पितर हमारे अदृश्य सहायक

जिस प्रकार मनुष्य चेतना और पदार्थ सम्पदा का समन्वित पिण्ड है । ठीक उसी प्रकार यह ब्रह्माण्ड भी विराट पुरुष का सुविस्तृत शरीर है । उसमें भी स्तर के अनुरूप असीम पदार्थ और अनन्त चेतन भरा पड़ा है । दोनों की मिलीभगत से यह सृष्टि व्यवस्था चल रही है । उत्पादन, परिपोषण और परिवर्तन की त्रिविध कार्य पद्धति अपनाए हुए स्रष्टा का यह स्थूल शरीर पदार्थ समुच्चय अपने हिस्से का काम पूरा करने में निरत है । स्रष्टा का सूक्ष्म शरीर वह है जिसमें स्थूल जगत् की प्रत्यक्ष घटनाओं के लिए उत्तरदायी अदृश्य क्रिया-प्रक्रिया बनती बिगड़ती रहती है । उसे परोक्ष वातावरण भी कह सकते हैं । इसी के अनुरूप संसार की अनेकानेक परिस्थितियाँ बनती ओर घटित होती रहती हैं । सूक्ष्म जगत में भूत और भविष्य के सभी प्रवाह विद्यमान हैं । जिन्हें समझ सकने पर इस अविज्ञात की जानकारी मिल सकती है, कि भूतकाल में क्या घटित हुआ था और भविष्य में क्या होने जा रहा है ? वर्षा, आँंधी, तूफान, हिमपात मौसम आदि की पूर्व जानकारी लक्षणों को देखते हुए अनुमान की पकड में आ जाती है । इसी प्रकार अदृश्य जगत में चल रही सचेतन हलचलों को देखते हुए भविष्य सम्भावनाओं का भूतकाल की घटनाओं का और वर्तमान की परिस्थितियों का पूर्वाभास प्राप्त किया जा सकता है । सामान्यत: मनुष्य की समझ अपने क्रिया-कलाप का निर्धारण करने में ही काम आती है । उसे परिस्थितियों की पृष्ठभूमि तथा सम्भावना के सम्बन्ध में कोई अलग से जानकारी नहीं

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