हमारा समस्त जीवन ही साधनामय बने

April 1968

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मानव-जीवन ईश्वर की एक अनमोल अमानत है। इसे आदर्श एवं उत्कृष्ट बनाना ही अपनी बुद्धिमता और दूरदर्शिता का परिचय देना है। भगवान ने हमारी पात्रता की कसौटी के रूप में यह मनुष्य शरीर दिया है और यह परखा है कि हम इसका उत्तरदायित्व संभालने की स्थिति में हैं या नहीं? यदि इस कसौटी पर खरे उतरे तो ऋषित्व एवं देवत्व जैसे उच्च उत्तरदायित्व प्रदान कर अन्ततः अपना ही अंग बना लेता है, पर यदि मनुष्यत्व जैसी परीक्षा में सफल न हो सके, इतना छोटा उत्तरदायित्व भी संभाल न सके तो जिस स्तर के हम हैं उसी निम्न योनि में पड़े रहने के लिये वापिस भेज देता है। गैर जिम्मेदार सरकारी कर्मचारी ‘रिबर्ट’ कर छोटे पदों पर उतार दिये जाते हैं। हमें भी अपनी निकृष्ट मनोभूमि के अनुरूप निम्न योनियों में उतरना पड़ सकता है।

अस्तु प्रयत्न यह होना चाहिये कि मानव-जीवन महान उत्तरदायित्व को वहन करने के लिये हम पग-पग पर सतर्कता बरतें। निम्न योनियों के संचित कुसंस्कारों को हटायें और मानवोचित गुण कर्म स्वभाव की- सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि करें। यह प्रयत्न तभी सफल हो सकता है जब हर घड़ी अपने आपके ऊपर चौकसी रखी जाय। अपने संबंध में असावधान रहने से- उसी ढर्रे पर अपनी गाड़ी भी लुढ़कने लगती है, जिससे आस-पास घिरे हुए निकम्मे लोगों का जीवन फूहड़पन के साथ बर्बाद होता चला जा रहा है। आवश्यकता ऐसी विवेकशीलता की है, जो अपने संबंध में सतर्कता बरतने और दूसरे गंदे लोगों का अनुकरण न करके अपना मार्ग स्वतः निर्धारण करने का साहस प्रदान कर सके।

ऐसा साहस ही अध्यात्म है- जो आदर्श जीवन जीने की गतिविधियों का निर्माण करे और उसी रास्ते पर साहसपूर्वक घसीट ले चले। जिन लोगों के बीच हमारा रहना है उनमें से अधिकाँश बड़े स्वार्थी, संकीर्ण, ओछे गंदे लोग हैं, इनकी कोशिश अपने ही ढर्रे पर साथियों को भी घसीट ले चलने की होती है। वे उत्कृष्ट जीवन जीने वालों का मजाक बनाते हैं। निन्दा और विरोध करते हैं और तरह-तरह की अड़चनें खड़ी करते हैं। जो इनसे डर गया वह गन्दा जीवन जीने के लिए विवश होगा पर जिसने साहस करके अपना पथ स्वयं निर्धारण करने का संकल्प कर लिया और पड़ोसियों की उपेक्षा करके उत्कृष्टता गतिविधियाँ अपनाने के लिये दृढ़तापूर्वक चल पड़ा वही जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में सफल होता है। अध्यात्म साहसी शूरवीरों का- आदर्शवादी और उत्कृष्ट लोगों का मार्ग है।

देवी-देवताओं को मंत्र-तंत्र से सिखा कर उनसे तरह-तरह की मनोकामनायें सहज ही प्राप्त कर लेने के सपने देखने वाले, थोड़ी-सी टंट-घंट के बदले स्वर्ग मुक्ति लूट ले जाने लेने वाले धूर्त, अपना मन सस्ते सपने देखने में बहलाते रह सकते हैं, पर रहना उन्हें खाली हाथ ही पड़ता है। जो जीवन-शोधन का पुरुषार्थ कर सकने का साहस नहीं कर सकते, उन्हें आत्मिक प्रगति, ईश्वर की प्रसन्नता और उन दिव्य विभूतियों की आशा नहीं करनी चाहिये, जिन्हें पाकर मनुष्य-जीवन धन्य और सार्थक बनता है। कीमती वस्तुयें उचित मूल्य देकर ही खरीदी जा सकती है। अध्यात्मिक विभूतियाँ और देवी संपदायें जीवन-शोधन से कम मूल्य पर आज तक न कोई खरीद सका है और न भविष्य में कोई खरीद सकेगा। सस्ते मूल्य पर आत्मिक सफलतायें मिलने के प्रलोभन विडम्बना भरे हैं। उनसे हर विवेकशील को अपना पिण्ड शीघ्र ही छुड़ा लेना चाहिए और साहसपूर्वक जीवन-शोधन के उस राज-मार्ग पर चल पड़ना चाहिये, जिस पर चले बिना कल्याण का लक्ष्य प्राप्त कर सकता किसी के लिये भी संभव नहीं हो सकता।

यह कार्य एक निर्धारित समय पर थोड़ी पूजा-उपासना जैसी प्रक्रिया अपना कर सम्पन्न नहीं किया जा सकता। हर घड़ी आत्म-निरीक्षण की दृष्टि अपने ऊपर रखने से ही यह प्रयोजन सिद्ध होता है। साधना के प्रथम चरण में अपने शरीर और मन पर- कार्य और विचारों पर बारीकी से तीखी नजर रख कर यह देखना होता है कि मनुष्यता के गौरव को गिराने वाले- पशु-स्तर के- कुसंस्कार अपने में कितने समाये हुए हैं? गुण, कर्म, स्वभाव में किन पशु प्रवृत्तियों का समावेश है? उन्हें धीरे-धीरे, एक-एक करके छोड़ने का संकल्प करना चाहिये। अपने कुसंस्कारों से लड़ना चाहिये। उनकी हानियों पर विचार करना चाहिये। और एक-एक करके अपने दोष, दुर्गुणों को छोड़ते चलना चाहिये।

आहार-बिहार संबंधी कितनी ही कुटेवें अपने अन्दर हो सकती हैं। नशे, व्यसन, व्यभिचार, आलस्य, कटु-भाषण, क्रोध, आवेश, असंयम, मलीनता, लापरवाही, आशंका, चिन्ता, भय, कायरता, निराशा, उच्छृंखलता जैसे छोटे-मोटे स्वभाव जन्म दोष ऐसे होते हैं, जो देखने में मामूली से लगते हैं, पर प्रगति के पथ पर भारी अवरोध उत्पन्न करते हैं। चोरी, हत्या, धोखा, बेईमानी, बलात्कार जैसे बड़े पाप तो कोई विरले ही करते हैं, उनके लिए कानून में दंड व्यवस्था भी है पर छोटे दुर्गुणों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। असल में पतन की जड़ यही होते हैं और आगे चल कर उन्हीं की वृद्धि होती चलने से व्यक्ति क्रूर-कुकर्मी, नर-पिशाच बन जाता है। इसलिये इन विष वृक्षों के छोटे-मोटे पौधे भी अपने जीवन क्षेत्र में उग रहे हों तो उन्हें एक एक करके उखाड़ फेंकते चलने के लिये कटिबद्ध हो जाना चाहिये। अपने दैनिक क्रिया-कलापों और उनके साथ जुड़े हुए विचारों एवं उद्देश्यों को परखते रहना चाहिये कि निकृष्ट स्तर के- नर-पशुओं के- स्तर पर तो नहीं चल रहे हैं। यदि इनमें दोष पाये जांय तो तुरंत उसके स्थान पर सुधरी हुई रूप-रेखा उपस्थित करनी चाहिये और दोष के स्थान पर गुण को- अनुपयुक्त के स्थान पर उपयुक्त को- प्रतिष्ठित करना चाहिये। जो गलत किया जा रहा है, उसके स्थान पर सही क्या हो सकता है, यह निर्णय करने के लिये पक्षपात रहित विवेक की आवश्यकता है।

आम-तौर से हर मनुष्य अपने साथ रियासत और पक्षपात करता है। यह भूल सुधारनी चाहिये। जैसे गलत विचार या गलत काम अपने हैं, यदि वैसे ही कोई दूसरा करे और पूछने आवे कि मुझे इन्हें कैसे छोड़ना चाहिये? और इनके स्थान पर क्या रीति-नीति अपनानी चाहिये? तो इसके उत्तर में हम निश्चय ही बहुत कुछ उपदेश और परामर्श दे सकते हैं। वही उपदेश और परामर्श अपने को देना चाहिये। अपने भीतर एक नया न्यायाधीश, उपदेशक, गुरु, भगवान विकसित कर लेना चाहिये। वही अपना सुधार और मार्ग-दर्शन कर सकता है। इसी के परामर्श पर चलना चाहिये। एक-एक करके इसी प्रकार अपने दोष दुर्गुणों का अन्त होगा। आत्म-शोधन को एक महान साधन मान कर उसमें निरन्तर संलग्न रहने से ही हम निर्मल, निर्दोष, निष्पाप और निष्पक्ष, सद्विवेक महामानव बन सकेंगे। आध्यात्मिक प्रगति के लिये यही राज-मार्ग है।

जीवन-साधना का दूसरा चरण अपने भीतर सद्गुणों का, उत्कृष्टताओं, योग्यताओं और क्षमताओं का विकसित करना है। असत्य, हिंसा, चोरी, व्यभिचार, नशा आदि दुर्गुणों को छोड़ देना ऐसा ही है, जैसे किसी पौधे की जड़ को काटने में लगी हुई दीमक को हटा देना। इससे एक कठिनाई तो दूर हुई पर पौधे के विकास का पथ प्रशस्त कहाँ हुआ? उसके लिए खाद-पानी की उपयुक्त आवश्यकतायें भी पूरी करनी होंगी। अन्यथा बेचारा पौधा बढ़ेगा कैसे? मानवोचित योग्यता और विशेषताओं को बढ़ाने में उस शक्ति को लगा देना चाहिये जो दोष दुर्गुणों में बर्बाद होने से बचाई गई है। बहुत-सा समय मनोयोग और धन बेकार बातों में नष्ट किया जाता रहता है। उस बर्बादी को बचा लेना ही काफी नहीं वरन् यह भी आवश्यक है कि उस बचत से अपनी विशेषताओं को बढ़ाया जाय। रोग दूर करने के लिए चिकित्सा, उपचार करना चाहिये पर यह भी ध्यान रखना चाहिये कि रोग जन्य दुर्बलता दूर करने के लिए पौष्टिक आहार-बिहार का भी प्रबंध किया जाय। दोषों को हटा देना औषधि उपचार की तरह है। गुणों का अभिवर्धन उत्तम आहार-बिहार का प्रबंध करने की तरह।

अपनी शारीरिक और आत्मिक क्षमतायें बढ़ाना जीवन साधना के अनिवार्य अंग हैं। आहार बिहार का संयम किये बिना- ब्रह्मचर्य, व्यायाम, स्वच्छता, विश्राम, सात्विक आहार का ध्यान रखे बिना शारीरिक स्वस्थता को स्थिर नहीं रखा जा सकता है, इसलिए इन बातों पर पूरा ध्यान देना चाहिये। आलस्य को सबसे बड़ा शत्रु मानना चाहिये। समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग करना चाहिये। बेकार कभी भी नहीं बैठना चाहिये। दिनचर्या ऐसी बनानी चाहिए, जिसमें समय की बर्बादी के लिए तनिक भी गुँजाइश न रहे।

मानसिक स्वरूप की रक्षा के लिए चिन्ता, निराशा, आशंका, भय, क्रोध, आवेश, ईर्ष्या, द्वेष, जैसे मनोविकारों से बचना आवश्यक है। कामुकता भरी कल्पनायें अति घातक हैं। उनसे मस्तिष्क की सारी पवित्रता नष्ट हो जाती है। संतानोत्पादन की आवश्यकता समझ में आ सकती है पर अश्लील विचारों का मस्तिष्क में घुमाते रहना और बहुमूल्य मनोयोग को किसी रचनात्मक चिन्तन में लगाने की अपेक्षा इन बे-सिर-पैर की बातों में नष्ट करना सर्वथा अवाँछनीय है। इसी प्रकार उपरोक्त अन्य मनोविकार भी मस्तिष्क की सारी सृजनात्मक क्षमता को अपने ही जंजालों में उलझाए रह कर उसे नट करते रहते हैं। इतना ही नहीं वरन् मानस क्षेत्र को विषैला कर उसे इतना दुर्बल बना देते हैं कि किसी महत्वपूर्ण योजना को बनाने और उसे ठीक तरह चलाने की क्षमता ही नहीं बनती है।

अतएव मनोविकारों ने यदि मस्तिष्क में अड्डा जमा लिया हो तो सफाई करने के लिए तत्पर होना ही चाहिए। उत्साह, धैर्य, साहस, संतुलन, विनोद, संतोष, परिश्रम, संयम जैसे सद्गुणों को विकसित करना चाहिए। जीवन हल्का-फुलका होना चाहिए। हंसते-खेलते हल्के मन से सारे काम करने चाहिए। हर काम जिम्मेदारी और तत्परता से करना चाहिए पर मस्तिष्क पर उसका दबाव और तनाव जरा भी नहीं पड़ने देना चाहिये। जीवन एक खेल की तरह जानना चाहिये। प्रतिकूल परिस्थितियाँ, हानियाँ एवं आशंकाओं को मस्तिष्क पर हावी नहीं होने चाहिये। जो हंसी-खुशी की हल्की-फुल्की जिन्दगी जी सकता है वही जीना जानता है। भारी लाभ की तरह जिन्दगी की गाड़ी रोते, कलपते खींचने वाले अविवेकियों की तरह नहीं। हमें दृष्टा और साक्षी की तरह हंसी-खुशी भरा जीवन जीना चाहिये। पाप और कुविचारों को मस्तिष्क में प्रविष्ट नहीं होने देना चाहिये। तृष्णा और वासना की लानत को नहीं ओढ़ना चाहिये। यह दोनों ही चुड़ैल ऐसी हैं जो बेशकीमती जिन्दगी को अपने ही कुचक्र में फंसा कर नष्ट कर देती हैं। हमें संतोषी होना चाहिये संग्रही नहीं। कामुकता, धन-संचय और वाहवाही लूटने की विडम्बनायें बाल-बुद्धि की प्रतीक है। इन बचकानी बातों में अपनी शक्तियाँ नष्ट होने से से बचा कर उन कार्यों में लगानी चाहिये जो आत्म-कल्याण और विश्वकल्याण के महान प्रयोजनों को पूरा करने के लिये आवश्यक हैं।

स्वाध्याय नित्य करना चाहिये। जीवन-निर्माण के लिए उपयुक्त सत्साहित्य नित्य पढ़ना चाहिये। मस्तिष्क पर सारे संसार में फैले हुए अनुपयुक्त वातावरण की छाप अनायास ही पड़ती रहती है। इस मलीनता को रोज स्वच्छ करने के लिए स्वाध्याय तथा सत्संग ही एक मात्र उपाय है। इस जमाने में सत्संग के नाम पर भ्रम-जंजाल में भटका देने वाले साधु बाबाओं और कथा-वाचकों की ऐसी माया फैली पड़ी है जो सीधे रास्ते पर चलने वाले को उल्टा भटका दे। अब सत्संग भी लगभग असंभव है क्योंकि विचारशील व्यस्त रहते हैं और जिनके पास समय है, वे उल्टे भ्रम में डालते हैं। सामाजिक विचारशील और चरित्रवान लोगों का सत्संग उनके साहित्य से ही मिल सकता है। युग-निर्माण योजना द्वारा प्रस्तुत सत्-साहित्य ही हमारी स्वाध्याय की आवश्यकता को पूरा कर सकता है।

शरीर और मन ही नहीं आत्मिक स्तर का विकास भी किया जाना चाहिये। इसके लिए परामर्श प्रयोजनों के कुछ कार्य अवश्य करने चाहिये। दान-पुण्य नाम पर धन की बर्बादी करने वाले बहुत हैं, हमें विवेकपूर्ण परमार्थ करना चाहिये। जिससे विश्व में सत्प्रवृत्तियों को, सदाचरण को, सद्भावनाओं को प्रोत्साहन मिले, वे ही कार्य परमार्थ हैं। ऐसे परमार्थ कार्यों में अपने समय, श्रम, बुद्धि, मनोयोग, धन एवं व्यक्तित्व का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहना चाहिये। हमें अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी जीना चाहिये। इस संसार से हमने बहुत कुछ पाया है। आहार, वस्त्र, विद्या, व्यवहार, धन, मनोरंजन आदि सब कुछ समाज का ही दिया हुआ है, इसके बदले हमें भी कुछ ऐसे प्रयत्न निरन्तर करते रहने चाहिये, जिनसे इस संसार की उत्कृष्टता में अभिवृद्धि होती चले।

आत्म-बल वृद्धि के लिए उपासना, आत्म-शोधन और परमार्थ तीनों का ही समावेश आवश्यक है। भगवान का नित्य स्मरण करे। अपने दोष, दुर्गुणों से नित्य संघर्ष करे और उन्हें हटावे। सद्गुणों और योग्यताओं को बढ़ाने के लिए नित्य पुरुषार्थ करे। निजी, पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरी-पूरी ईमानदारी और तत्परतापूर्वक निबाहे। जीवन अपने और अपने घर वालों के लाभ में ही न जी डाले वरन् देश, धर्म, समाज, संस्कृति को ऊंचा उठाने के लिए भी समुचित ध्यान दे, प्रयत्न करे और जितना संभव हो अधिक से अधिक त्याग भी करे। उसी रीति-नीति पर सुसंचालित जीवन क्रम ‘साधना’ कहलाता है। हमें ईश्वर की उपासना और जीवन को साधना, उत्कृष्ट भावनाओं के साथ करनी चाहिये। तभी जीवनोद्देश्य की प्राप्ति संभव हो सकेगी।


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