नया संसार बसाएँगे, नया इन्सान बनाएँगे

'वसुधैव कुटंबकम' का सैद्धांतिक आधार मनुष्य को भगवान ने बहुत कुछ देकर इस पृथ्वी पर भेजा है । शारीरिक दृष्टि से वह कई प्राणियों की तुलना में कमजोर जरूर ठहरता है, पर बौद्धिक दृष्टि से उसके पास जो सामर्थ्य संचित है, परमात्मा ने बुद्धि और ज्ञान का-जो बहुमूल्य उपहार उसे प्रदान किया है, वह अपने आप में इतना महत्त्वपूर्ण है कि एक इसी के बल पर उसने संसार के समस्त प्राणियों को पीछे छोड़ दिया । कोई व्यक्ति दूसरों से तुलना करके अपने को भले ही अभावग्रस्त और असहाय समझता रहे, लेकिन वास्तविकता यह है कि वह न अभावग्रस्त है, न निर्बल और न निर्धन । यों रोना ही रोना हो तो-संपन्न से संपन्न व्यक्ति भी अपने पास किन्हीं वस्तुओं के अभाव की बात सोचते हुए असंतोष की आग में जलते रह सकते हैं । लेकिन वास्तविकता यह है कि दयनीय से दयनीय हालत में पड़ा रहने वाला मनुष्य भी न अभावग्रस्त है और न दयनीय । अपनी महत्ता और सर्वोपरिता को प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किए जाने के बाद भी मनुष्य की अंतरंग चेतना में श्रेष्ठता का भाव छिपा हुआ है । यह इस बात से सिद्ध होता है कि दुखी से दुखी व्यक्ति भी अपने दु:खों से छुटकारा प्राप्त

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