प्रत्यक्ष से भी अति समर्थ परोक्ष

एक प्रश्न सदियों से मानवी अन्वेषण बुद्धि को आंदोलित करता रहा है । वह है- अंतत: मानव है क्या ? उसके अस्तित्व, स्वरूप उद्गम एवं भावी संभावनाओं के बारे में अगणित सम्मतियाँ व्यक्त की जाती रही हैं । जो मानवी काया को एक स्थूल पिंड भर मानते हैं, उनका दृष्टिकोण जीवन-व्यापार में अपने दैनंदिन व्यवहार में बाह्योपचार तक सीमित होता देखा जा सकता है । इससे ठीक विपरीत जो उसे चेतनसत्ता का समुच्चय, विराट का एक घटक मानते हैं, उनका आस्तिकतापरक व्यवहार अंतःकरण की भाव-संवेदनाओं की गहराई को छूता पाया जाता है । वैज्ञानिक पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्त होते हैं । अपनी औचित्य पर अवलंबित धारणा से तथ्य, तर्क अथवा प्रमाणों के आधार पर सही कसौटी पर कसकर ही वे किसी निर्णय तक पहुँचते हैं अथवा उसे मान्यता देते हैं । जीवन व मानवी सत्ता पर अपने नजरिए से सभी ने देखा, समझा व समीक्षा की है । अपने समय के मूर्द्धन्य खगोलवेत्ता डॉ गुस्ताफ स्ट्रोमवर्ग की पुस्तक "दि सोल आफ यूनिवर्स" में जीवन क्या है ? विशेषतया मनुष्य क्या है ? इस प्रश्न पर प्रस्तुत वैज्ञानिक दृष्टिकोण की तार्किक समीक्षा की गई है, वे विज्ञान से पूछते हैं- क्या मनुष्य ब्रह्मांड की कुछ धूलि का ताप और रासायनिक घटकों की औंधी-सीधी क्रिया-प्रक्रिया मात्र है च्? क्या वह प्रकृति के किसी अनिच्छित क्रिया के अवशेष उच्छिष्ट से बना खिलौना मात्र है, क्या वस्तुत: लक्ष्यहीन, अर्थहीन बेतुका राग मात्र है ? क्या उसकी सत्ता आणविक और रासायनिक हलचलों के बनने-बिगड़ने वाले संयोगों की परिधि तक ही सीमित है ? अथवा वह इससे आगे भी कुछ है ?

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