मनुष्य की दुर्बुद्धि और भावी विनाश

आधुनिक काल में मनुष्य ने प्रगति की है। प्राकृतिक शक्तियों पर अधिकार जमाकर असंभव लगने वाले कार्य कर दिखाए हैं पर उसकी यह उन्नति एकांगी है उसने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि भैतिक शक्ति बिना सद्भावों और परहिताकाँक्षा बिना अपने ही लिए घातक सिद्ध होती है अनियंत्रित और उच्छृंखल भौतिकवाद एक दानव की तरह सिद्ध होता है जो अपने पालने वाले का ही भक्षण करता है उससे लाभ उठाना हो तो उसे आत्मवाद और सदाचार का पालन भी अनिवार्य रूप से करना चाहिए ।

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