शिष्य संजीवनी

समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें

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        शिष्य संजीवनी के सूत्रों में शिष्य जीवन के अनगिन रहस्य पिरोये हैं। इसका प्रत्येक सूत्र शिष्य जीवन के एक नये रहस्य को उजागर करता है, उसकी समग्र व्याख्या प्रस्तुत करता है। जो इस व्याख्या को समझकर उसे अपने जीवन में अवतरित करने, आत्मसात् करने के लिए तत्पर है, वही शिष्यत्व के सुपात्र- सत्पात्र है। जो ऐसा नहीं कर सकते, वे हमेशा के लिए इसके स्वाद से वंचित रहते हैं। समझ की बात इसमें यह है कि इसके लिए बौद्धिक समझ भर पर्याप्त नहीं है। इसके लिए साधना का बल चाहिए। जीवन साधना का पुरुषार्थ जिनमें है, वही इस कठिन डगर पर चलने के लायक हैं। जो इस डगर पर चल रहे हैं, वे जानते हैं कि इस पर चलते हुए कितनी बार उनके पाँवों में छाले पड़े हैं। कितनी बार ये छाले गहरे घावों में बदले हैं और कितनी बार उन्हें इन घावों की रिसन से मर्मान्तक वेदना झेलनी पड़ी है।

      लेकिन इसके बावजूद यह रोमाँचक यात्रा अतीव सुखप्रद है, क्योंकि इसकी अनुभूतियों का प्रत्येक पृष्ठ मानवीय चेतना के एक नये और अनजाने आयाम को उद्घाटित करता है। इसके नये अन्तर- प्रत्यन्तर खुलते हैं। परत- दर बोध की नूतन दृष्टि मिलती है। और इसमें सबसे बड़ी बात यह पता चलता है कि जीवन के प्रत्येक कण में सार है। इसके प्रत्येक क्षण में अर्थ है। फिर ये कण या क्षण मुश्किलों से भरे हुए ही क्यों न हों। भले ही इनके साथ जीने में विष बुझे बाणों की चुभन का अहसास हो रहा हो। जो इसमें सार- सत्य को ढूँढ लेते हैं, वही जीवन के मर्म को जान पाते हैं।

       शिष्य संजीवनी के इस नये सूत्र का संदेश भी है। जो शिष्यत्व की डगर पर चले हैं, जिन्होंने इस साधना में अपने सम्पूर्ण जीवन की आहुति दी है, उन सबका कहना यही है- ‘समग्र जीवन का सम्मान करो, जो तुम्हें चारों ओर से घेरे हुए है। अपने आसपास के अनवरत बदलने वाले प्रवाहमान जीवन को गहराई से देखो, क्योंकि यह मानवीय संवेदनाओं का ही सघन रूप है और ज्यों- ज्यों तुम इसकी बुनावट को परखोगे- बनावट पर ध्यान दोगे, त्यों- त्यों तुम क्रमिक रूप से जीवन के विशालतम शब्द एवं व्यापकतम अर्थ को पढ़ और समझ सकने लायक होगे।

      इसी के साथ तुम्हें मानवीय हृदय में झाँकने की कला सीखनी होगी। हमेशा मानव हृदय से उफनती भाव संवेदनाओं की गंगोत्री में स्नान करने की कोशिश करो। तभी तुम जान पाओगे कि यह जगत् कैसा है और जीवन के रूप कितने विविध हैं। इसे जानने के लिए निष्पक्षता और तटस्थता अपनाओ। बुद्धि को साक्षी बने रहने दो। तभी तुम समझ पाओगे कि न कोई तुम्हारा शत्रु है और न कोई मित्र। सभी समान रूप से तुम्हारे शिक्षक हैं। तुम्हारा शत्रु, तुम्हारे लिए एक रहस्यमय प्रश्र की भाँति है, जिसे तुम्हें हल करना है। एक अनबूझ पहेली की भाँति है, जिसे बूझना है। भले ही इसे हल करने में, बूझने में युगों का समय लग जाये। क्योंकि मानव को समझना तो है ही। तुम्हारा मित्र तुम्हारा ही अंग बन जाता है, तुम्हारे ही विस्तार का एक अंश हो जाता है, जिसे समझना कठिन होता है।’

बड़ी मार्मिक बातें उजागर हुई हैं इस सूत्र में। अगर सार रूप में इस सूत्र को एक पंक्ति में परिभाषित करें तो यही कहना होगा कि जो साधना की डगर पर चलना चाहते हैं वे समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें। इसके प्रत्येक हिस्से में महत्त्वपूर्ण संदेश है। हाँ, उसमें भी जिसे हम दुःख कहकर परिभाषित करते हैं और रो- पीटकर पूरे संसार को अपने सिर पर उठा लेते हैं। दरअरसल यदि सच्चाई जाने- परखें तो पता यही चलेगा कि जीवन में दुःख नहीं है। जीवन को देखने के ढंग में दुःख है। यह देखने का ढंग लेकर जो जहाँ भी जायेगा, वही दुःखी होता रहेगा। फिर चाहे वह जगह स्वर्ग ही क्यों न हो।

    यही वजह है कि चमड़ा भिगोते जूता गाँठते हुए रैदास परम आनन्दित हो सकते हैं। चरखा कातते हुए कबीर इतने आनन्द विभोर होते हैं कि उनके जीवन में संगीत और काव्य फूटता है। और फिर मिट्टी के बर्तन बनाते- पकाते गोरा कुम्हार, उनके तो आनन्द की कोई सीमा ही नहीं। तो यह आनन्द और इसका स्रोत इनकी परिस्थिति में नहीं, इनकी मनःस्थिति में है। इनके दृष्टिकोण में है, जो कहीं भी आनन्द की सृष्टि करने में सक्षम है। इनके स्वर्गीय दृष्टिकोण में स्वर्ग के निर्माण की क्षमता है और ऐसा केवल इसलिए है, क्योंकि ये समग्र जीवन का सम्मान करना जानते हैं। जीवन का प्रत्येक अंश इनके लिए मूल्यवान् है। फिर भले ही वह कंटकाकीर्ण हो या सुकोमल पुष्पों से सजा।

   लेकिन जो जीवन साधना से वंचित हैं, उनकी तो स्थिति ही अलग है। इनका चित्त रुग्ण है, इनका देखने का ढंग पैथालॉजिकल है। ये अपने देखने का ढंग नहीं बदलना चाहते, बस परिस्थिति को बदलने के लिए उत्सुक रहते हैं। इनका रस जीवन की निन्दा में है। ऐसे में खुद के दोषों को समझना बड़ा मुश्किल होता है। यह जो निन्दकों का समूह है, यह अपने और औरों के जीवन को नुकसान तो भारी पहुँचा सकता है, पर परमात्मा की तरफ एक कदम बढ़ने में मदद नहीं कर सकता।

    निन्दकों के समूह, गाँव और शहरों की भीड़ में ही नहीं, आश्रमों और मठों में भी होते हैं। बल्कि वहाँ ये थोड़े ज्यादा पहुँच जाते हैं। इनके सिर में अजीब- अजीब दर्द उठते रहते हैं। जैसे कि फलाँ आदमी ऐसा कर रहा है, ढिकाँ औरत ऐसा कर रही है और कुछ नहीं तो इन्हें अपने पड़ोसी की चिंता और चर्चा परेशान करती है। अब इन्हें कौन समझाये कि तुम्हें किसने ठेका दिया सबकी चिंता का? यहीं आश्रम में क्या तुम इसीलिए आये थे। अरे! तुम तो आये थे यहाँ अपने को बदलने को और यहाँ तुम फिक्र में पड़ जाते हो किसी दूसरे को बुरा ठहराने में। ऐसे लोग किसी और को नहीं अपने आप को धोखा देते हैं।

    शिष्यत्व की डगर ऐसे वंचनाग्रस्त लोगों के लिए नहीं है। यह तो उनके लिए है, जो हृदय में सृजन की संवेदना सँजोये हैं। जरा देखें तो सही हम अपने चारों तरफ। संवेदनाओं से निर्मित हुआ है सब कुछ। जो हमारी बगल में बैठा है, उसमें भी संवेदना की धड़कन है और जो वृक्ष लगा हुआ है, उसकी भी जीवन धारा प्रवाहित हो रही है। धरती हो या आसमान हर कहीं एक ही जीवन विविध रूपों में प्रकट है। इस व्यापक सत्य को समझकर जो जीता है, वह शिष्यत्व की साधना करने में सक्षम है। इस साधना के नये रहस्य शिष्य संजीवनी के अगले सूत्र में उजागर होंगे।
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