा दिया अंग्रेजों ने बिल्ली को धमकाया भी वह अपनी क्रुद्ध मुद्रा में तब तक गुर्राती ही रही जब तक वहां एक भयंकर धमाका नहीं हो गया। वास्तव में उस खाने के साथ बारूदी सुरंग का सम्पर्क जुड़ा था उन सैनिकों के प्राण ले सकता था पर बिल्ली ने अपनी आत्माहुति देकर न केवल अपनी स्वामिभक्ति का परिचय दिया अपितु उसने यह भी बता दिया कि जीव जिन्हें हम तुच्छ समझते हैं किस तरह विलक्षण आत्मिक गुणों—अतीन्द्रिय क्षमताओं से ओत-प्रोत होते हैं।

इसी तरह की एक घटना जर्मनी के साथ अंग्रेजों के युद्ध में कैम्बरवेल में घटी थी। मिस्टर ज्योफरी नामक एक अंग्रेज ने एक बिल्ली पाल रखी थी। एक दिन जर्मनी बमवर्षक जहाज कैम्बरवेल से गुजरे। सारा परिवार घबड़ाकर मकान के एक कोने में दुबक गया। तभी उनकी बिल्ली बगीचे के तहखाने से दर्दनाक ध्वनि में म्याऊं-म्याऊं चिल्लाने लगी। पहले तो ज्योफरी उसे बुलाते रहे पर जब वह न आई तथा उसी तरह चिल्लाती रही तो उन्होंने समझा कि बिल्ली मर गई है सारा परिवार उसके पास पहुंचा अभी वे तहखाने में घुसे ही थे कि दुबारा जहाजों ने आक्रमण कर बम बरसाये और वह मकान बुरी तरह विस्फोट के साथ मलबे में बदल गया। बिल्ली के इस अतींद्रिय ज्ञान के कारण ही ज्योफरी व उनका परिवार बच सका।

विज्ञान ने दूर से दूर स्थान से शीघ्र तक संदेश के टेलीफोन, बे तार के तार माइक्रोवेव यंत्र बनाये तो हैं ऐसे यहां भी बने हैं जो ऋतु और उसमें परिवर्तनों की कुछ भविष्यवाणी भी कर सकते हैं। परन्तु ऊपर जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया, उनके मुख्य पात्रों की तरह का कोई आविष्कार नहीं हो सका। प्रो. क्रेग ने इस तरह की घटनाओं का उल्लेख करते हुए न्यूरो साइक्रेटिक संस्थान कैलीफोर्निया के डाइरेक्टर प्रो. क्रेग को नियेशन नाम की एक ऐसी महिला की जानकारी मिली जिसके बारे में यह कहा जाता था कि वह किसी भी अज्ञात व्यक्ति की कोई भी वस्तु स्पर्श करके उसके सम्बन्ध में गोपनीय से गोपनीय बातें बता देती हैं न केवल अतीत अपितु वर्तमान और भविष्य सम्बन्धी उनके उद्घोष सर्वथा सत्य पाये गये। विज्ञान ने दूर से दूर स्थान से शीघ्रतम सन्देश के टेलीफोन, बेतार के तार माइक्रोवेव यन्त्र बनाये तो हैं, ऐसे यन्त्र भी बने हैं जो ऋतु और उसमें परिवर्तन की कुछ भविष्यवाणी भी कर सकते हैं किन्तु संसार के अरबों व्यक्तियों में से किसी भी एक व्यक्ति के अज्ञात, विश्वसनीय और गोपनीय भूत व भविष्य का सत्य उल्लेख विज्ञान के लिये एक चुनौती है इसका अर्थ तो स्पष्टतः आइन्स्टीन के सापेक्षवाद सिद्धान्त के उस तत्व की खोज होनी है जिसके बारे में उन्होंने यह कहा था कि यदि कोई वस्तु प्रकाश की गति से भी अधिक वेग ले सकती हो तो उसे अपने स्थान से चलकर ब्रह्माण्ड की परिक्रमा लगा आने में ऋण-समय लगेगा अर्थात् यदि वह अपने स्थान से 21 नवम्बर 1977 को चलती है तो ब्रह्माण्ड का चक्कर लगा कर वह 20 नवम्बर 1977 को ही उसी स्थान पर आ जायेगा। यह स्पष्टतः आत्मा या परमात्मा की ही विशेषता हो सकती है अतएव प्रो. क्रेग ने घटना की विस्तृत शोध का निश्चय किया।

उन्होंने श्रीमती नियेशन को एक बन्द कमरे में रखा और एक उनके सर्वथा अजनबी व्यक्ति की एक वस्तु दी। उस वस्तु को हाथ में लेते ही उन्होंने उस व्यक्ति का न केवल नाक-नक्शा अपितु उसके पूर्व जीवन की अनेक घटनाएं यों कह सुनाई मानो वे चलचित्र में सब देख रही हैं। कु. एडम नामक एक अन्य लड़की की अतीन्द्रिय क्षमता के बारे में भी प्रो. क्रेग ने लिखा है कि वह सूंघकर टेलीफोन पकड़ कर दूरवर्ती वस्तुओं को ऐसे बता देती थी मानो वे सामने पड़ी पुस्तक पढ़ रही हो।

इन घटनाओं का उल्लेख करने के बाद प्रो. क्रेग ने लिखा है परामनोविज्ञान ने (1) दूरानुभूति (2) क्लेसर वापेन्स (3) दूरदृष्टि (4) विचार संचालन (टेलीपैथी) सम्बन्धी अन्य घटनाओं की प्रामाणिक खोजें की हैं उनसे मनुष्य की विलक्षण अतीन्द्रिय क्षमता का पता चलता है कि घटनाओं को इनमें से किसी भी कोटि में नहीं रखा जा सकता। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. फर्नीनेड वान न्यूट्राइटर को उनके एक सहयोगी ने बताया एक ल्यूथिनियन लड़का किसी भी भाषा का कितना ही बड़ा वाक्य गद्य अथवा पद्य आप कहें, बच्चा उसी भाषा में अर्द्ध विराम, पूर्ण विराम सहित दोहरा देता है यही नहीं आप बोलना प्रारंभ करें तो वह स्वयं भी वहीं शब्द उसी मोड़ और लचक के साथ इस तरह शब्द से शब्द मिलाकर बोलता चला जाता है मानो उसे स्वयं ही वह पाठ कंठस्थ हो। प्रो. फर्डीनेंड ने कहा—सम्भव है वह ओठों की हरकत से उच्चारण पहचानने में सिद्ध हस्त हो सो उनने स्वयं जांच करने का निश्चय किया। उन्होंने उस बच्चे को एक कमरे में और दूसरे एक व्यक्ति को दूसरे कमरे में—बैठाकर उसे कई भाषायें बदल-बदल कर लगातार बोलने को कहा दोनों कमरों से माइक एक सामने के कमरे में लाकर रखे गये जिसमें डा. फर्निनेंड स्वयं बैठे, प्रयोग प्रारम्भ हुआ तो वस्तुतः वे अत्यन्त आश्चर्य चकित रह गये कि लड़का एक दो भाषाओं का ज्ञाता हो सकता है पर वह तो किसी को भी लाकर खड़ा करने से उसी की भाषा दोहरा देता था इसका अर्थ यह हुआ कि बिना पढ़े हर विद्या में निष्णात होना। ऐसा किसी भी पार्थिव या भौतिक सिद्धांत से सम्भव नहीं।

मन और मस्तिष्क कारण

इस तरह की घटनाओं, क्षमताओं, सिद्धियों का आधार मनुष्य का मन मस्तिष्क बताया जाता है, मस्तिष्क के इस पक्ष को मन भी कहा जा सकता है पर मन और मस्तिष्क की क्षमताओं का विभाजन करने के लिए कोई स्थूल सीमा विभाजन नहीं किया जा सकता फिर मन का शरीर स्वास्थ्य और मनुष्य की आन्तरिक बाह्य परिस्थितियों पर अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है।

घटना 21 जनवरी 1793 की है। मादामलुहरवेट अपने 4 वर्षीय पुत्र आरमण्ड को लेकर फ्रान्स के सम्राट लुई सोलहवें को दिया जाने वाला मृत्यु दण्ड देखने गये। लुई सोलहवें की हत्या इतनी नृशंसतापूर्वक की गयी कि वहां का वीभत्स दृश्य देखकर आरमण्ड बहुत समय गया मादाम लुहरवेट अपने बच्चे को लेकर घर लौट आयीं और आरमण्ड खेलने लगा। खेलते-खेलते उसे वह वीभत्स दृश्य याद आया और अचानक बेहोश होकर गिर पड़ा। बेहोश आरमण्ड को अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने जांच की और बताया कि बच्चे के मन पर किसी घटना का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है।

आरमण्ड होश में तो आ गया पर उस घटना का प्रभाव उसके मन मस्तिष्क पर इस बुरी तरह हावी हो गया कि वह सो नहीं सका। एक दिन, दो दिन, सप्ताह, दो सप्ताह, उपचार किया गया। महीनों तक ट्रैंकुलाइजर्स (नींद की औषधि) दी गयी, मालिश भी की गयी। किन्तु नींद नहीं आयी तो नहीं ही आयी।

माता-पिता को इस बात की चिन्ता हुई कि उनके बेटे के स्वास्थ्य पर न सोने के कारण प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। एक दो दिन ही न सोने से मन उद्विग्न हो उठता है। विक्षिप्तता आने लगती है। सामान्य व्यक्ति यदि आठ घण्टे प्रतिदिन नींद न ले तो उन्हें अपना सामान्य जीवनक्रम भी चलाना कठिन हो जाय। परन्तु आरमण्ड को देखकर यह सारी धारणाएं निर्मूल सिद्ध हुईं।

न सोने के बावजूद भी आरमण्ड नियमित रूप से पढ़े, वे और लोगों की तरह शारीरिक श्रम करते। इतना ही नहीं पढ़-लिखकर वकील बन गये। रात में जब लोग सो जाया करते तब भी वह मुकदमों के मजबून तैयार किया करते। आरमण्ड जैक्विस के नाम से विख्यात उपर्युक्त वकील जीवन के अन्तिम क्षणों तक नहीं सो पाये। 71 वर्ष की आयु में आरमण्ड की मृत्यु सन् 1864 में हुई। इस बीच उन्हें एक क्षण को भी नींद नहीं आयी।

इस तरह की और कई घटनाओं को संकलित करने और उनका अध्ययन करने के बाद डा. सोलेमन ने एक पुस्तक लिखी है—‘‘माइण्ड मिस्ट्रीज एण्ड मिरकल्स।’’ इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि मन एक बहुत ही सूक्ष्म रहस्यमयी और अद्भुत शक्तिशाली सत्ता है। उसके रहस्यों को समझ पाना अति दुष्कर है। भारतीय तत्व दर्शन में तो मन को ही सब सफलता असफलताओं का मूल कहा है। यहां तक कि उसे ही बन्धन और मोक्ष का कारण कहा गया—‘‘मन एवं मनुष्याणां कराणं बन्ध मोक्षयो’’ अर्थात् बन्धन और मुक्ति का कारण यह मन ही है।

उपरोक्त घटना का विश्लेषण करते हुए डा. सोलेमन ने लिखा है—‘‘लुई को दिये गये मृत्यु दण्ड से आरमण्ड की मनश्चेतना इतनी आतंकित या विचलित हो गयी थी कि उसमें 72 वर्ष की आयु तक आरमण्ड को सोने नहीं दिया। परिस्थितियों और घटनाओं से प्रभावित मन शरीर को किस प्रकार नचाता है इसके उदाहरण तो आये दिन देखने में आते ही हैं। क्षुब्ध स्थिति में लटका हुआ विवर्ण चेहरा, चिन्ता और परेशानी के समय नींद का उड़ जाना, प्रसन्ना के समय खिल उठना आदि बातें मन और शरीर के सम्बन्धों को प्रमाणित करती हैं।

यह तो सामान्य जीवन की छोटी-छोटी बातें हैं जिनमें मन का शरीर पर प्रभाव परिलक्षित होता है। अन्यथा मनुष्य का मन बड़ा समर्थ और बलवान् है। भगवान् श्रीकृष्ण ने भी कहा है—

असंशयं महावाहो मनो दुर्निग्रहंचलम् । (गीता 6।35)

अर्जुन! निस्सन्देह यह मन चञ्चल और कठिनता से वश में होने वाला है।

सभी शास्त्रकारों और योगी सिद्ध महापुरुषों के मन को समस्त शक्तियों का भण्डार निरूपित करते हुए इसको वश में करना आवश्यक बताया है क्योंकि जीवसत्ता और ब्रह्मसत्ता के बीच यदि कोई चेतन सत्ता काम करती है, उन्हें मिलाती है या विलग करती है तो वह मन ही है।

मन की इस शक्ति को भारतीय महर्षि मुनियों ने पहले ही जान लिया था। आधुनिक विज्ञान भी अब उसकी प्रचण्ड सामर्थ्य को स्वीकार करने लगा है। साइकोलॉजी, पेरा साइकोलॉजी, मेटाफिजिक्स और फेथहीलिंग आदि विज्ञान की धारायें मनःशक्ति के ही अध्ययन और शोध की धारायें हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जिस तरह मनुष्य ने शरीर को भोग की वस्तु मानकर अपने आपको महान् आध्यात्मिक सुख सम्पदाओं से वंचित कर लिया है। उसी प्रकार मन जैसी प्रचण्ड शक्ति का उपयोग भी वह केवल लौकिक स्वार्थों और इन्द्रिय भोगों तक ही सीमित रखकर उसे नष्ट करता रहता है।

मन भौतिक शरीर की चेतन शक्ति है। आई के शक्ति सिद्धान्त के अनुसार एक परमाणु से 3,45,960 लाख कैलोरी शक्ति उत्पन्न हो सकती है वस्तुतः एक परमाणु में कितनी शक्ति है इसका तो अभी ठीक-ठीक पता भी नहीं चलाया जा सका है क्योंकि इस क्षेत्र में नित नये रहस्य खुलते जा रहे हैं। फिर भी पदार्थ को शक्ति में बदलने की जितनी सम्भावनायें सामने आती हैं उनके अनुसार एक पौण्ड अर्थात् 450 ग्राम पदार्थ की शक्ति 14 लाख टन कोयला जलाने पर प्राप्त होने वाली शक्ति होगी।

यद्यपि पदार्थ को पूरी तरह शक्ति में बदल पाना अभी संभव नहीं हुआ है। यदि वह सम्भव हो जाय तो 450 ग्राम कोयले से सम्पूर्ण अमेरिका के लिए एक माह तक चलने वाली बिजली तैयार हो सकती है। विज्ञान के लिए पदार्थ को शक्ति में रूपांतरित करना भले ही सम्भव न हुआ हो परन्तु परमात्मा ने मनुष्य शरीर को इस प्रकार सृजा है कि उसके पास शरीर की विद्युत शक्ति मन के रूप में पहले से ही विद्यमान है। मन शरीर द्रव्य की विद्युत शक्ति ही है और यदि इसका पूरी तरह उपयोग किया जा सके तो 60 किलोग्राम वाले शरीर की विद्युत शक्ति अर्थात् मन की सामर्थ्य पूरे भारत को 10 वर्ष तक विद्युत देती रह सकती है।

डा. बैनेट ने इसी आधार पर मन के लिए कहा है कि यह एक महान् विद्युत शक्ति है। इस शीर्षक से उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी है जिसका नाम है ‘माइण्ड एग्रेट इलेक्ट्रिकल फोर्स’, इस पुस्तक में उन्हें बहुत सारे तथ्य और आंकड़े दिये हैं तथा बताया है कि इस शक्ति को एक निश्चित दिशा में नियोजित कर दिया जाय तो उसके चमत्कारी परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

वेद ने इस शक्ति को ‘‘ज्योतिषां ज्योति’’ कहा है। इसकी प्रचण्ड क्षमता से ही भारतीय योगी ऋषि प्राचीन काल में शून्य आकाश में स्फोट किया करते थे और इसी शक्ति द्वारा समस्त भूमण्डल की मानवीय समस्याओं का समाधान और नियन्त्रण करते थे। शेर और गाय को एक ही घाट पर पानी पिलाने की क्षमता इसी शक्ति में विद्यमान थी। इस सन्दर्भ में गीताकार ने छठवे अध्याय में एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया है—

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।।5।। बन्धुरात्मा त्मनस्वस्य यैनात्मौवात्मनाजित अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतस्मैव शत्रुवत् ।।6।।

अर्थात्—आत्मचेतना आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु। आत्म सत्ता जिसे यहां मन के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है उस व्यक्ति का तो आप ही अपना मित्र है जिसने जीत लिया है और जिसने मन पर कोई नियन्त्रण नहीं कर रखा है उसके साथ यह आप ही शत्रु की तरह बर्तता है।

मनुष्य इतनी अतुल शक्ति सम्पत्ति का स्वामी होते हुए भी केवल उसका नियन्त्रण और नियोजन न कर पाने के कारण परमुखापेक्षी तथा दीन बना रहता है। अनियंत्रित और अपरिष्कृत मन के दुष्परिणाम शक्ति के दुरुपयोग की तरह के ही तो होंगे। आज से खाना बनाया जाय या आग लगायी जाय, बिजली से रोशनी पैदा की जाय अथवा प्राण संकट खड़ा किया जाय, अणुशक्ति का उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जाय अथवा नरसंहार के लिए—यह उपयोग की दिशा पर ही निर्भर है। मनःशक्ति को विकृत और घृणित बनाये रखकर उसके दुरुपयोग दुष्परिणाम का आधार ही खड़ा किया जाता है।

हाल ही में हुए प्रयोगों और परीक्षणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि रोगों की जड़ शरीर में नहीं मनुष्य के दूषित मन में हैं। अमेरिका में रोगियों का मनोविश्लेषण करने के बाद यह पाया गया कि यों तो अधिकांश रोगियों का मनोविश्लेषण करने के बाद यह पाया गया कि यों तो अधिकांश रोगी मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ थे किन्तु पेट के मरीज शत प्रतिशत रूप से दूषित मनोविकारों वाले व्यक्ति थे। डा. कैनन ने, जिनकी अध्यक्षता में अमेरिका के डाक्टरों और मनश्चिकित्सकों ने यह अध्ययन किया—लिखा है आमाशय का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क के ‘‘ऑटोनेमिक’’ केन्द्र से होता है। सिंपेथेटिक और पेटा सिम्पेथेटिक यह ऑटोनॉमिक केन्द्र के दो भाग हैं जो पेट की क्रियाओं को संचालित करते हैं तथा पाचन रस उत्पन्न करते हैं। यदि व्यक्ति की मनःस्थिति अस्त-व्यस्त और आवेशग्रस्त होती है तो उसका पेट की क्रियाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और उसका पेट हमेशा के लिए खराब रहने लगता है।

डा. क्रेन्स डोलमोर और डॉक्टर रोओ द्वारा सन् 1923 में की गयी शोधें शरीर और मन के सम्बन्धों पर विस्तृत प्रकाश डालती हैं। उनका कहना है शरीर में कोई रोग उत्पन्न हो ही नहीं सकता जब तक कि मनुष्य का मन स्वस्थ है। उन्होंने अपनी पुस्तक में दो फोटो भी प्रकाशित किये हैं। एक फोटो पचास वर्ष की आयु वाले व्यक्ति का है और दूसरा सत्तर वर्ष की आयु वाले फोटो में चेहरे पर कोई झुर्री नहीं, कोई सिकुड़न नहीं और बुढ़ापे का कोई लक्षण नहीं है जबकि पचास वर्ष की आयु वाले व्यक्ति का फोटो देखने से लगता है कि यह व्यक्ति बूढ़ा ही नहीं रोगी भी है, धंसी-आंखें, पिचके गाल और सूखा चेहरा रुग्णता के प्रतीक नहीं तो क्या हैं?

यह तो शरीर पर पड़ने वाले मन के प्रभाव का उल्लेख है। समाज में भी रोग, शोक, संहार, युद्ध, दंगे और लड़ाई झगड़े दूषित मनःस्थिति और विकृत विचारों वाले व्यक्तियों के कारण ही उत्पन्न होते हैं। जितने भी युद्ध और नरसंहार हुए उनके कारण प्रायः ऐसी मनःस्थिति के व्यक्ति ही होंगे। विकृत मनःस्थिति किस प्रकार के अनर्थ उत्पन्न करती है उसका ताजा उदाहरण द्वितीय विश्वयुद्ध है जिसमें दो करोड़ से भी अधिक व्यक्ति मारे गये। एक व्यक्ति की क्रूरता, हिंस्रता और अहंवादिता के कारण ही संसार के लाखों लोग अकाल युद्ध के गाल में कवलित हुए और एक व्यक्ति की परिष्कृत, शुद्ध सात्विक मनःस्थिति का प्रभाव देखना हो तो वह महात्मा गांधी, अब्राहीम लिंकन, मार्टिन लूथरकिंग आदि महापुरुषों के रूप में देखा जा सकता है जिन्होंने अकेले ही अपने समाज व संसार में महत्वपूर्ण क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत किये। आणविक शक्ति के सदुपयोग और विध्वंस प्रयोगों की तुलना मनःशक्ति से की जा सकती है। संसार में सूखते जा रहे ऊर्जा स्रोतों के पूरी तरह चुक जाने के बाद वैज्ञानिकों की आंखें अणुशक्ति की सम्भावनाओं पर ही टिकी हुई हैं। अणुशक्ति का विध्वंसकारी रूप कितना भयावह है, यह संसार पिछले विश्व युद्ध में देख ही चुका है और अब जबकि उस क्षेत्र में काफी विकसित तकनीक उन्नति कर ली गयी है तब तो कहा जा रहा है कि दो पांच बम ही इस सारी पृथ्वी का जीवन नष्ट करने के लिए पर्याप्त होंगे।

मन की शक्ति अणुशक्ति से किसी प्रकार भी कम नहीं है। बल्कि उससे अधिक ही समर्थ और प्रचण्ड है। इतिहास पुराणों में वर्णित शाप और वरदान की घटनायें इसी मनःशक्ति के विध्वंस और सृजन उपयोगों के उदाहरण है। इस तथ्य को भारतीय तत्वदर्शियों ने बहुत पहले ही लिख दिया है—‘‘मनःमातस देवी चतुर्वर्ग प्रदायकम्’’—अर्थात् मन की शक्ति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष दिलाने वाली सभी शक्तियां भरी पड़ी हैं।
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